महर्षि व्यास कृत श्री भगवती देवी स्तोत्र

श्री भगवती देवी स्तोत्र की रचना महर्षि ब्यास जी ने की है। जो प्राणी शुद्ध भावना से नियमपूर्वक इस व्यास कृत स्तोत्र का पाठ करता है, अथवा माँ पर विश्वाश कर उच्च चेतना से पाठ करता है, उसके ऊपर भगवती सदा ही प्रसन्न रहती हैं ।

माँ भगवती का अर्थ–संस्कृत में ‘भग’ शब्द ऐश्वर्य के अर्थ में प्रयोग होता है; अत: सम्पूर्ण ऐश्वर्य आदि प्रत्येक युग में जिनके अंदर विद्यमान हैं, वे देवी दुर्गा ‘भगवती’ का ही एक नाम हैं । सव जगत और सव काल में विद्यमान होने से देवी ‘सनातनी’ कही जाती है ।

माँ दुर्गा सबके द्वारा पूजित और वन्दित हैं तथा तीनों लोकों की कल्याणकारी माँ हैं । माँ भगवती संसार के समस्त प्राणियों को जन्म, मृत्यु, जरा और मोक्ष की प्राप्ति कराती हैं । समस्त अमंगलों का नाश करने वाली देवी है। भगवान शिव की प्रिया देवी भगवती के सिवा संसार में दूसरा कौन है, जिसका चित्त सबका कल्याण करने के लिए सदा ही दयार्द्र रहता हो ।

माँ भगवती शरण में आए हुए शरणार्थियों की रक्षा कर सबकी पीड़ा दूर करने वाली हैं । माँ जब अपने भक्त से प्रसन्न होती है तो मनुष्य की समस्त बाधाओं और व्याधियों का नाश कर देती हैं । जो मनुष्य माँ भगवती की शरण में चले जाते हैं, वे मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले बन जाते हैं ।


महर्षि व्यास कृत ‘ श्री भगवती स्तोत्र’ हिन्दी अर्थ सहित ।

जय भगवति देवि नमो वरदे,
जय पापविनाशिनि बहुफलदे ।।
जय शुम्भनिशुम्भ कपालधरे,
प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे ।। १ ।।

अर्थात्— हे वरदायिनी देवि ! हे भगवति ! तुम्हारी जय हो । हे पापों को नष्ट करने वाली और अनन्त फल देने वाली देवि ! तुन्हारी जय हो । हे शुम्भ-निशुम्भ के मुण्डों को धारण करने वाली देवि ! तुम्हारी जय हो । हे मनुष्यों की पीड़ा हरने वाली देवि ! मैं माँ आपको प्रणाम करता हूँ ।

जय चन्द्रदिवाकर नेत्रधरे,
जय पावकभूषित वक्त्रवरे ।
जय भैरवदेहनिलीन परे,
जय अन्धकदैत्य विशोषकरे ।। २ ।।

अर्थात्—हे सूर्य-चन्द्रमा रूपी नेत्रों को धारण करने वाली देवि माँ ! तुम्हारी सदा ही जय हो । हे अग्नि के समान देदीप्यमान मुख से शोभित होने वाली ! तुम्हारी जय हो । हे भैरव-शरीर में लीन रहने वाली और अन्धकासुर का शोषण करने वाली देवि ! तुम्हारी जय हो, जय हो देवी माँ ।

जय महिषविमर्दिनि शूलकरे,
जय लोकसमस्तक पापहरे ।
जय देवि पितामह विष्णुनते,
जय भास्कर शक्र शिरोऽवनते ।। ३ ।।

अर्थात्—हे महिषासुर का मर्दन करने वाली देवी, शूलधारिणी और लोक के समस्त पापों को दूर करने वाली भगवति ! तुम्हारी जय हो । ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और इन्द्र से नमस्कृत होने वाली हे देवि ! आपकी जय हो, जय हो ।

जय षण्मुख सायुध ईशनुते,
जय सागरगामिनि शम्भुनुते ।
जय दु:खदरिद्र विनाश करे,
जय पुत्रकलत्र विवृद्धि करे ।। ४ ।।

अर्थात्—सशस्त्र शंकर और कार्तिकेयजी के द्वारा वन्दित होने वाली देवि माँ ! आपकी जय हो । शिव के द्वारा प्रशंसित एवं सागर में मिलने वाली गंगारुपिणी देवि ! आपकी जय हो । दु:ख और दरिद्रता का नाश तथा संतान और कुल की वृद्धि करने वाली हे देवि ! आपकी जय हो, जय हो ।

जय देवि समस्त शरीर धरे,
जय नाकविदर्शिति दु:ख हरे ।
जय व्याधि विनाशिनि मोक्ष करे,
जय वांछितदायिनि सिद्धि वरे ।। ५ ।।

अर्थात्—हे देवि ! आपकी जय हो । आप समस्त शरीरों को धारण करने वाली, स्वर्ग लोक के दर्शन कराने वाली और दु:खहारिणी माता हो । हे व्याधिनाशिनी देवि ! आपकी जय हो । मोक्ष तुम्हारे करतलगत है । हे मनोवांछित फल देने वाली माँ, अष्ट सिद्धियों से सम्पन्न करने वाली देवि ! आपकी सदा ही जय हो ।

एतद् व्यासकृतं स्तोत्रं,
य: पठेन्नियत: शुचि: ।
गृहे वा शुद्ध भावेन,
प्रीता भगवती सदा ।। ६ ।।

अर्थात्—जो मनुष्य कहीं भी रह कर पवित्र भावना से नियम-पूर्वक इस व्यासकृत स्तोत्र का पाठ करता है, अथवा शुद्ध भाव से घर पर ही पाठ करता है, उसके ऊपर माँ भगवती सदा ही प्रसन्न रहती हैं ।

॥ इति महर्षि व्यासकृतं श्री भगवती स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥


महर्षि व्यास कृत श्री भगवती देवी स्तोत्र
महर्षि व्यास कृत श्री भगवती देवी स्तोत्र

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