गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति कब हुई

गौतम बुद्ध द्वारा स्थापित शिक्षा को बौद्ध धर्म के रूप में जाना जाता है। बुद्ध कौन हैं? बुद्ध वह है जिसने बोधि प्राप्त कर ली है; और बोधि का अर्थ है ज्ञान, बौद्धिक और नैतिक पूर्णता की एक आदर्श स्थिति जिसे मनुष्य विशुद्ध रूप से मानवीय माध्यमों से प्राप्त कर सकता है।

बुद्ध शब्द का शाब्दिक अर्थ है प्रबुद्ध, ज्ञाता। बौद्धों का मानना ​​है कि प्रत्येक युग में एक बुद्ध का जन्म होता है, और हमारे बुद्ध – गौतम, जिन्होंने भारत में बोध गया में बो पेड़ के नीचे ज्ञान प्राप्त किया था – उत्तराधिकार में सातवें थे।

बुद्ध, या सिद्धार्थ गौतम, का जन्म 567 ईसा पूर्व के आसपास, हिमालय की तलहटी के ठीक नीचे एक छोटे से राज्य में हुआ था। उनके पिता शाक्य वंश के मुखिया थे और उनका नाम राजा शुद्धोधन था। ऐसा कहा जाता है कि उनके जन्म से बारह साल पहले ब्राह्मणों ने भविष्यवाणी की थी कि वह या तो एक सार्वभौमिक सम्राट या एक महान ऋषि बनेंगे।

गौतम के पिता नहीं चाहते थे गौतम साधु बन जाये.पिता ने ज्योतिषयों से उपाय पूछा और ज्योतिषियों ने कहा कि इसका लालन-पालन व पूरा जीवन बड़ी सावधानी में बिताना होगा। इसके सामने कोई वैराग्य , कोई ऐसी अवस्था या कोई ऐसी चीज़ न ले जाये जिससे राजकुमार को वैराग पैदा हो और वो सन्यासी बन जाये.

अर्थात्‌ आपका पुत्र सिद्धार्थ कभी किसी बूढ़े व्यक्ति को न देखे, कभी किसी बीमार व्यक्ति को न देखे और कभी किसी मरे हुए व्यक्ति को न देखे । कोई सूखा पत्ता , पेड़ , डाली भी इनके सामने न आए जो जीवन का एक दिन अंत होना हो यह सन्देश देती हो | जब तक ऐसा कोई होगा तब तक वे राजा ही बने रहेंगे, अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे साधु बन जाएँगे।

इनके पिता चाहते थे की वो भी एक राजा बने इसलिए गौतम को तपस्वी बनने से रोकने के लिए उसके पिता ने उसे महल की परिधि में रखा।

राजा शुद्धोधन ने बिल्कुल पक्की व्यवस्था कर रखी थी कि उनका पुत्र सिद्धार्थ जीवन में कभी भी वृद्ध, बीमार और मृतक व्यक्ति को देख न सके, क्योंकि वे अपने पुत्र को खोना नहीं चाहते थे।

गौतम राजसी विलासिता में पले-बढ़े, बाहरी दुनिया से अन्जान थे , नृत्य करने वाली लड़कियों द्वारा मनोरंजन किया करती थी,तीरंदाजी, तलवारबाजी, कुश्ती, तैराकी और दौड़ने में प्रशिक्षण लिया था। जब वह युवा हुए तो गौतम ने यशोधरा से विवाह किया, जिसने एक पुत्र को जन्म दिया।

हम यह कह सकते हैं, उसके पास सब कुछ था पर फिर भी उन्हें भीतर से लगता था, यह पर्याप्त नहीं है। कुछ-कुछ अपनी ही छाया के रूप में लगातार- उसे महल की दीवारों से बाहर की दुनिया ने खींच लिया।

एक दिन सिद्धार्थ ने आग्रह किया की आजतक उसने अपना शहर नहीं देखा और अगर उनके पिता की आज्ञा हो तो वो अपने राज्य का शहर देख ले.

राजा से शेहरा देखने की इजाजत दे दी और एक समझदार सारथी को भी साथ में भेजा गया जो राजकुअंर को शहर में घुमा लाये। राजा ने चाक-चौबंद इंतजाम कर दिया था कि कहीं चूक न हो जाए।

गलती से राजकुमार का रथ उस और चला गया यहाँ राजा का कोई इंतज़ाम नहीं था | आज सिद्दार्थ को बहुत आश्चर्य हुआ, जब पहली बार उन्होंने किसी बूढ़े आदमी को देखा, जिसकी कमर झुकी हुई थी, सफेद बाल और चेहरे पर झुर्रियां। वह परेशानी और दुःख से बेहाल था। बह बूढ़ा बड़ी मुश्किल से चल पा रहा था । बूढ़े की झुकी हुई कमर को देखकर सिद्धार्थ आश्चर्य में पड़ गए |

राजकुमार सारथि से पूछने लगे की यह कौन है और यह इंसान ऐसे कियूं चल रहा है ! सारथि ने उतर दिया की हर व्यक्ति के जीवन में तीन अवस्थाएँ आती हैं बचपन, जवानी और बुढ़ापा । यह ब्यक्ति बुढ़ापे की अवस्था में है। राजकुमार यह संसार का नियम है चाहे गरीब हो या अमीर प्रत्येक दिन के साथ सबका शरीर शिथिल अर्थात्‌ बूढ़ा होता है।

सारथी ने रथ को आगे बढ़ाया तो कुछ दूरी पर एक बीमार व्यक्ति मिला जो रोगों से घिरा हुआ था और बीमारी से कराह रहा था। उस पीड़ित व्यक्ति को देखकर राजकुमार का मन बहुत ही दुःखी हुआ।

राजकुमार ने पूछा सारथि से पूछा इसको क्या हुआ है और सारथि ने सारथी ने उत्तर दिया यह इंसान बहुत बीमार है इसलिए यह कराह रहा है। इस संसार में दुःख और सुख दोनों हैं। यह अपने-अपने भाग्य की बात है कि कोई दुःखी है और कोई सुखी है।

राजकुमार ने सारथि से पूछा क्या मैं भी कभी बीमार हो सकता हूँ ? सारथी ने उत्तर दिया आप यह विचार अभी छोड़ दें।

समय बड़ा बलवान होता है। ये सारी बातें किये हुए कर्मों पर निर्भर करती हैं।

चाहे राजा हो या रंक, छोटा हो या बड़ा, कला हो या गोरा सुख-दुःख सब पर आते हैं। अगर शरीर में कोई रोग का आना निश्चित है तो वह आएगा। यह सब सुनकर राजकुमार और ज़्यादा आश्चर्य में पड़ गया।

सारथी ने रथ को कुछ आगे बढ़ाया तो सामने से एक अर्थी दिखी जिसको कंधे पर उठाये 4 लोग शमशान घाट की तरफ ले जा रहे थे और कुछ लोग ग़मगीन अवस्था में अर्थी के पीछे चल रहे थे.

राजकुमार ने सारथी से पूछा, यह क्या हो रहा है और किसको कहाँ ले जा रहें है. सारथि ने उत्तर दिया यह आदमी मर गया है। इसकी देह का अंत हो चूका है, यह शरीर अब किसी काम का नहीं, जो व्यक्ति मर जाता है, उसको अर्थी पर बाँधकर श्मशान भूमि में ले जाते हैं और फिर वहाँ पर उसके शरीर को जला दिया जाता है।

राजकुमार ने बड़ी उत्सुकता से कहा, “क्या एक दिन सबको मरना पड़ता है ? सारथि ने हाँ में उत्तर दिया और समझाया की एक दिन सबको मरना पड़ता है। यह मृत्युलोक है। जो प्राणी जन्म लेता है उसे कभी न कभी अवश्य ही मरना पड़ता है।

राजकुमार ने सारथि से फिर पूछा , तो इसका मतलब यह हुआ कि ठीक इसी तरह से एक दिन मुझे भी मरना होगा, मेरी देह का भी अंत होगा |

मुझको भी ऐसे ही अर्थी पर लिटाकर रस्सियों से बाँधा जाएगा और मेरे भी पीछे रिश्ते नातेदार रोएंगे-तड़पेंगे और सांसारिक बस्तुओं को मैंने इकट्ठा किया है, वह सारा-का-सारा एहि रह जायेगा |

इसका मतलब यह हुआ कि क्या एक दिन सबका अंत निश्चित है , मेरा भी ? क्‍या एक दिन यशोधरा भी मर जाएगी ? क्‍या एक दिन मेरा राहुल भी मर जाएगा ?

सारथी ने सर हिलाते हुए कहा, “हाँ, राजकुमार यह सत्य है ! एक दिन मैं भी नहीं रहूँगा, आप भी न होंगे, यशोधरा का देह का अंत होगा और राहुल भी खत्म हो जायेगा, क्योंकि जिस भी प्राणी ने जनम लिया उसकी मृत्यु निश्चित है, यह परम अटल सत्य है जिसे समझने की जरुरत है |

शहर की गलियों में, उन्हें तीन असाधारण चीज़ें देखने को मिली जो उन्होंने ज़िंदगी में पहली बार देखि थी: एक बीमार आदमी, एक बूढ़ा आदमी, और एक लाश को शमशान घाट में ले जाया जा रहा था। यह सब उन्होंने पहली बार देखा था और आष्चर्य में पड़ गए की किसी ने भी आजतक उनको इन सब के बारे में नहीं बताया था |

गौतम का जीवन आराम के सिवाय किसी और अनुभव के लिए तैयार नहीं किया था। जब उनके सारथी ने उन्हें बताया कि सभी प्राणी बीमारी, वृद्धावस्था और मृत्यु के अधीन हैं, तो वे उनमें जीवन को जानने की जिज्ञासा जाग उठी।

सिद्दार्थ का घर का त्याग ज्ञान प्राप्ति के लिए

जैसे ही वह महल में लौटा, उसने एक भटकते हुए तपस्वी को सड़क के किनारे शांतिपूर्वक चलते हुए देखा। तब उन्होंने दुख की समस्या के उत्तर की तलाश में महल छोड़ने का संकल्प लिया।

अपनी पत्नी और बच्चे को बिना जगाए चुपचाप विदाई देने के बाद, वह जंगल की और चले गए। वहाँ, उन्होंने अपने लंबे बाल तलवार से काटे और एक तपस्वी की तरह साधारण वस्त्रों को पहन लिया.

गौतम जंगल और देहात में भटकते रहे, सत्य और शांति के साधक को पाने के लिए। उन्होंने अपने समय के कई प्रतिष्ठित शिक्षक से संपर्क किया, लेकिन कोई भी उन्हें वह नहीं दे सका जो उन्होंने मांगा था।

उन्होंने निर्वाण प्राप्त करने की आशा में साधु जीवन की सभी कठोर तपस्याओं का कठिन अभ्यास किया। आखिरकार उसका नाजुक शरीर लगभग एक कंकाल की तरह दिखने लगा। लेकिन जितना अधिक उसने अपने शरीर को तड़पाया, वह अपने लक्ष्य से उतना ही दूर होता गया।

आत्म-त्याग की निरर्थकता को महसूस करते हुए, उन्होंने अंततः एक अलग पाठ्यक्रम का पालन करने का फैसला किया, दर्द और भोग की चरम सीमा से परहेज किया।

गौतम ने दो शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त करने लगे। अरदा कलामा से, जिनके तीन सौ शिष्य थे | गौतम ने शून्यता के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए अपने मन को अनुशासित करना सीखा। भले ही अरदा कलामा ने उन्हें एक समान अवस्था में रहने का ज्ञान सिखाया, लेकिन गौतम ने माना कि यह मुक्ति का रास्ता नहीं है, और वहां से चले गए।

इसके बाद सिद्धार्थ ने उदरक रामपुत्र से मन की एकाग्रता में प्रवेश करना सीखा जो न तो चेतना है और न ही बेहोशी। लेकिन यह मुक्ति भी नहीं थी और सिद्धार्थ ने अपने दूसरे गुरु को छोड़ दिया।

छह साल तक सिद्धार्थ ने पांच साथियों के साथ तपस्या और एकाग्रता का अभ्यास किया। उसने अपने आप को निर्दयता से चलाया, एक दिन में केवल चावल का एक दाना खाकर, शरीर के खिलाफ दिमाग लगा दिया। उसकी पसलियां उसके बर्बाद हुए मांस से चिपकी हुई थीं और वह जिंदा से ज्यादा मरा हुआ लग रहा था।

गौतम बुद्ध और बोधि वृक्ष

अधिक पर्याप्त भोजन लेने और तपस्या को त्यागने का निर्णय लेने के बाद उनके पांच साथियों ने उन्हें छोड़ दिया। फिर, सिद्धार्थ भोजन की तलाश में एक गाँव में दाखिल हुए। वहाँ, सुजाता नाम की एक महिला ने उन्हें दूध का एक बर्तन और शहद का एक अलग बर्तन भेंट किया। उनकी ताकत लौट आई, सिद्धार्थ ने खुद को नैरंजना नदी में धोया, और फिर बोधि वृक्ष पर चले गए। उसने नीचे कुशा घास की एक चटाई बिछाई और बैठ गया।

बोधि वृक्ष बिहार के गया जिले में बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर परिसर में स्थित एक पीपल का पेड़ है। इसी पेड़ के नीचे ईसा पूर्व 531 में भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था।

वह बैठ गया, सभी शिक्षकों की बात सुनकर, सभी पवित्र ग्रंथों का अध्ययन किया और सभी तरीकों को आजमाया। अब भरोसा करने के लिए कुछ नहीं था, किसी की ओर मुड़ना नहीं था, कहीं नहीं जाना था।

वह एक पहाड़ के रूप में दृढ़ और अचल और दृढ़ रहा, आखिरकार, छह दिनों के बाद, उसकी आंख उगते हुए सुबह के तारे पर खुल गई, ऐसा कहा जाता है, और उसने महसूस किया कि वह जो खोज रहा था वह कभी नहीं खोया था, न ही उसे न ही किसी और को। इसलिए पाने के लिए कुछ भी नहीं था, और न ही इसे पाने के लिए कोई संघर्ष।

“आश्चर्य का चमत्कार,” उनके बारे में कहा जाता है, “यही ज्ञान सभी प्राणियों का स्वभाव है, और फिर भी वे इसके अभाव से दुखी हैं।” तो यह था कि सिद्धार्थ गौतम पैंतीस वर्ष की आयु में जाग गए, और बुद्ध बन गए, एक जागृत, शाक्य मुनि के रूप में जाने जाने वाले, शाक्य ऋषि।

सात सप्ताह तक उन्होंने मुक्ति और मुक्ति की शांति का आनंद लिया। पहले तो उन्हें अपनी प्राप्ति के बारे में बोलने का कोई झुकाव नहीं था। उन्होंने महसूस किया कि अधिकांश लोगों के लिए समझना बहुत कठिन होगा। लेकिन जब, किंवदंती के अनुसार, तीन हजार दुनियाओं के प्रमुख, ब्रह्मा ने अनुरोध किया कि जागृत एक शिक्षा दे.

इस तरह उन्होंने अपना पहला धर्मोपदेश उत्तर प्रदेश के वाराणसी के पास सारनाथ में अपने पहले मित्रों को दिया था।

महात्मा बुद्ध ने 483 ईसा पूर्व 80 वर्ष की आयु में अपने नश्वर शरीर का त्याग करते हुए खुद को सदा के लिए परमात्मा के शरण में कर दिया।


गौतम बुद्ध के द्वारा दिए गए उपदेश

महात्मा गौतम बुद्ध के उपदेश उनका जीवन के प्रति अपना अनुभव हैं। इसीलिए गौतम बुद्ध के उपदेश किसी अमूल्य रत्नों से कम नहीं। गौतम बुद्ध जी के विचार आज भी बेहद प्रासंगिक हैं। जीवन के हर प्रस्थिति में काम आपने वाले विचार उन्होंने उपदेश दिए जो मनुष्य के हर पथ पर सहायक है.

अगर हम महात्मा बुद्ध के उपदेश, भगवान बुद्ध के विचार, को पढ़कर उन्हें अपने जीवन में उतारें तो अपना जीवन सफल बना सकते हैं।

1.मनुष्य को अगर अपने जीवन में खुशियां प्राप्त करनी है तो उसे न तो अपने भूतकाल में उलझना चाहिए और न हीं अपने भविष्य की चिंता करनी चाहिए । मनुष्य को केवल अपने वर्तमान पर ही ध्यान देना चाहिए।

2.मनुष्य हजारों लड़ाईयां जीतकर भी विजयी नहीं होता। लेकिन जिस दिन वह अपने ऊपर विजय प्राप्त कर लेता है। उसी दिन वह विजयी बन जाता है।

3. दुनियां में तीन चीजें ऐसी हैं जो कभी नहीं छिप सकती सूर्य , चंद्र और सच

4. मनुष्य के अपने जीवन में मंजिल या लक्ष्य को पाने से अच्छी उसकी यात्रा होनी चाहिए। जैसे हजारो शब्दों से अच्छा वह एक शब्द है जो शांति प्रदान करता हो।

5. जीवन में कभी भी बुराई से बुराई को कभी ख़त्म नहीं किया जा सकता। मनुष्य की बुराईयां उसके जीवन से प्रेम को खत्म कर देती है।

6.सत्य पर चलने वाला मनुष्य अपने जीवन में सिर्फ दो ही गलतिया कर सकता है या तो पूरा रास्ता तय नहीं करता या फिर शुरुवात ही नहीं करता।

7.क्रोधित होने का मतलब है । जलाता हुआ कोयला किसी दूसरे पर फेंकना सबसे पहले आपके ही हाथों को जलाता है।

8.एक जलते हुए दीपक से हजारो दीपकों को जला सकते हो फिर भी दीपक की रोशनी कम नहीं होती। उसी प्रकार यदि आप में गुण हैं तो किसी के बुराई करने से वह समाप्त नहीं हो सकते।

10.जीवन में खुशियां बांटने से बढ़ती हैं कभी कम नहीं होती। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में हमेशा दूसरों की खुशीयों का ध्यान रखना चाहिए।

11. हर सुबह हम पुनः जन्म लेते हैं, हम आज क्या करते हैं यही सबसे अधिक मायने रखता है।

12.जूनून जैसी कोई आग नहीं है, नफरत जैसा कोई दरिंदा नहीं है, मूर्खता जैसी कोई जाल नहीं है, लालच जैसी कोई धार नहीं है।

13. शांति अन्दर से आती है. इसे बाहर मत खोजो।


14. आप चाहे कितने भी पवित्र शब्दों को पढ़ या बोल लें, लेकिन जब तक उनपर अमल नहीं करते उसका कोई फायदा नहीं है।

15. सत्य के रस्ते पर कोई दो ही गलतियाँ कर सकता है या तो वह पूरा सफ़र तय नहीं करता या सफ़र की शुरुआत ही नहीं करता।

16. क्रोधित रहना, जलते हुए कोयले को किसी दूसरे व्यक्ति पर फेंकने की इच्छा से पकड़े रहने के समान है यह सबसे पहले आप को ही जलाता है।

17. जीवन में एक दिन भी समझदारी से जीना कहीं अच्छा है, बजाय एक हजार साल तक बिना ध्यान के साधना करने के।

18. एक पल एक दिन को बदल सकता है, एक दिन एक जीवन को बदल सकता है, और एक जीवन इस दुनिया को बदल सकता है।

19. जो व्यक्ति अपना जीवन को समझदारी से जीता है उसे मृत्यु से भी डर नहीं लगता।

20. क्रोध को प्यार से, बुराई को अच्छाई से, स्वार्थी को उदारता से और झूठे व्यक्ति को सच्चाई से जीता जा सकता है।

21. एक जागे हुए व्यक्ति को रात बड़ी लम्बी लगती है, एक थके हुए व्यक्ति को मंजिल बड़ी दूर नजर आती है। इसी तरह सच्चे धर्म से बेखबर मूर्खों के लिए जीवन मृत्यु का सिलसिला भी उतना ही लंबा होता है।

22. अगर थोड़े से आराम को छोड़ने से व्यक्ति एक बड़ी खुशी को देख पाता है, तो एक समझदार व्यक्ति को चाहिए कि वह थोड़े से आराम को छोड़कर बड़ी खुशी को हासिल करे।

23. एक मूर्ख व्यक्ति एक समझदार व्यक्ति के साथ रहकर भी अपने पूरे जीवन में सच को उसी तरह से नहीं देख पाता, जिस तरह से एक चम्मच सूप के स्वाद का आनंद नहीं ले पाता है।

24. आपके पास जो कुछ भी है है उसे बढ़ा चढ़ा कर मत बताइए और ना ही दूसरों से ईर्ष्या कीजिये. जो दूसरों से ईर्ष्या करता है उसे मन की शांति नहीं मिलती।

25. वह व्यक्ति जो 50 लोगों से प्यार करता है उसके पास खुश होने के लिए 50 कारण होते हैं। जो किसी से प्यार नहीं करता उसके पास खुश रहने का कोई कारण नहीं होता।

26. जिस काम को करने में वर्तमान में तो दर्द हो लेकिन भविष्य में खुशी, उसे करने के लिए काफी अभ्यास की जरूरत होती है।

27. मैं कभी नहीं देखता क्या किया गया है, मैं केवल ये देखता हूं कि क्या करना बाकी है।

28. जैसे मोमबत्ती बिना आग के नहीं जल सकती, मनुष्य भी आध्या त्मिक जीवन के बिना नहीं जी सकता।

29. अपने मोक्ष के लिए खुद ही प्रयत्न करें, दूसरों पर निर्भर ना रहे।

30. तुम्हारा रास्ता आकाश में नहीं है,रास्ता दिल में है।

31. हमें हमारे सिवा कोई और नहीं बचाता न कोई बचा सकता है और न कोई ऐसा करने का प्रयास करे हमें खुद ही इस मार्ग पर चलना होगा।

32. हजारों खोखले शब्दों से अच्छा वह एक शब्द है जो शांति लाये।

33. हर अनुभव कुछ न कुछ सिखाता है हर अनुभव महत्वपूर्ण है क्योंकि हम अपनी गलतियों से ही सीखते हैं।

34. हर इंसान को यह अधिकार है कि वह अपनी दुनिया की खोज स्वंय करे।

35. पैर तभी पैर महसूस करता है जब यह जमीन को छूता है


गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त करने की कहानी
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