कैलाश मानसरोवर  यात्रा 

”हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थान प्रचक्षते॥- (बृहस्पति आगम) अर्थात : हिमालय से प्रारंभ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है। 
 
कैलाश मानसरोवर : कैलाश पर्वत और मानसरोवर को धरती का केंद्र माना जाता है। यह हिमालय के केंद्र में है। 
मानसरोवर वह पवित्र जगह है, जिसे शिव का धाम माना जाता है। मानसरोवर के पास स्थित कैलाश पर्वत पर भगवान शिव साक्षात विराजमान हैं। यह हिन्दुओं के लिए प्रमुख तीर्थ स्थल है। 


संस्कृत शब्द मानसरोवर, मानस तथा सरोवर को मिल कर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- मन का सरोवर।

 

कैलाश मानसरोवर माहात्म्य

 
श्री मद्भागवत में कैलाश को भगवान शंकर का निवास तथा अतीव रमणीय बतलाया गया हैं| 

कैलाश पर मनुष्यों का निवास संभव नहीं हैं| मानसरोवर की परिक्रमा का भारी महत्व कहा गया है|
 
तिब्बती लोग तीन या तेरह परिक्रमा का महत्व मानते हैं और अनेक यात्री दंडप्रणिपात करके परिक्रमा पूरी करते हैं| धारणा है कि एक परिक्रमा करने से एक जन्म का, दस परिक्रमायें करने से एक कल्प का पाप नष्ट हो जाता हैं| 

जो 108 परिक्रमायें पूरी करते हैं, उन्हें जन्म-मरण से मुक्ति मिल जाती हैं.कैलाश मानसरोवर का नाम सुनते ही हर किसी का मन वहां जाने को बेताब हो जाता है। 

मानसरोवर के पास एक सुन्दर सरोवर रकसताल है। इन दो सरोवरों के उत्तर में कैलाश पर्वत है। 

इसके दक्षिण में गुरला पर्वतमाला और गुरला शिखर है। मानसरोवर के कारण कुमाऊं की धरती पुराणों में उत्तराखंड के नाम से जानी जाती हैं।
 
कैलाश पर्वत समुद्र सतह से 22068 फुट ऊंचा है तथा हिमालय से उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है। 


चूंकि तिब्बत चीन के अधीन है अतः कैलाश चीन में आता है। मानसरोवर झील से घिरा होना कैलाश पर्वत की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ाता है। 

प्राचीन काल से विभिन्न धर्मों के लिए इस स्थान का विशेष महत्व है। 


इस स्थान से जुड़े विभिन्न मत और लोककथाएं केवल एक ही सत्य को प्रदर्शित करती हैं, जो है ईश्वर ही सत्य है, सत्य ही शिव है।
 
चार धर्मों का तीर्थ स्थल : कैलाश पर्वत समुद्र सतह से 22068 फुट ऊंचा है तथा हिमालय से उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है। 

चूंकि तिब्बत चीन के अधीन है अतः कैलाश चीन में आता है। जो चार धर्मों तिब्बती बौद्ध और सभी देश के बौद्ध धर्म, जैन धर्म और हिन्दू का आध्यात्मिक केन्द्र है। 
 
 

कैलाश मानसरोवर की धार्मिक पृष्ठभूमि

मानसरोवर का यह तीर्थ ‘मानसखंड’ भी कहलाता हैं| 

पौराणिक कथाओं के अनुसार शिव व ब्रह्मा आदि देवगण, मरीच आदि ऋषि तथा रावण व भस्मासुर आदि ने यहाँ तप किया था|


पांडवो के दिग्विजय प्रयास के बाद अर्जुन ने इस क्षेत्र पर विजय प्राप्त की थी| 


इस प्रदेश की यात्रा व्यास, भीम, श्रीकृष्णा, दत्तात्रेय इत्यादि ने भी की थी|


आदि शंकराचार्य ने इसी स्थान के आस-पास अपनी देह का त्याग किया था.
 
जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभदेवजी ने भी यहीं निर्वाण प्राप्त किया था|


कैलाश पर्वतमाला कश्मीर से लेकर भूटान तक फैली हुई हैं| इसके उत्तरी शिखर का नाम कैलाश के मध्य यह स्थित हैं|


यह सदैव बर्फ़ से आच्छादित रहता हैं|जैन तीर्थों में इसे सिद्धक्षेत्र माना गया है|
 
तिब्बतियों की मान्यता है कि वहां के एक संत कवि ने वर्षों गुफा में रहकर तपस्या की थीं। 


तिब्बति बोनपाओं अनुसार कैलाश में जो नौमंजिला स्वस्तिक देखते हैं व डेमचौक और दोरजे फांगमो का निवास है। 


बौद्ध भगवान बुद्ध तथा मणिपद्मा का निवास मानते हैं।
 
कैलाश पर स्थित बुद्ध भगवान के अलौकिक रूप ‘डेमचौक’ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए पूजनीय है। 


वह बुद्ध के इस रूप को ‘धर्मपाल’ की संज्ञा भी देते हैं। 


बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इस स्थान पर आकर उन्हें निर्वाण की प्राप्ति होती है।
 
जैनियों की मान्यता है कि आदिनाथ ऋषभदेव का यह निर्वाण स्थल ‘अष्टपद’ है। कहते हैं ऋषभदेव ने आठ पग में कैलाश की यात्रा की थी। 

हिन्दू धर्म के अनुयायियों की मान्यता है कि कैलाश पर्वत मेरू पर्वत है जो ब्राह्मंड की धूरी है और यह भगवान शंकर का प्रमुख निवास स्थान है। 


यहां देवी सती के शरीर का दांया हाथ गिरा था। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। यहां शक्तिपीठ है।
 
कुछ लोगों का मानना यह भी है कि गुरु नानक ने भी यहां कुछ दिन रुककर ध्यान किया था। इसलिए सिखों के लिए भी यह पवित्र स्थान है।
 
कैलाश क्षेत्र : इस क्षेत्र को स्वंभू कहा गया है। वैज्ञानिक मानते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप के चारों और पहले समुद्र होता था। 


इसके रशिया से टकराने से हिमालय का निर्माण हुआ। यह घटना अनुमानत: 10 करोड़ वर्ष पूर्व घटी थी। 
 
कैलाश मानसरोवर  यात्रा 

शिव जी का निवास स्‍थान कैलाश पर्वत

इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का अद्भुत समागम होता है, जो ‘ॐ’ की प्रतिध्वनि करता है। 

इस पावन स्थल को भारतीय दर्शन के हृदय की उपमा दी जाती है, जिसमें भारतीय सभ्यता की झलक प्रतिबिंबित होती है। 


कैलाश पर्वत की तलछटी में कल्पवृक्ष लगा हुआ है। कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है।
 
एक अन्य पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह जगह कुबेर की नगरी है। 


यहीं से महाविष्णु के करकमलों से निकलकर गंगा कैलाश पर्वत की चोटी पर गिरती है, जहां प्रभु शिव उन्हें अपनी जटाओं में भर धरती में निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित करते हैं। 
 
कैलाश पर्वत पर कैलाशपति सदाशिव विराजे हैं जिसके ऊपर स्वर्ग और नीचे मृत्यलोक है, इसकी बाहरी परिधि 52 किमी है। 


मानसरोवर पहाड़ों से घीरी झील है जो पुराणों में ‘क्षीर सागर’ के नाम से वर्णित है। 


क्षीर सागर कैलाश से 40 किमी की दूरी पर है व इसी में शेष शैय्‌या पर विष्णु व लक्ष्मी विराजित हो पूरे संसार को संचालित कर रहे हैं। 


यह क्षिर सागर विष्णु का अस्थाई निवास है, जबकि हिन्द महासागर स्थाई।
 
ऐसा माना जाता है कि महाराज मानधाता ने मानसरोवर झील की खोज की और कई वर्षों तक इसके किनारे तपस्या की थी, जो कि इन पर्वतों की तलहटी में स्थित है। 


बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इसके केंद्र में एक वृक्ष है, जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम हैं।
 
भारत और चीन की नदियों का उद्गभ स्‍थल : कैलाश पर्वत की चार दिशाओं से चार नदियों का उद्गम हुआ है ब्रह्मपुत्र, सिंधू, सतलज व करनाली। 

इन नदियों से ही गंगा, सरस्वती सहित चीन की अन्य नदियां भी निकली है। 


कैलाश के चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख है जिसमें से नदियों का उद्गम होता है, पूर्व में अश्वमुख है, पश्चिम में हाथी का मुख है, उत्तर में सिंह का मुख है, दक्षिण में मोर का मुख है।
 
कैलाश मानसरोवर की यात्रा

कैलाश पर्वत के तथ्य

हालांकि कैलाश मानसरोवर से जुड़ें हजारों रहस्य पुराणों में भरे पड़े हैं। शिव पुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण आदि में कैलाश खंड नाम से अलग ही अध्याय है जहां कि महिमा का गुणगान किया गया है। 

 

यहां तक पहुंचक ध्यान करने वाले को मोक्ष प्राप्त हो जाता है। भारतीय दार्शनिकों और साधकों का यह प्रमुख स्थल है। यहां की जाने वाली तपस्या तुरंत ही मोक्ष प्रदान करने वाली होती है।

सफर : स्वर्ग जैसे इस स्थान पर सिर्फ ध्यानी और योगी लोग ही रह सकते हैं या वह जिसे इस तरह के वातावरण में रहने की आदत है। 

यहां चारों तरफ कल्पना से भी ऊंचे बर्फीले पहाड़ हैं। जैसे कुछ पहाड़ों की ऊंचाई 3500 मीटर से भी अधिक है। 
कैलाश पर्वत की ऊंचाई तो 22028 फुट हैं। 

आपको 75 किलोमीटर पैदल मार्ग चलने चलने और पहाड़ियों पर चढ़ने के लिए तैयार रहना रहना होगा। इसके लिए जरूरी है कि आपका शरीर मजबूत और हर तरह के वातावरण और थकान को सहन करने वाला। 

हालांकि मोदी सरकार ने चीन से बात करने अब नाथुरा दर्रा से यात्रा करने की अनुमति ले ली है, तो अब कार द्वारा भी वहां पहुंचा जा सकेगा। 

फिर भी 10-15 किलोमिटर तक तो पैदल चलने के लिए तैयार रहें। कार से जाएं या पैदल यह दुनिया का सबसे दुर्गम और खतरनाक स्‍थान है। 

यहां सही सलामत पहुंचना और वापस आना तो शिव की मर्जी पर ही निर्भर रहता है। नीचे एक बार खाईयों में झांकने पर जमीन नजर नहीं आती है। 
 

कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग

 
यात्रा का समय व स्थान चीन सरकार निश्चित करती हैं| यात्रा करने से पहले चीन सरकार की अनुमति लेनी पड़ती हैं|यात्रा पर पूरे दल को जाने की अनुमति मिलती है| चीन सरकार ही यात्रियों की सुविधाओं का ध्यान रखती है|
 
यात्रा आरम्भ करने से पहले टनकपुर रेलवे स्टेशन पहुंचकर बस द्वारा पिथौरागढ़ जाया जाता हैं जो कि 180 किलोमीटर है| यहाँ से अस्ककोट तक भी सड़क मार्ग है. अल्मोड़ा से यदि यात्रा करें तो अस्ककोट तक की दूरी 135 किलोमीटर है|

अस्ककोट से अगला पड़ाव बलवाकोट 22 किलोमीटर है| 18 किलोमीटर आगे धारचूला नामक स्थान है| 

यहाँ पर एक डाक-बंगला है| यहीं पर कुली-सवारी आदि भी बदलनी पड़ती हैं| धारचूला ( Dharchula ) से 22 किलोमीटर पर खेला ( khela ) नामक स्थान है| 

यहाँ से 5000 फुट तक सीधी चढ़ाई है| यह चढ़ाई बहुत कठिन है| इस चढ़ाई के बाद टिथिला ( Tithila ) नामक स्थान है|

टिथिला से 8000 फुट की ऊँचाई पर गालाघर पड़ाव पड़ता है. गालाघर ( Gallagher ) से निरपानी ( Nirpani ) नामक स्थान अत्यंत दुर्गम है|

मार्ग में दो पड़ाव आते है| मालपा और बुधी| यहाँ पर यात्री कुछ अधिक विश्राम करते है| इसके बाद का पड़ाव 16 किलोमीटर दूर एक और रास्ते में खोजर ( khojar ) नामक तीर्थ है|
 
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गरव्यांग से चढ़ाई शुरू होती हैं| लिपुलेख तक की ऊँचाई 1670 फुट हैं| यहाँ से हिमालय और तिब्बत के ऊँचे प्रदेशो का दृश्य बड़ा ही मनोहारी है| 

तकलाकोट से लगभग 15000 फुट ऊँचाई चढ़ने के बाद बालढांक नामक एक पड़ाव आता हैं| यहाँ से दो रास्ते है| एक रक्षताल को जाता हैं तथा दूसरा गुरल्ला दर्रे को पार करते हुए मानसरोवर तक जाता हैं.
 
मानसरोवर झील ( Mansarovar Lake ) की परिक्रमा का घेरा लगभग 80 किलोमीटर है. दूसरी ओर रक्षताल है| 

इन दोनों सरोवर का जल जमता नहीं हैं| इनके नीचे गर्म पानी की सोते हैं| मानसरोवर झील से 18 किलोमीटर नीचे उतरकर तारचीन नामक स्थान हैं| यहीं से कैलाश पर्वत की परिक्रमा आरम्भ होती हैं|


कैलाश की परिक्रमा में लगभग तीन दिन का समय लग जाता हैं | मानसरोवर तीन बड़ी नदियों सतलुज, सरयू तथा ब्रह्मापुत्र का उद्गम स्थल है|
 
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कैलाश मानसरोवर का  रूट

आवश्यक सलाह : यहां पर ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम हो जाती है, जिससे सिरदर्द, सांस लेने में तकलीफ आदि परेशानियां प्रारंभ हो सकती हैं। 

इन परेशानियों की वजह शरीर को नए वातावरण का प्रभावित करना है। यहा का तापमान शू्न्य से नीचे -2 सेंटीग्रेड तक हो जाता है। 

इसलिए सेंटीग्रेड ऑक्सीजन सिलेंडर भी साथ होना जरूरी है। साथ ही एक सीटी व कपूर की थैली आगे पीछे होने पर व सांस भरने पर उपयोग की जाती है। 

आवश्यक सामग्री, गरम कपड़े आदि रखे और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार घोड़े पिट्टू किराए से लें।
 
उत्तराखंड से शुरु होने वाली यात्रा : भगवान शिव के इस पवित्र धाम की यह रोमांचकारी यात्रा भारत और चीन के विदेश मंत्रालयों द्वारा आयोजित की जाती है। 

इधर इस सीमा का संचालन भारतीय सीमा तक कुमाऊं मण्डल विकास निगम द्वारा की जाती है, जबकि तिब्बती क्षेत्र में चीन की पर्यटक एजेंसी इस यात्रा की व्यवस्था करती हैं। 

अंतरराष्‍ट्रीय नेपाल-तिब्बत-चीन से लगे उत्तराखंड के सीमावर्ती पिथौरागढ़ के धारचूला से कैलाश मानसरोवर की तरफ जाने वाले दुर्गम व 75 किलोमीटर पैदल मार्ग के अत्यधिक खतरनाक होने के कारण यह यात्रा बहुत कठिन होती है।
 
कैलाश पर्वत के सबसे बड़े 10 रहस्य , 10 Biggest Mysteries of Kailash Hindi

रहस्यमयी कैलाश पर्वत

लगभग एक माह चलने वाली पवित्रम यात्रा में काफी दुरुह मार्ग भी आते हैं अक्टूबर से अप्रैल तक इस क्षेत्र के सरोवर व पर्वतमालाएं दोनों ही हिमाच्छादित रहते हैं। 

सरोवरों का पानी जमकर ठोस रूप धारण किए रहता है। जून से इस क्षेत्र के तामपान में थोड़ी वृद्धि शुरू होती है।
 
नेपाल के रास्ते यहां तक पहुंचने में करीब 28 से 30 दिनों तक का समय लगता है। अर्थात यह यात्रा यदि कोई व्यवधान नहीं हुआ तो घर से लेकर पुन: घर तक पहुंचने में कम से कम 45 दिनों की होती है।
 
अब हिमाचल-सिक्कीम से : चीन से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए हिमाचल प्रदेश के शिपकी ला पास से होकर गुजरने वाले मार्ग को मानसरोवर यात्रा के लिए खोले जाने के लिए चर्चा हुई है। 

हिमाचल के किन्नौर से गुजरने वाला यह मार्ग मौजूदा उत्तराखंड के यात्रा मार्ग के मुकाबले कम दूरी का है। आप सीधे सिक्किम पहुंचकर भी यात्रा शुरू कर सकते हैं। 

कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए नाथुला दर्रा भारत और तिब्बत के बीच एक बड़ा आवा-जाही का गलियारा था जिसे 1962 के युद्ध के बाद बंद कर दिया गया।
 
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि नाथुला के रास्ते से कई सुविधाएं हैं। इससे मोटर से कैलाश मानसरोवर तक यात्रा की जा सकती है, इससे विशेषकर बूढे तीर्थयात्रियों को लाभ होगा। 

तीर्थयात्रा कम समय में पूरी की जा सकेगी और भारत से काफी संख्या में तीर्थयात्री वहां जा सकेंगे। 

कई मायनों में यह नया रास्ता बरसात के मौसम में भी सुरक्षित होगा।
 
1. भारत से सड़क मार्ग। भारत सरकार सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर यात्रा प्रबंधित करती है। 


यहां तक पहुंचने में करीब 28 से 30 दिनों तक का समय लगता है। यहाँ के लिए सीट की बुकिंग एडवांस भी हो सकती है और निर्धारित लोगों को ही ले जाया जाता है, जिसका चयन विदेश मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
 
2. वायु मार्ग: वायु मार्ग द्वारा काठमांडू तक पहुंचकर वहां से सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर झील तक जाया जा सकता है।
 
3. कैलाश तक जाने के लिए हेलिकॉप्टर की सुविधा भी ली जा सकती है। 


काठमांडू से नेपालगंज और नेपालगंज से सिमिकोट तक पहुंचकर, वहां से हिलसा तक हेलिकॉप्टर द्वारा पहुंचा जा सकता है। मानसरोवर तक पहुंचने के लिए लैंडक्रूजर का भी प्रयोग कर सकते हैं।
 
4. काठमांडू से लहासा के लिए ‘चाइना एयर’ वायुसेवा उपलब्ध है, जहां से तिब्बत के विभिन्न कस्बों- शिंगाटे, ग्यांतसे, लहात्से, प्रयाग पहुंचकर मानसरोवर जा सकते हैं।
 
5.लेकिन अब नाथुरा दर्रा वाला मार्ग जब खोल दिया जाएगा तो उपरोक्त रास्तों के अलावा आप उत्तराखंड के बजाय सिक्किम या हिमाचल से भी यह यात्रा शुरु कर सकते हैं। 


उक्त दोनों राज्यों के पर्यटन मंत्रालयों से इस संबंध में संपर्क किया जा सकता है।
 

कैलाश मानसरोवर दर्शन

पूरे हिमालय को पार करके, तिब्बती पठार में लगभग दस मील जाने पर पर्वतों से घिरे दो महान सरोवर मिलते है|

वे मनुष्य के दोनों नेत्रों के समान स्थित हैं और उनके मध्य में नासिका के समान ऊपर उठी पर्वतीय भूमि है, जो दोनों को पृथक करती है| 

इनमें एक राक्षसताल है तथा दूसरा मानसरोवर.
 

राक्षसताल 

राक्षसताल विस्तार में बहुत बड़ा हैं.वो गोल या चौकोर नहीं हैं| इसकी कई भुजाएं मीलों तक टेढ़ी-मेढ़ी होकर पर्वतों में चली गई हैं|

कहा जाता है कि किसी समय राक्षसताल रावण ने यहीं खड़े होकर देवाधिदेव भगवान शंकर की आराधना की थी|
 

मानसरोवर

मानसरोवर का आकार लगभग गोल या अंडाकार है| उसका बाहरी घेरा लगभग 22 मील हैं. मानसरोवर 51 शक्तिपीठों में से एक हैं. यहाँ पर सती की दाहिनी हथेली इसी में गिरी थी|

इसका जल अत्यंत स्वच्छ और अद्भुतनीलापन लिए हुए हैं|मानसरोवर में हंस बहुत हैं|राजहंस भी और सामान्य हंस भी हैं| सामान्य हँसों की भी दो जातियाँ हैं| एक मटमैले सफ़ेद रंग के तथा दुसरे बादामी रंग के| 

ये आकार में बतखों से बहुत मिलते हैं, परन्तु इनकी चोंचे बतखों से बहुत पतली हैं| पेट का भाग भी पतला है और ये पर्याप्त ऊँचाई पर दूर तक उड़ते हैं.
 
मानसरोवर में मोती होते है या नहीं, इसका पता नहीं, परन्तु तट पर उनके होने का कोई चिन्ह नहीं है|कमल उसमें सर्वथा नहीं हैं| एक जाति के सिवार अवश्य है|

किसी समय मानसरोवर का जल राक्षसताल में जाता था| जलधारा का वह स्थान तो अब ही हैं, परन्तु वह भाग अब ऊँचा हो गया हैं| 

प्रत्यक्ष में मानसरोवर से कोई नदीं या छोटा झरना भीं नहीं निकलता, परन्तु मानसरोवर पर्याप्त उच्च प्रदेश में हैं|मानसरोवर के आस-पास कहीं कोई वृक्ष नहीं हैं| कोई पुष्प नहीं हैं| 

इस क्षेत्र में छोटी घास और अधिक-से-अधिक सवा फुट तक ऊँची उठने वाली एक कंटीली झाड़ी को छोड़कर और कोई पौधा नहीं हैं|

मानसरोवर का जल सामान्य शीतल है| इसमें मजे से स्नान किया जा सकता हैं| इस तट पर रंग-बिरंगे पत्थर और कभी-कभी स्फटित के छोटे टुकड़े भी पाए जाते हैं.
 

कैलाश दर्शन

मानसरोवर से कैलाश की दूरी लगभग 35 किलोमीटर हैं| इसके दर्शन मानसरोवर पहुँचने से पहले ही होने लगते हैं| तिब्बत के लोगों में कैलाश के प्रति अपार श्रद्धा हैं| अनेक तिब्बत निवासी पूरे कैलाश की परिक्रमा दंडवत प्रनियात करते हुए पूरी करते हैं|


कैलाश पर्वत शिवलिंग के आकार का हैं| यह आस-पास के सभी शिखरों से ऊँचा हैं| यह कसौटी के ठोस काले पत्थरों का हैं| यह ऊपर से नीचे तक दूध जैसी उज्ज्वल बर्फ़ से ढका रहता है|
 
कैलाश के शिखर के चारों कोनों में ऐसी मंदिराकृत प्राकृतिक रूप से बनी हैं, जैसे बहुत से मंदिरो के शिखरों पर चारों ओर बनी होती हैं| 

कैलाश एक असामान्य पर्वत है| यह समस्त हिम-शिखरों से सर्वथा भिन्न तथा दिव्य है|
 

कैलाश मानसरोवर की परिक्रमा

कैलाश की परिक्रमा लगभग 50 किलोमीटर की हैं, जिसे यात्री प्रायः तीन दिनों में पूरा करते हैं| यह परिक्रमा कैलाश शिखर के चारो ओर के कमलाकार शिखरों के साथ होती हैं| कैलाश शिखर अस्पृश्य है| 


यात्रा मार्ग से लगभग ढाई किलोमीटर की सीधी चढ़ाई करके ही इसे स्पर्श किया जा सकता है| यह चढ़ाई पर्वतारोहण की विशिष्ट तैयारी के बिना संभव नहीं हैं|

कैलाश शिखर की ऊँचाई समुद्र-स्तर से 22 हजार फुट ऊँची बताई जाती है| कैलाश के दर्शन एवं परिक्रमा करने पर अद्भुत शांति एवं पवित्रता का अनुभव होता है|
 

कैलाश मानसरोवर का परिक्रमा मार्ग

तारचिन से लंडीफू (नंदी गुफा) : चार मील मार्ग से, परन्तु मार्ग से एक मील तथा सीधी चढ़ाई करके उतर आना पड़ता हैं|

डेरफू : आठ मील – यहाँ से सिंध नदी का उदगम एक मील और ऊपर हैं|

गौरीकुंड : तीन मील- कड़ी चढ़ाई, बर्फ़, समुद्र-स्तर से 11000 फुट ऊँचाई पर|

जंडलफू : 11 मील- दो मील कड़ी उतराई|

दरचिन : 6 मील.
 
कैसा है ये रहस्य? सूर्य की किरणों से सुनहरा हो जाता है पर्वत और बन जाता है ‘ॐ’
 
यकीन करना मुश्किल है मगर आस्था का केंद्र कैलाश मानसरोवर आपने साथ कई अनोखी और रहस्यमयी बातों को छुपाए हुए है।
 
मानसरोवर का नाम सुनते ही हर किसी का मन वहां जाने को बेताब हो जाता है। मानसरोवर के पास एक सुन्दर सरोवर राकसताल है। दो सरोवरों के उत्तर में कैलाश पर्वत है। 

इसके दक्षिण में गुरला पर्वतमाला और गुरला शिखर है। मानसरोवर के कारण कुमाऊं की धरती पुराणों में उत्तराखंड के नाम से जानी जाती है। 

यहां का नाम सुनते ही मन में श्रद्धा और भक्ति की भावना जागृत हो जाती है। 
 
यहां जाना कठिन होता है लेकिन भगवान शिव के दर्शन करने हर साल हजारों श्रद्धालु इन कठिन रास्तों की परवाह किए बिना कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाते हैं।
 

सुनहरा पर्वत

यहां की सबसे खास बात तो ये है की सूर्य की पहली किरणें जब कैलाश पर्वत पर पड़ती हैं तो यह पूर्ण रूप से सुनहरा हो जाता है। 

इतना ही नहीं, कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान आपको पर्वत पर बर्फ़ से बने साक्षात ‘ॐ’ के दर्शन हो जाते हैं। 

कैलाश मानसरोवर की यात्रा में हर कदम बढ़ाने पर दिव्यता का एहसास होता है। ऐसा लगता है मानो एक अलग ही दुनिया में आ गए हों।
 

रहस्यमय बर्फानी ॐ का चिह्न

इसे ॐ पर्वत  इसलिए कहा जाता है क्योंकि पर्वत का आकार व इस पर जो बर्फ़ जमी हुई है वह ओउम आकार की छटा बिखेरती है तथा ओउम का प्रतिबिंब दिखाई देता है। 

पर्वत पर ॐ अक्षर प्राकृतिक रूप से उभरा है। ज्यादा हिमपात होने पर प्राकृतिक रूप से उभरा यह ॐ अक्षर चमकता हुआ स्पष्ट दिखाई देता है। 

ॐ पर्वत कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर भारत-तिब्बत सीमा – लिपुलेख पास से 9 कि.मी पहले नवींढांग (नाभीढांग) नामक स्थान पर है। 

अप्रैल 2004 से छोटा कैलास की यात्रा शुरू हुई। तभी से इस पर्वत का महत्व भी बढ़ गया।
 

कैलाश मानसरोवर का महत्व 

 
कैलाश मानसरोवर को शिव-पार्वती का घर माना जाता है। सदियों से देवता, दानव, योगी, मुनि और सिद्ध महात्मा यहां तपस्या करते आए हैं। 

मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति मानसरोवर (झील) की धरती को छू लेता है, वह ब्रह्मा के बनाये स्वर्ग में पहुंच जाता है और जो व्यक्ति झील का पानी पी लेता है|

उसे भगवान शिव के बनाये स्वर्ग में जाने का अधिकार मिल जाता है।
 
ये भी कहा जाता है कि ब्रह्मा ने अपने मन-मस्तिष्क से मानसरोवर बनाया है। दरअसल मानसरोवर संस्कृत के मानस (मस्तिष्क) और सरोवर (झील) शब्द से बना है। मान्यता है कि ब्रह्ममुहुर्त (प्रात:काल 3-5 बजे) में देवतागण यहां स्नान करते हैं। 

ग्रंथों के अनुसार, सती का हाथ इसी स्थान पर गिरा था, जिससे यह झील तैयार हुई। इसे 51 शक्तिपीठों में से भी एक माना गया है। 

गर्मी के दिनों में जब मानसरोवर की बर्फ़ पिघलती है, तो एक प्रकार की आवाज़ भी सुनाई देती है। 

श्रद्धालु मानते हैं कि यह मृदंग की आवाज़ है। एक किंवदंती यह भी है कि नीलकमल केवल मानसरोवर में ही खिलता और दिखता है।
 

 


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