बावे वाली माता का मंदिर जम्मू | जम्मू के मंदिर (बाघ-ऐ-वाहू)

बावे वाली माता मंदिर के नाम से प्रसिद्ध महाकाली मंदिर है | बाबे वाली माता को जम्मू की इष्ट देवी के रूप में पूजा जाता है | इसमें देवी महाकाली की काले रंग के पत्थर की मूर्ति है।

बाग-ए-बहू किले के अन्दर यह मंदिर स्थित है जिसे 1822 में महाराजा गुलाब सिंह ने बनवाया था। महाराजा गुलाब सिंह जम्‍मू और कश्‍मीर के राजा थे। जम्मू राज्य के संस्थापक रहे राजा जम्बूलोचन के बड़े भाई बाहुलोचन के नाम पर इस किले का नाम है।

बाघ-ऐ-बहु किले का निर्माण लगभग 3000 साल पहले राजा बाहुलोचन ने करवाया था।

काली माता का यह मंदिर बहू किले के परिसर में है जो एक शक्तिशाली और तीव्र धारा में बहने वाली तवी नदी के किनारे पर स्तिथ है। तबी नदी को सूर्य की पुत्री के रूप में जाना जाता है |

नदी के आसपास के वन क्षेत्र को एक खूबसूरत पार्क में बदल दिया गया है जिसे “बाग-ए-बहू” के नाम से जाना जाता है। इस पार्क से जम्मू शहर का शानदार नजारा दिखता है।

इस मंदिर की मान्यता है की इस मंदिर को माता वैष्णोदेवी मंदिर के बाद दूसरा तीर्थ स्थल माना जाता है। इस क्षेत्र की आध्यात्मिक आभा का आनंद लेने के लिए हर साल बड़ी संख्या में भक्त जम्मू आते हैं।

लगभग 3.9 फीट ऊंचे मंच पर सफेद संगमरमर का उपयोग करके इस मंदिर का निर्माण किया है, मंदिर के गर्व गृह में काले पत्थर से बानी देवी महा काली जी विराजमान है।

यह मंदिर भीतर से छोटा है इसलिए एक समय पर कुछ ही भक्त प्रवेश कर सकते हैं।

महाकाली बाबे वाली माता का इतिहास

ऐसा माना जाता है कि महाराजा गुलाब सिंह के सत्ता में आने के कुछ समय बाद 1822 में 8वीं शताब्दी के दौरान इस मंदिर का निर्माण किया गया था।

स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, यह माना जाता है कि लगभग 300 साल पहले, देवी महा काली ने पंडित जगत राम शर्मा के सपने में दर्शन दिए थे और पहाड़ी की चोटी पर दफन एक पिंडी या पत्थर के रूप में अपनी उपस्थिति के बारे में बताया था।

उसके कुछ ही समय बाद एक पत्थर मिला और पहाड़ी पर एक मंदिर बनाया गया। कहा जाता है कि देवी का प्रतीक काला पत्थर अयोध्या से सौर वंश के राजाओं, राजा बहू लोचन और राजा जम्बू लोचन द्वारा मंदिर के निर्माण से बहुत पहले प्राप्त किया गया था।

एक मान्यता यह भी है कि जम्मू राज्य को अपनी राजधानी बनाने के बाद जब राजा ने देवी की मूर्ति का मुंह अपने नए महल मुबारक मंडी की ओर करना चाहा, तो वे लगातार असफल रहे।

राजा के आदेश पर हाथियों की सहायता से देवी शिला को हिलने का प्रयास किया गया था, परंतु जब भी हाथी उस शिला को खींचते तो वे दर्द से चिंघाडऩे लगते थे। अंत में यह फैसला लिया गया कि देवी की मुत्री यहीं स्थापित रहेंगी और इसी दिशा में रहेगी |

मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था इसलिए यह एक नया मंदिर प्रतीत होता है।

ऐसा माना जाता है कि इसके बाद देवी महाकाली महाराजा प्रताप सिंह (महाराजा रणबीर सिंह के पुत्र) को एक सपने में दिखाई दीं और उन्हें आदेश दिया कि पशु बलि को तुरंत इस मंदिर में रोक देना चाहिए।

इसके बाद महाराजा प्रताप सिंह ने पशु बलि को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया, तो संत ने देवी महाकाली की मूर्ति को उचित स्थान पर स्थापित कर दिया।

आजकल मंदिर के पुजारी पशु बलि देने के वजाये कुछ अनुष्ठान करते हैं और बलिदान के प्रतीकात्मक गायन के रूप में इसे मुक्त करने से पहले एक भेड़ या बकरी पर पवित्र जल छिड़कते हैं और मुक्त कर दिया जाता है। इस अनुष्ठान को शिल्ली चरण के नाम से जाना जाता है।

भक्त अपनी श्रद्धा देवी द्वारा अपनी इच्छा पूरी होने के बाद कड़ाह के रूप में जाना जाने वाला एक मीठा हलवा चढ़ाते हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सूत्रों के अनुसार, मंदिर की संरचना 8 वीं शताब्दी ईस्वी सन् की है और 8वीं शताब्दी ईस्वी से भी पहले की है।

गौरतलब है कि जब अमीर तैमूर ने 14वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान जम्मू पर हमला किया था, उस समय बहू किला और बावे वाली माता मंदिर मौजूद थे, जैसा कि उसने अपनी आत्मकथा में इसका उल्लेख किया गया है, जिसे मालफुजत-ए-तैमूरी के नाम से जाना जाता है।

बहू किले के पास बाबा अंबू की समाधि है यहाँ इसके भक्त आते हैं, खासकर खजुरिया ब्राह्मण।

काली माता मंदिर में साल में दो बार नवरात्रों के दौरान मार्च-अप्रैल और सितंबर-अक्टूबर के महीने में बहू मेले का आयोजन किया जाता है।

मार्च-अप्रैल और सितंबर-अक्टूबर के दौरान, साल में दो बार, बाघ ऐ बहु किले के अन्दर में नवरात्रों के दौरान “बहू मेला” के रूप में जाना जाने वाला एक लोकप्रिय हिंदू त्योहार आयोजित किया जाता है।

मंदिर बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शनों के लिए आते है। यहां सप्ताह में दो बार मंगलवार और रविवार को विशेष पूजा भी की जाती है।

मंदिर परिसर में बहुत सारे बन्दर है, जिसे जम्मू और कश्मीर राज्य में सबसे बड़ा समूह माना जाता है। यह बन्दर हाथ में पकड़ी हुई चीज़ों को छीनने में माहिर है |

इसलिए यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को पहले से सूचित किया जाता है की वो अपना , कैमरा ,मोबाइल, अपना सामान या खाने पीने की चीज़े का ध्यान रखें |

बावे वाली माता मंदिर निर्माण किसने करवाया ?

1822 में महाराजा गुलाब सिंह जी ने इस मंदिर का निर्माण करवाया


Leave a Comment

0 Shares
Share
Tweet
Share
Pin