काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी

काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में पवित्र गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है, काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित 12 ज्योतिर्लिंगों मंदिरों में से एक है।

काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य देवता भगवान शिव हैं, जिन्हें विश्वनाथ या विश्वेश्वर के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ है ‘ब्रह्मांड का शासक’।

भारत की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी शहर को इस प्रकार भगवान शिव की नगरी के रूप में जाना जाता है। मंदिर की गुम्बज पर 800 किलो सोना से बनाया हुआ है।

काशी विश्वनाथ मंदिर शिव और पार्वती का आदि स्थान है इसीलिए आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है।

काशी विश्वनाथ मंदिर का उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है। ईसा पूर्व 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने जिस विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था उस मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट विक्रमादित्य ने करवाया था।

पुराने समय में, शिवरात्रि जैसे विशेष त्योहारों पर, काशी के राजा (काशी नरेश) पूजा के लिए मंदिर जाते थे, जिसके दौरान किसी और को मंदिर परिसर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं होती थी।

राजा द्वारा पूजा समाप्त करने के बाद भक्तों पूजा करने की अनुमति दी जाती थी। काशी विश्वनाथ मंदिर का महत्व इस तथ्य से भी उपजा है कि इसका उल्लेख हिंदुओं के कई पवित्र ग्रंथों में मिलता है।

काशी विश्वनाथ मंदिर के बाहर जटिल नक्काशी की गयी है जो अग्रभाग को एक दिव्य रूप प्रदान करता है।

इसके अलावा, मंदिर में कई अन्य छोटे मंदिर भी हैं जैसे कालभैरव, विष्णु, विरुपाक्ष गौरी, विनायक और अविमुक्तेश्वर।

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास

काशी विश्वनाथ मंदिर का सबसे पहला उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खंड सहित पुराणों में मिलता है। दिलचस्प बात यह है कि इस मंदिर के इतिहास के दौरान मंदिर को कई बार पूर्ण नष्ट किया और कई बार पुनर्निर्माण किया है।

पहली बार मंदिर को नष्ट किया गया था वर्ष 1194 में मुहम्मद गौरी की सेना के हाथों जब उसने कन्नौज के राजा को हराया था। मुहम्मद गौरी ने पहले मंदिर को लुटा और फिर मंदिर को तुड़वा दिया था |

दिल्ली के इल्तुतमिश के शासन के दौरान मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया था और सिकंदर लोधी के समय 1505-1515 के दौरान इसे फिर से ध्वस्त कर दिया गया था।

राजा मान सिंह ने मुगल सम्राट अकबर के शासन के दौरान मंदिर का पुनर्निर्माण किया। 1669 में, सम्राट औरंगजेब ने मंदिर को नष्ट कर दिया और उसके स्थान पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया।

18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया था । यह फ़रमानमा एशियाटिक लाइब्रेरी कोलकाता में आज भी सुरक्षित रखा हुआ है।

उस समय के मशहूर लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित पुस्तक ‘मासीदे आलमगिरी’ में इस मंदिर को ध्वस्त करने का वर्णन है। औरंगजेब के आदेश पर यहां का काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई।

2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी। औरंगजेब ने इसके साथ प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया था।

सन् 1752 से लेकर सन् 1780 के बीच मराठा सरदार दत्ताजी सिंधिया व मल्हारराव होलकर ने मंदिर मुक्ति के प्रयास किए थे।

7 अगस्त 1770 ई. में महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया परंतु तब तक वाराणसी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था इसलिए मंदिर का नवीनीकरण रुक गया। 1777-80 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था।

अहिल्याबाई होलकर ने इसी परिसर में विश्वनाथ मंदिर बनवाया था जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने सोने का छत्र बनवाया है जो आज भी है। ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां विशाल नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई जो आज भी ज्ञानवापी मस्जिद की तरफ मुँह किये हुए है।

सन् 1809 में काशी के हिन्दुओं ने जबरन बनाई गई मंदिर की जगह बनाई गई मस्जिद पर कब्जा कर लिया था, क्योंकि यह संपूर्ण क्षेत्र ज्ञानवापी मं‍डप का क्षेत्र है जिसे आजकल ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है।

30 दिसंबर 1810 को बनारस ब्रिटिश काल के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मि. वाटसन ने ‘वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल’ को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने को कहा था लेकिन उस वक़्त उस फैंसले पर अमल नहीं किया गया |

इतिहास की किताबों में 11 से 15वीं सदी के कालखंड में हिन्दू मंदिरों का जिक्र और उसके विध्वंस की बातें भी सामने आती हैं।

मोहम्मद तुगलक के शाशन काल (1325) के लेखक जिनप्रभ सूरी ने किताब ‘विविध कल्प तीर्थ’ में लिखा है कि बाबा काशी विश्वनाथ को देव क्षेत्र कहा जाता था। लेखक फ्यूरर ने भी लिखा है कि फिरोजशाह तुगलक के समय कुछ मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बना दिया गया ।

28 जनवरी 1983 से मंदिर उत्तर प्रदेश सरकार की संपत्ति बन गया है और इसका प्रबंधन डॉ विभूति नारायण सिंह और बाद में काशी नरेश द्वारा किया गया था।

काशी विश्वनाथ मंदिर का महत्व

काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी के सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक है, काशी विश्वनाथ मंदिर का हिंदू धर्म में बहुत महत्व है। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि पवित्र गंगा में डुबकी लगाने के बाद मंदिर की यात्रा मुक्ति या ‘मोक्ष’ प्राप्त करने का अंतिम तरीका है और इसी कारण से पूरे वर्ष भक्तों का तांता लगा रहता है।

एक और मान्यता यह है कि विश्वनाथ की नगरी में स्वाभाविक रूप से मरने वाले लोगों के कानों में भगवान शिव स्वयं मोक्ष के मंत्रों को बोलते हैं। गोस्वामी तुलसीदास, स्वामी विवेकानंद, आदि शंकराचार्य, गुरुनानक देव, स्वामी दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस आदि जैसे कई महान हिंदू संतों ने इस मंदिर का में भगवान विश्वनाथ के दर्शन किये है।

काशी विश्वनाथ मंदिर की वास्तुकला

काशी विश्वनाथ मंदिर में छोटे मंदिरों का एक संग्रह है जो मंदिर परिसर में स्थित है जिसमें नदी के पास विश्वनाथ गली नामक एक छोटी गली में स्थित छोटे मंदिरों की एक श्रृंखला है।

मुख्य मंदिर एक चतुर्भुज के रूप में बनाया गया है और यह अन्य देवताओं को समर्पित मंदिरों से घिरा हुआ है। ये मंदिर कालभैरव, धंदापानी, अविमुक्तेश्वर, विष्णु, विनायक, सनिश्वर, विरुपाक्ष और विरुपाक्ष गौरी को समर्पित हैं।

काले पत्थर से निर्मित, मंदिर का मुख्य शिवलिंग 60 सेमी लंबा और 90 सेमी परिधि में है और एक चांदी की वेदी में विराजमान है।

ज्ञान वापी के नाम से एक पवित्र कुआँ भी यहाँ स्थित है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह वह स्थान है जहाँ विदेशी आक्रमणकारियों से बचाने के लिए शिवलिंग को छिपाया गया था।

मंदिर की संरचना तीन भागों से बनी है। पहला भगवान विश्वनाथ के मंदिर पर एक शिखर है, दूसरा एक सोने का गुंबद है और तीसरा विश्वनाथ के ऊपर एक ध्वज और एक त्रिशूल लेकर सोने का शिखर है।

विश्वनाथ गली

मंदिर तक पहुंचने के लिए काशी विश्वनाथ गली से गुजरना पड़ता है, जो पूजा सामग्री और मिठाई बेचने वाली दुकानों के लिए प्रसिद्ध है। गली में एक लोकप्रिय लेडीज कॉर्नर भी है जो बनारसी साड़ी, कपड़े, भक्ति लेख और आभूषण जैसे कई सामान बेचता है।

यहां बिक्री पर अन्य वस्तुओं में चूड़ियां, कपडे, लकड़ी के खिलौने, पीतल के लेख, मूर्तियां, धार्मिक पुस्तकें, देवताओं के चित्र, जरुरी सामान, पूजा सामग्री, मिठाई, खाने की चीजें मिल जाती हैं

कुछ सड़क किनारे की दुकाने गरीबों को खिलने के लिए खाना भी बेचते हैं। जो भक्त श्रद्धा भाव से मोक्ष नगरी काशी में दान पुण्य की भावना से गरीबों को खाना खिलाना चाहता है वो इन दुकानों से खरीद सकता है |

भगवान शिव के दर्शन करने के बाद, भक्त कुछ किफायती खरीदारी के लिए यहां भी जा सकते हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन के लिए ड्रेस कोड

अब से प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर में आने वाले भक्तों को धोती-कुर्ती (पुरुषों के लिए) और साड़ी (महिलाओं के लिए) पहननी चाहिए। काशी विश्व परिषद द्वारा हाल ही में लिए गए निर्णय के अनुसार, स्पर्श दर्शन (मंदिर के गर्भगृह के अंदर प्रवेश) करने वाले भक्तों को इस ड्रेस कोड का सख्ती से पालन करना चाहिए।

हालांकि, पश्चिमी परिधान पहनने वाले भक्तों को गर्भगृह के बाहर देवता की पूजा करने की अनुमति होगी।

काशी विश्वनाथ मंदिर के खुलने और आरती का समय

  • आवश्यक समय: 1-3 घंटे
  • प्रवेश शुल्क : नि:शुल्क
  • काशी विश्वनाथ पूजा का समय: मंगला आरती: 3:00 पूर्वाह्न से 4:00 पूर्वाह्न (सुबह)
  • भोग आरती: 11:15 पूर्वाह्न से 12:20 पूर्वाह्न (दिन)
  • संध्या आरती: शाम 7:00 बजे से रात 8:15 बजे तक (शाम)
  • श्रृंगार आरती: रात 9:00 बजे से रात 10:15 बजे तक (रात)
  • शायना आरती: रात 10:30 बजे से रात 11:00 बजे (रात)
  • स्पर्श दर्शन के लिए ड्रेस कोड: पुरुष: धोती-कुर्ता
  • महिला: साड़ी
Varanasi Ghat Aarti
Varanasi Ganga Aarti

काशी विश्वनाथ मंदिर कितना पुराना है

काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण 1780 में इंदौर की रानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा किया गया था, और इससे पहले, कई शासकों ने इस मंदिर की संरचना के पुनर्निर्माण का प्रयास किया था जिसे आक्रमणकारियों द्वारा लगातार आक्रमण झेला था और यह इस तथ्य को स्थापित करता है कि मंदिर कई सदियों से अस्तित्व में है लेकिन कई हमलों और पुनरुत्थान को देखा है।

वर्तमान मंदिर संरचना के बारे में कहा जाता है कि इसमें तीन गुंबद हैं, जिनमें से दो महाराजा रणजीत सिंह द्वारा दान किए गए सोने से ढके हैं, जो कभी पंजाब पर शासन करते थे।

दिलचस्प बात यह है कि एक प्राचीन कुआं, जिसे ज्ञान वापी (ज्ञान का कुआं) के नाम से जाना जाता है, लंबे अतीत की कहानी बयां करता है। मान्यता से पता चलता है कि काशी विश्वनाथ की मूर्ति को आक्रमणकारियों से बचाने के लिए इस कुएं में छिपाया गया था।

भगवान शिव को अक्सर रचनात्मक विध्वंसक के रूप में जाना जाता है और उन्हें कालातीतता और मृत्यु से जोड़ा जाता है।

इसलिए, जन्म, जीवन और मृत्यु के दुष्चक्र से मुक्ति पाने वाले भक्त, काशी के पवित्र शहर की यात्रा करते हैं और पृथ्वी पर अपनी यात्रा समाप्त होने के बाद, भगवान के स्वर्गीय निवास कैलाश में शरण लेते हैं।

इसके अलावा, पारंपरिक मान्यता बताती है कि भगवान शिव के दूत अपने भक्तों को उनकी अंतिम यात्रा के दौरान ले जाते हैं। इसलिए, यहाँ, काशी में, शिव गण भक्तों को उनकी यात्रा समाप्त करने में सहायता करते हैं, न कि यम (मृत्यु के देवता) के दूत । लोक कथाओं से यह भी संकेत मिलता है कि भगवान शिव उन लोगों के कानों में मोक्ष मंत्र का जाप करते हैं जो काशी जाते हैं और अपना शेष जीवन मुक्ति की तलाश में बिताते हैं।

कैसे पहुंचें काशी विश्वनाथ मंदिर

काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में है और यह क्षेत्र पुरे भारत से हर यात्रा साधन से जुड़ा हुआ है, आप रेल मार्ग , हवाई मार्ग या सड़क यात्रा करके बाबा विश्वनाथ धाम पहुँच सकते है

मंदिर वाराणसी रेलवे स्टेशन से लगभग 5 किमी की दूरी पर स्थित है। यदि आप शहर में कहीं से भी आ रहे हैं, तो अपने गंतव्य तक पहुंचने का सबसे अच्छा तरीका टैक्सी या ऑटो रिक्शा है। वास्तविक मंदिर, हालांकि, विश्वनाथ गली के अंदर स्थित है, यहाँ पर गाडी नहीं जा सकती और आपको मंदिर की दहलीज तक आपको पैदल चलकर जाना होगा |

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर

काशी विश्वनाथ मंदिर आने-वाले श्रद्धालुओं को गलियों और तंग संकरे रास्तों से नहीं गुजरना पड़ेगा | काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से गंगा घाट से सीधे बाबा विश्‍वनाथ के दर्शन किए जा सकते हैं |

5 लाख स्क्वायर फीट में बना काशी विश्वनाथ धाम बना है. इस भव्य कॉरिडोर में छोटी-बड़ी 23 इमारतें और 27 पुराने मंदिर को ठीक किया गया हैं |

कॉरिडोर को लगभग 50,000 वर्ग मीटर के एक बड़े परिसर में बनाया गया है | इस काशी विश्वनाथ कॉरिडोर को 3 भागों में बांटा गया है | इसमें 4 बड़े-बड़े गेट और प्रदक्षिणा पथ पर संगमरमर के 22 शिलालेख लगाए गए हैं जिसमें काशी का इतिहास का वर्णन है |

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में मंदिर चौक, मुमुक्षु भवन, तीन यात्री सुविधा केंद्र, चार शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, मल्टीपरपस हॉल, सिटी म्यूजियम, वाराणसी गैलरी जैसी सुख-सुविधाओं की भी व्यवस्था की गई है |

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में अगर गोदौलिया वाले गेट से कोई एंट्री करेगा तो यूटिलिटी भवन, सिक्योरिटी ऑफिस भी है | इसके अलावा यात्री सुविधा केंद्र नंबर 1 और 2 सरस्वती फाटक की तरफ हैं |

इसमें चुनार के गुलाबी पत्थर, मकराना के सफेद मार्बल और वियतनाम के खास पत्थरों का इस्‍तेमाल किया गया है | काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से श्रद्धालु 50 फीट की सड़क से गंगा किनारे से बाबा विश्‍वनाथ के दर्शन कर सकेंगे

काशी विश्वनाथ मंदिर भारत के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक है और इसलिए इसे सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है और कई प्राचीन स्मारकों से युक्त काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन के साथ अब बाबा काशी विश्वनाथ के दर्शन काफी सुगम हो गए हैं.

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