गीतासार | श्रीमद्भगवद्गीता सार

श्रीमदभगवतगीता ऐसा ग्रंथ है जिसमें जीवन की सभी मूल समस्याओं और शंकाओ का समाधान है। इस महान ग्रंथ गीता में जीवन की वास्तविकता और मनुष्य धर्म से जुड़े उपदेश दिए गए हैं। आप जीवन में किसी भी अवस्था से घिरें हुए हों,आपको किसी समस्या का समाधान चाहिए तो आप गीता में उसे ढूंढ सकते है।

श्रीमदभगवतगीता के उपदेश सबसे बड़े धर्मयुद्ध महाभारत की रणभूमि कुरुक्षेत्र के युद्ध में अपने शिष्य अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण ने दिए थे। हम इन उपदेशों के प्रमुख बातों को गीता सार कहते हैं। गीता का उपदेश दिए हुए भगवान कृष्ण को 5 हज़ार साल से ज़्यादा हो गए परन्तु मानव जीवन में यह भी उतना ही महत्ब्पूर्ण है जितना उस काल में था।

यह श्रीमदभगवतगीता का उपदेश युद्ध भूमि में खड़े अर्जुन के लिए नहीं था बल्कि यह सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए था और यह उपदेश मनुष्य को अपने जीवन काल किस तरह का ब्यबहार या आचरण ,घर या समाज में करना चाहिए। गीता में हमें मिल जाता है। आइए हम आपको गीतासार बता रहे है जिसे सम्पूर्ण श्रीमदभगवतगीता का निचोड़ भी कहा जाता है।


गीतासार

  • क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा ना पैदा होती है, न मरती है।
  • जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।
  • तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।
  • खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मगन हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।
  • परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
  • न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है – फिर तुम क्या हो?
  • तुम अपने आपको भगवान को अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।
  • जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आनंन्द अनुभव करेगा।

श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक हिंदी अर्थ सहित

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 47)

गीता श्लोक का अर्थ: कर्म पर ही मनुष्य का अधिकार है, कर्म के फलों पर नहीं। इसलिए मनुष्य को अपना कर्म फल की इच्छा को ध्यान में रखते हुए नहीं करना चाहिए। कर्तव्य-कर्म फल की इच्छा रहित होना चाहिए। अतः तू कर्मफल का हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो।

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
(तृतीय अध्याय, श्लोक 21)

गीता श्लोक का अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष जो आचरण यानी जो कर्म करते हैं, उनसे प्रभावित मनुष्य भी वैसा ही आचरण अपने ब्यबहार में लाते है। श्रेष्ठ पुरुष जो प्रमाण या उदाहरण समाज में प्रस्तुत करते हैं, समस्त मानव जाती उसी का अनुसरण करने लगते हैं।

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 62)

गीता श्लोक का अर्थ: विषय-वस्तुओं के बारे में हमेशा चिंतन करते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे मनुष्य में उन बस्तुओं को पाने की कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं की पूर्ति न होने पर मनुष्य में क्रोध की उत्पत्ति होती है। इसलिए मनुष्य को हमेशा विषयाशक्ति से दूर रहते हुए कर्म करना चाहिए।

क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 63)

गीता श्लोक का अर्थ: क्रोध करने से मनुष्य की बुद्धि मारी जाती है यानी मूढ़ हो जाती है, कुंद हो जाती है। इससे मनुष्य की स्मृति भ्रमित हो जाती है। स्मृति-भ्रम हो जाने से मनुष्य की विवेक नष्ट हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने पर मनुष्य खुद अपना विनाश कर बैठता है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 7)

गीता श्लोक का अर्थ: हे अर्जुन , जब-जब धर्म की ग्लानि-हानि यानी उसका क्षय होता है और संसार में अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं श्रीकृष्ण ( भगवान ) धर्म के अभ्युत्थान ( पुनः स्थापना ) के लिए स्वयं की रचना करता हूं अर्थात अवतार लेता हूं।

परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥
(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 8)

गीता श्लोक का अर्थ: सीधे साधे सरल पुरुषों, साधु और भक्तों के कल्याण के लिए और दुष्कर्मियों के विनाश के लिए, धर्म की स्थापना के लिए मैं (श्रीकृष्ण) युगों-युगों से प्रत्येक युग में जन्म लेता आया हूं।

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।
तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 37)

गीता श्लोक का अर्थ: यदि तुम (अर्जुन) इस धर्म युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि विजयी होते हो तो धरती पर तुम्हारा मान सम्मान और सुख समृद्धि मिलेगी, इसलिए उठो, हे कौन्तेय (अर्जुन), और निश्चय करके युद्ध करो।

नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 23)

गीता श्लोक का अर्थ:आत्मा को न कोई शस्त्र काट सकते हैं, न आग जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। आत्मा अजर-अमर है और शाश्वत है। शरीर मरता है परन्तु आत्मा नहीं।

श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
(चतुर्थ अध्याय, श्लोक 39)

गीता श्लोक का अर्थ: मुझमे श्रद्धा रखने वाले मनुष्य, अपनी इन्द्रियों पर संयम रखने वाले मनुष्य, साधन पारायण हो अपनी तत्परता से ज्ञान प्राप्त करते हैं, फिर ज्ञान मिल जाने पर जल्द ही परम-शान्ति को प्राप्त होते हैं।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
(अठारहवां अध्याय, श्लोक 66)

गीता श्लोक का अर्थ: (हे अर्जुन) सभी धर्मों को त्याग कर अर्थात हर आश्रय को त्याग कर केवल मेरी शरण में आओ, मैं (श्रीकृष्ण) तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दूंगा, इसलिए शोक मत करो। वीरों की भांति उठो और युद्ध करो।


श्रीमद्भगवद्गीता गीतासार
गीतासार

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