Krishna and Sudama Story || कृष्ण और सुदामा की कहानी

Krishna Sudama

श्रीमद्भागवत महापुराण  के अनुसार- “राजा परीक्षित ने ब्राह्मणो से कहा- “श्री कृष्ण ! प्रेम और मोक्ष के दाता परब्रह्म परमात्मा भगवान  की शक्ति का कोई अंत नहीं है। इसलिये उनकी माधुर्य और ऐश्वर्य से भरी लीलाएँ भी अंतहीन हैं। 

 

अब हम श्री कृष्ण की दूसरी लीलाएँ, जिनका वर्णन आपने अब तक नहीं किया है, सुनना चाहते हैं।  मनुष्य विषय-सुख को खोजते-खोजते अत्यन्त दुःखी हो गया है। 

Krishna and Sudama Story

वे बाण की तरह-तरह इसके चित्त में चुभते रहते हैं। ऐसी स्थिति में ऐसा कौन सा रसिक रस का विशेषज्ञ पुरुष होगा, जो बार-बार पवित्रकीर्ति भगवान श्रीकृष्ण की मंगलमयी लीलाओं का श्रवण करके भी उनसे विमुख होना चाहेगा। 

 

जो जीवा भगवान के गुणों का गान करती है, वही सच्ची वाणी है। वे  हाथ सच्चे हाथ हैं, जो प्रभु की सेवा के लिये कार्य करते हैं। वही मन सच्चा मन हैं, जो चराचर प्राणियों में निवास करने वाले भगवान का हमेशा स्मरण करता है; और वे ही कान वास्तव में कान कहने योग्य हैं, जो भगवान की पुण्यमयी कथाओं का श्रवण करते हैं। 

 




वही मस्तक मस्तक है, जो चराचर जगत को भगवान की चल-अचल प्रतिमा समझकर झुका करता है और जो सर्वत्र भगद्विग्रह का दर्शन करते हैं, वे ही नेत्र वास्तव में नेत्र हैं। 

 

शरीर के जो अंग भगवान और उनके भक्तों के चरणोंदक का सेवन करते हैं, वे ही अंग वास्तव में अंग हैं; सच पूछिये तो उन्हीं का होना सफल है।”

 

सूतजी कहते हैं- “शौनकादि ऋषियों! जब राजा परीक्षित ने इस प्रकार प्रश्न किया, तब भगवान श्रीशुकदेवजी का हृदय भगवान श्रीकृष्ण में ही तल्लीन हो गया। उन्होंने परीक्षित से इस प्रकार कहा। 

 

श्रीशुकदेवजी ने आगे कथा सुनते हुए कहा – “परीक्षित! एक ब्राह्मण भगवान श्रीकृष्ण के परम मित्र थे इनका नाम सुदामा था। वे बड़े ब्रह्मज्ञानी, विषयों से विरक्त, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय थे। वे गृहस्थ होने पर भी किसी प्रकार का संग्रह-परिग्रह न रखकर प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ मिल जाता, उसी में सन्तुष्ट रहते थे। 

 

उनके तन पर वस्त्र तो फटे-पुराने थे ही, उनकी पत्नी के भी हाल वैसे ही थे। वह भी अपने पति की तरह भूख से दुबली हो रही थी। 

 

एक दिन दरिद्रता की प्रतिमूर्ति बहुत दुखी होकर, भूख के मारे काँपती हुई अपने पतिदेव के पास गयी और बिनम्र हुए मुँह से बोली- “भगवन! साक्षात लक्ष्मीपति भगवान श्रीकृष्ण आपके बाल सखा हैं। वे भक्तवांछाकल्पतरु, शरणागतवत्सल और ब्राह्मणों के परम भक्त हैं। 

 

परम भाग्यवान आर्यपुत्र! वे साधु-संतों के, सत्पुरुषों के एकमात्र आश्रय हैं। आप अपने सखा के पास जाइये और सारा हाल सुनाइए । 

 

जब वे यह जानेंगे कि आप का परिवार हैं और अन्न के बिना पालन पोषण मुश्किल से हो रहा है और आप इस कारन दुखी हैं तो वे आपको बहुत सारा धन देकर आपकी सहायता करेंगे |

 

आजकल वे भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी यादवों के स्वामी के रूप द्वरिकादीश बनकर द्वारका में ही निवास कर रहे हैं और इतने उदार हैं कि जो उनके चरण कमलों का स्मरण करता हैं, उन प्रेमी भक्तों को वे अपने-आप तक का दान कर डालते हैं। 

 

ऐसी स्थिति में  भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों को यदि धन और विषय-सुख, जो अत्यन्त वाञ्छनीय नहीं है, दें दें तो इसमें आश्चर्य की बात नहीं है |

 

इस प्रकार जब उन सुदामा की पत्नी ने अपने पति से कई बार बड़ी नम्रता से प्रार्थना की, तब उन्होंने मैं में बिचार किया कि ‘धन दौलत  की तो कोई बात नहीं; परन्तु उनके आराध्य भगवान श्रीकृष्ण का दर्शनों का बहुत बड़ा लाभ मिल जायेगा।’ 

 

यही विचार करके उन्होंने द्वारिका जाने का निश्चय किया और अपनी पत्नी से बोले- “प्रिय, खली हाथ मित्र से भेंट करने कैसे जाऊँ ! 

 

घर में कुछ भेंट देने के लिए कोई वस्तु  है क्या? अगर हो तो दे दो।

 

तब सुदामा की पत्नी ने पड़ोस के ब्राह्मणों के घर से चार मुट्ठी चावल माँगकर एक कपड़े की पोटली बाँध दिया और भगवान को भेंट देने के लिये सुदामा जी को दे दिये।

 

इसके बाद वे सुदामा जी उन चावलों की पोटली को लेकर द्वारका के लिये पैदल चल पड़े। प्रभु का भजन कीर्तन करते वे मार्ग में यह सोचते जाते थे कि ‘मुझे भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन कैसे प्राप्त होंगे?’

 

पैदल चलते चलते सुदामा के पैरों में छाले पड़ गए थे ! श्री कृष्ण अंतर ध्यान होकर सब हाल जान रहे थे | अपने मित्र और परम भक्त को देख प्रभु ने सुदामा की सहायता के लिए एक बैलगाड़ी लेकर और अपना एक ब्यापारी भेष बनाकर आये |

 

उन्होने सुदामा जी को आग्रह किया की वो उनके साथ बैलगाड़ी में बैठ जाएँ की वह भी किसी काम से द्वारिका की और जा रहे है |

 

सुदामा जी उसमें बैठ गए और भगवान श्री कृष्ण ने उनको द्वारिका के दरवाज़े तक पहुंचा दिया और खुद विदा लेकर चले गए |

 

 

कृष्ण और सुदामा मिलन ( Krishan Sudama Milan )

 

द्वारका में पहुँचने पर वे सुदामा दूसरे ब्राह्मणों के साथ सैनिकों की तीन छावनियाँ और तीन ड्योढ़ियाँ पार करके भगवद्धर्म का पालन करने वाले अन्धक और वृष्णिवंशी यादवों के महलों में, जहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन है, वहां जा पहुँचे। 

 

उनके बीच भगवान श्रीकृष्ण की सोलह हज़ार रानियों के महल थे। उनमें से एक महल के प्रहरी से सुदामा जी ने प्रवेश करने का आग्रह किया। वह महल खूब सजा-सजाया, अत्यन्त शोभा-युक्त था। सुदामा जी ने सोचा यही भगवान कृष्ण का महल होगा |




 

उस नगरी में प्रवेश के  समय उन्हें ऐसा मालूम हुआ, मानो वे ब्रह्मानन्द के समुद्र में डूब-उतरा रहे हों। 

 

प्रहरी को अपने राजा को सन्देश पहुँचाने के लिए आग्रह किया की उनके द्वार पर सुदामा आये है और यह भी बताया की श्री कृष्ण उनके बाल सखा है |

 

प्रहरी यह सुनकर असहज हो गया और ब्राह्मण देवता को दान दक्षिणा लेकर लौट जाने के लिए कह दिया | द्वारिका की रक्षा करने का भार सेनापति अक्रूर जी को दिया था | 

जब सैनिक ने सेनापति को सारा वृतांत सुनाया तो अक्रूर जी खुद आकर ब्राहण से मिले और प्रहरी को आदेश दिया की द्वरिकादीश को खबर पहुंचा दी जाये |

 

उस समय भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्राणप्रिया रुक्मिणीजी के महल में विराजे हुए थे। 

 

ब्राह्मण देवता का नाम सुनकर वे सहसा उठ खड़े हुए और उनसे मिलने महल से बाहर की तरफ दौड़े | उनके पास आकर बड़े आनन्द से उन्हें अपने भुजपाश में बाँध लिया। 

 

भगवान अपने प्यारे सखा सुदामा के अंग-स्पर्श से अत्यन्त आनन्दित हुए।  उनके कमल के समान कोमल नेत्रों से प्रेम के आँसू बरसने लगे। 

 

भगवान श्रीकृष्ण उन्हें रथ में महल के अन्दर ले गए और उनका भव्य स्वागत किया गया | श्री कृष्ण ने उन्हें ले जाकर अपने पलंग पर बैठा दिया और  पूजन की सामग्री लाकर तीनो रानियों ने उनकी आरती की। 

 

भगवान श्रीकृष्ण सभी को पवित्र करने वाले हैं; फिर भी उन्होंने अपने हाथों ब्राह्मणदेवता के पाँव पखारकर उनका चरणोंदक अपने सिर पर धारण किया और उनके शरीर में चन्दन, अरगजा, केसर आदि दिव्य गन्धों का लेपन किया।

krishan sudama milan

 

फिर उन्होंने बड़े आनन्द से सुगन्धित धूप और दीपावली से अपने मित्र की आरती उतारी। इस प्रकार पूजा करके, पान एवं गाय देकर मधुर वचनों से ‘भले पधारे’ ऐसा कहकर उनका स्वागत किया।

 

सुदामा फटे-पुराने वस्त्र पहने हुए थे। शरीर अत्यन्त मलिन और दुर्बल था। देह की सारी नसें दिखायी पड़ती थीं। स्वयं भगवती रुक्मिणीजी चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगीं। 

 

अन्त:पुर की स्त्रियाँ यह देखकर अत्यन्त विस्मित हो गयीं कि पवित्रकीर्ति भगवान श्रीकृष्ण अतिशय प्रेम से इस मैले-कुचैले अवधूत ब्राह्मण की पूजा कर रहे हैं। वे आपस में कहने लगीं- “इस नंग-धड़ंग, निर्धन, निन्दनीय और निकृष्ट भिखमंगे ने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है, जिससे त्रिलोकी-गुरु श्रीनिवास श्रीकृष्ण स्वयं इसका आदर-सत्कार कर रहे हैं। 

 

 

देखो तो सही, इन्होंने अपने पलंग पर सेवा करती हुई स्वयं लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणीजी को छोड़कर इस ब्राह्मण को अपने बड़े भाई बलरामजी के समान हृदय से लगाया है।

 

भगवान श्रीकृष्ण और वे ब्राह्मण दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर अपने पूर्व जीवन की उन आनन्ददायक घटनाओं का स्मरण और वर्णन करने लगे, जो गुरु सांदीपनि जी के गुरुकुल में रहते समय घटित हुई थीं।

 

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “धर्म के मर्मज्ञ ब्राह्मणदेव! गुरुदक्षिणा देकर जब आप गुरुकुल से लौट आये, तब आपने अपने अनुरूप स्त्री से विवाह किया या नहीं? मैं जानता हूँ कि आपका चित्त गृहस्थी में रहने पर भी प्रायः विषय-भोगों में आसक्त नहीं है। विद्वान! यह भी मुझे मालूम है कि धन आदि में भी आपकी कोई प्रीति नहीं है। 

 

जगत में विरले ही लोग ऐसे होते हैं, जो भगवान की माया से निर्मित विषयसम्बन्धी वासनाओं का त्याग कर देते हैं और चित्त में विषयों की तनिक भी वासना न रहने पर भी मेरे समान केवल लोकशिक्षा के लिये कर्म करते रहते हैं। 

 

ब्राह्मणशिरोमणे! क्या आपको उस समय की बात याद है, जब हम दोनों एक साथ गुरुकुल में निवास करते थे। सचमुच गुरुकुल में ही द्विजातियों को अपने ज्ञातव्य वस्तु का ज्ञान होता है, जिसके द्वारा वे अज्ञानान्धकार से पार हो जाते हैं।

 

 मित्र! इस संसार में शरीर का कारण-जन्मदाता पिता प्रथम गुरु है। इसके बाद उपनयन-संस्कार करके सत्कर्मों की शिक्षा देने वाला दूसरा गुरु है। वह मेरे ही समान पूज्य है। तदनन्तर ज्ञानोपदेश करके परमात्मा को प्राप्त कराने वाला गुरु तो मेरा स्वरूप ही है। 

 

वर्णाश्रमियों के ये तीन गुरु होते हैं। मेरे प्यारे मित्र! गुरु के स्वरूप में स्वयं मैं हूँ। इस जगत में वर्णाश्रमियों में जो लोग अपने गुरुदेव के उपदेशानुसार अनायास ही भवसागर पार कर लेते हैं, वे अपने स्वार्थ और परमार्थ के सच्चे जानकार हैं। प्रिय मित्र! मैं सबका आत्मा हूँ, सबके हृदय में अन्तर्यामी रूप से विराजमान हूँ। 

 

मैं गृहस्थ के धर्म पंचमहायज्ञ आदि से, ब्रह्मचारी के धर्म उपनयन-वेदाध्ययन आदि से, वानप्रस्थी के धर्म तपस्या से और सब ओर से उपरत हो जाना, इस संन्यासी के धर्म से भी उतना सन्तुष्ट नहीं होता, जितना गुरुदेव की सेवा-शुश्रूषा से सन्तुष्ट होता हूँ।




 

ब्रह्मन! जिस समय हम लोग गुरुकुल में निवास कर रहे थे; उस समय की वह बात आपको याद है क्या, जब हम दोनों को एक दिन हमारी गुरुपत्नी ने ईंधन लाने के लिये जंगल में भेजा था। 

 

उस समय हम लोग एक घोर जंगल में गये हुए थे और बिना ऋतु के ही बड़ा भयंकर आँधी-पानी आ गया था। आकाश में बिजली कड़कने लगी थी। तब तक सूर्यास्त हो गया; चारों ओर अँधेरा-ही-अँधेरा फ़ैल गया।

 

 धरती पर इस प्रकार पानी-ही-पानी हो गया कि कहाँ गड्ढा है, कहाँ किनारा, इसका पता ही न चलता था। वह वर्षा क्या थी, एक छोटा-मोटा प्रलय ही था। 

 

आँधी के झटकों और वर्षा की बौछारों से हम लोगों को बड़ी पीड़ा हुई, दिशा का ज्ञान न रहा। हम लोग अत्यन्त आतुर हो गये और एक-दूसरे का हाथ पकड़कर जंगल में इधर-उधर भटकते रहे। 

 

जब हमारे गुरुदेव सान्दीपनि मुनि को इस बात का पता चला, तब वे सूर्योदय होने पर अपने शिष्य, हम लोगों को ढूँढते हुए जंगल में पहुँचे और उन्होंने देखा कि हम अत्यन्त आतुर हो रहे हैं। वे कहने लगे- “आश्चर्य है, आश्चर्य है! पुत्रों! तुम लोगों ने हमारे लिये अत्यन्त कष्ट उठाया। सभी प्राणियों को अपना शरीर सबसे अधिक प्रिय होता है; परन्तु तुम दोनों उसकी भी परवा न करके हमारी सेवा में ही संलग्न रहे। 

 

गुरु के ऋण से मुक्त होने के लिये सत्-शिष्यों का इतना ही कर्तव्य है कि वे विशुद्ध भाव से अपना सब कुछ और शरीर भी गुरुदेव की सेवा में समर्पित कर दें। द्विज-शिरोमणियों! मैं तुम लोगों से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। 

 

तुम्हारे सारे मनोरथ, सारी अभिलाषाएँ पूर्ण हों, और तुम लोगों ने हमसे जो वेदाध्ययन किया है, वह तुम्हें सर्वदा कण्ठस्थ रहे तथा इस लोक एवं परलोक में कहीं भी निष्फल न हो। 

 

प्रिय मित्र! जिस समय हम लोग गुरुकुल में निवास कर रहे थे, हमारे जीवन में ऐसी-ऐसी अनेकों घटनाएँ घटित हुईं थीं। इसमें सन्देह नहीं कि गुरुदेव की कृपा से ही मनुष्य शान्ति का अधिकारी होता और पूर्णता को प्राप्त करता है।”

 

ब्राह्मणदेवता ने कहा- “देवताओं के आराध्यदेव जगद्गुरु श्रीकृष्ण! भला, अब हमें क्या करना बाकी है? क्योंकि आपके साथ, जो सत्यसंकल्प परमात्मा हैं, हमें गुरुकुल में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। 

 

प्रभो! छन्दोमय वेद, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, चतुर्विध पुरुषार्थ के मूल स्त्रोत हैं; और वे हैं आपके शरीर। वही आप वेदाध्ययन के लिये गुरुकुल में निवास करें, यह मनुष्य-लीला का अभिनय नहीं तो और क्या है?”

 

भगवान श्रीकृष्ण सबके मन की बात जानते हैं। वे ब्राह्मणों के परम भक्त, उनके क्लेशों के नाशक और संतों के एकमात्र आश्रय हैं। वे पूर्वोक्त प्रकार से उन ब्राह्मणदेवता के साथ बहुत देर तक बीतचीत करते रहे। 

 

अब वे अपने प्यारे सखा उन ब्राह्मण से तनिक मुस्कुराकर विनोद करते हुए बोले। उस समय भगवान सुदामा की ओर प्रेमभरी दृष्टि से देख रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “सुदामा ! आप अपने घर से मेरे लिए क्या उपहार लाये हैं? भाभी ने खली हाथ तो तुम्हे भेजा नहीं होगा ? कुछ तो बांध के दिया होगा |

 

मेरे प्रेमी भक्त जब प्रेम से थोड़ी-सी वस्तु भी मुझे अर्पण करते हैं तो वह मेरे लिए बहुत हो जाती है। 

 

परन्तु मेरे अभक्त यदि बहुत-सी सामग्री भी मुझे भेंट करते हैं तो उससे मैं सन्तुष्ट नहीं होता। जो पुरुष प्रेमभक्ति के फल-फूल अथवा पत्ता-पानी में से कोई भी वस्तु मुझे समर्पित करता है, तो मैं उस शुद्धचित्त भक्त का वह प्रेमोपहार केवल स्वीकार ही नहीं करता, बल्कि तुरंत भोग लगा लेता हूँ।

 

भगवान श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर भी उन ब्राह्मणदेवता ने लज्जावश उन लक्ष्मीपति को वे चार मुट्ठी चावल नहीं दिये। उन्होंने संकोच से अपना मुँह नीचे कर लिया था। 

 

भगवान श्रीकृष्ण समस्त प्राणियों के हृदय का एक-एक संकल्प और उनका अभाव भी जानते हैं। उन्होंने ब्राह्मण के आने का कारण, उनके हृदय की बात जान ली थी। 

 

अब वे विचार करने लगे कि “एक तो यह मेरा प्यारा सखा है, दूसरे इसने पहले कभी लक्ष्मी की कामना से मेरा भजन नहीं किया है।

 

इस समय यह अपनी पतिव्रता पत्नी को प्रसन्न करने के लिये उसी के आग्रह से यहाँ आया है। अब मैं इसे ऐसी सम्पत्ति दूँगा, जो देवताओं के लिये भी अत्यंत दुर्लभ है। 

 

भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसा विचार करके उनके वस्त्र की एक पोटली में बँधा हुआ देखा | यह क्या है, ऐसा कहकर स्वयं ही छीन लिया और बड़े आदर से पोटली खोलकर कहने लगे- “प्यारे मित्र! यह तो तुम मेरे लिए अत्यन्त प्रिय भेंट ले आये हो। ये चावल न केवल मुझे, बल्कि सारे संसार को तृप्त करने के लिए पर्याप्त हैं।” भगवान ने कहा इन चार मुट्ठी चावल पर चार लोक बार दूँ |

 

ऐसा कहकर उसमें से तीन  मुट्ठी चावल खा गए और दूसरी मुट्टी ज्यों ही भरी त्यों ही रुक्मिणीजी के रूप में स्वयं भगवती लक्ष्मीजी ने भगवान श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ लिया। क्योंकि वे तो एकमात्र भगवान के परायण हैं, उन्हें छोड़कर और कहीं जा नहीं सकतीं। 

 

रुक्मिणीजी ने कहा- “विश्वात्मन! बस, बस! मनुष्य को इस लोक में तथा मरने के बाद परलोक में भी समस्त संपत्तियों की समृद्धि प्राप्त करने के लिए यह एक मुट्टी चावल  ही बहुत है; क्योंकि आपके लिये इतना ही प्रसन्नता का हेतु बन जाता है।

 

ब्राह्मण सुदामा उस रात को भगवान श्रीकृष्ण के महल में ही रहे। उन्होंने बड़े आराम से वहाँ खाया-पिया और ऐसा अनुभव किया, मानो मैं वैकुण्ठ में ही पहुँच गया हूँ। 

 

ब्राह्मण ने श्री कृष्ण से बापिस अपने घर जाने की आज्ञा मांगी | परिवार से दूर होने की बात कहकर श्री कृष्ण ने उन्हें भारी मन से जाने की आज्ञा दे दी |

 

श्रीकृष्ण से ब्राह्मण को प्रत्यक्ष रूप में कुछ भी न मिला और उन्होंने श्री कृष्ण से कुछ माँगा नहीं है। वे अपने चित्त की करतूत पर कुछ लज्जित से होकर भगवान श्रीकृष्ण के दर्शनजनित आनन्द में डूबते-उतराते अपने घर की और चल पड़े।

 

वे मन-ही-मन सोचने लगे- “अहो, कितने आनन्द और आश्चर्य की बात है। ब्राह्मणों को अपना इष्टदेव मानने वाले भगवान श्रीकृष्ण की ब्राह्मण भक्ति आज मैंने अपनी आँखों से देख ली। धन्य हैं! जिनके वक्षःस्थल पर स्वयं लक्ष्मीजी सदा विराजमान रहती हैं, उन्होंने मुझ अत्यन्त दरिद्र को अपने हृदय से लगा लिया। 

 

कहाँ तो मैं अत्यन्त पापी और दरिद्र, और कहाँ लक्ष्मी के एकमात्र आश्रय भगवान श्रीकृष्ण! परन्तु उन्होंने ‘यह ब्राह्मण है’-ऐसा समझकर मुझे अपनी भुजाओं में भरकर हृदय से लगा लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने मुझे उस पलंग पर सुलाया, जिस पर उनकी प्राणप्रिया रुक्मिणीजी शयन करती हैं। मानो मैं उसका सगा भाई हूँ! कहाँ तक कहूँ? मैं थका हुआ था, इसलिये स्वयं उनकी पटरानी रुक्मिणीजी ने अपने हाथों चँवर डुलाकर मेरी सेवा की। 

 

ओह, देवताओं के आराध्यदेव होकर ब्राह्मणों को अपना इष्टदेव मानने वाले प्रभु ने पाँव दबाकर, अपने हाथों खिला-पिलाकर मेरी अत्यन्त सेवा-सुश्रुवा की और देवता के समान मेरी पूजा की। 

 

स्वर्ग, मोक्ष, पृथ्वी और रसातल की सम्पत्ति तथा समस्त योगसिद्धियों की प्राप्ति का मूल उनके चरणों की पूजा ही है। फिर भी परम दयालु श्रीकृष्ण ने यह सोचकर मुझे थोडा-सा भी धन नहीं दिया की कहीं यह दरिद्र धन पाकर बिलकुल मतवाला न हो जाय और मुझे न भूल बैठे।”

 

इस प्रकार मन-ही-मन विचार करते-करते ब्राह्मणदेवता अपने घर के पास पहुँच गये। वे वहाँ क्या देखते हैं कि सब-का-सब स्थान सूर्य, अग्नि और चन्द्रमा के सामान तेजस्वी रत्न निर्मित महलों से घिरा हुआ है। 

 

ठौर-ठौर चित्र-विचित्र उपवन और उद्यान बने हुए हैं तथा उसमें झुंड-के-झुंड रंग-बिरंगे पक्षी कलरव कर रहे हैं। 

 

सरोवरों में कुमुदिनी तथा श्वेत, नील और सौगन्धिक-भाँति-भाँति के कमल खिले हुए हैं; सुन्दर-सुन्दर स्त्री-पुरुष बन-ठनकर इधर-उधर विचर रहे हैं। 

 

उस स्थान को देखकर ब्रह्माणदेवता सोचने लगे- “मैं यह क्या देख रहा हूँ? यह किसका स्थान है? यदि यह वही स्थान है, जहाँ मैं रहता था तो यह ऐसा कैसे हो गया।” 

 

इस प्रकार वे सोच ही रहे थे कि देवताओं के समान सुन्दर-सुन्दर स्त्री-पुरुष गाजे-बाजे के साथ मंगलगीत गाते हुए उस महाभाग्यवान ब्राह्मण की अगवानी करने के लिये आये। 

 

पतिदेव का शुभागमन सुनकर ब्राह्मणी को अपार आनन्द हुआ और वह हड़बड़ा कर जल्दी-जल्दी घर से निकल आयी, वह ऐसी मालूम होती थी मानो मूर्तिमती लक्ष्मीजी ही कमलवन से पधारी हों। 

 

पतिदेव को देखते ही पतिव्रता पत्नी के नेत्रों में प्रेम और उत्कण्ठा के आवेग से आँसू छलक आये। उसने अपने नेत्र बंद कर लिये। ब्राह्मणी ने बड़े प्रेमभाव से उन्हें नमस्कार किया और मन-ही-मन आलिंगन भी।

 

प्रिय परीक्षित! ब्राह्मणपत्नी सोने का हार पहनी हुई दासियों के बीच में विमानस्थित देवांगना के समान अत्यन्त शोभायमान एवं देदीप्यमान हो रही थी। 

 

उसे इस रूप में देखकर वे विस्मित हो गये। उन्होंने अपनी पत्नी के साथ बड़े प्रेम से अपने महल में प्रवेश किया। उनका महल क्या था, मानो देवराज इन्द्र का निवासस्थान। इसमें मणियों के सैकड़ों खंभे खड़े थे। 

 

हाथी के दाँत के बने हुए और सोने के पात के मढ़े हुई पलंगों पर दूध के फेन की तरह श्वेत और कोमल बिछौने बिछ रहे थे। बहुत-से चँवर वहाँ रखे हुए थे, जिसमें सोने की डंडियाँ लगी हुई थीं। 

 

सोने के सिंहासन शोभायमान हो रहे थे, जिन पर बड़ी कोमल-कोमल गद्दियाँ लगी हुई थीं। ऐसे चँदोवे भी झिलमिला रहे थे, जिसमें मोतियों की लड़ियाँ लटक रही थीं। स्फटिकमणि की स्वच्छ भीतों पर पन्ने की पच्चीकारी की हुई थी। 

 

रत्ननिर्मित स्त्रीमूर्तियों के हाथ में रत्नों के दीपक जगमगा रहे थे।

 

इस प्रकार समस्त सम्पत्तियों की समृद्धि देखकर और उसका कोई प्रत्यक्ष कारण न पाकर, बड़ी गम्भीरता से ब्राह्मणदेवता विचार करने लगे कि मेरे पास इतनी सम्पत्ति कहाँ से आ गयी। वे मन-ही-मन कहने लगे- “मैं जन्म से ही भाग्यहीन और दरिद्र हूँ। फिर मेरी इस सम्पत्ति-समृद्धि का कारण क्या है? 

 

अवश्य ही परमैश्वर्यशाली यदुवंशशिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण के कृपाकटाक्ष के अतिरिक्त और कोई कारण नहीं हो सकता। यह सब कुछ उनकी करुणा की ही देन है। 

 

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण पूर्णकाम और लक्ष्मीपति होने के कारण अत्यन्त भोग-विलास सामग्रियों से युक्त हैं। इसलिये वे याचक भक्त को उसके मन का भाव जानकर बहुत कुछ दे देते हैं, परन्तु उसे समझते हैं बहुत थोड़ा; इसलिये सामने कुछ कहते नहीं। 

 

मेरे यदुवंशशिरोमणि सखा श्यामसुन्दर सचमुच उस मेघ से भी बढ़कर उदार हैं, जो समुद्र को भर देने की शक्ति रखने पर भी किसान के सामने न बरसकर उसके सो जाने पर रात में बरसता है और बहुत बरसने पर भी थोडा ही समझता है। 

 

मेरे प्यारे सखा श्रीकृष्ण देते हैं बहुत, पर उसे मानते हैं बहुत थोड़ा। और उनका प्रेमी भक्त यदि उनके लिये कुछ भी कर दे, तो वे उसको बहुत मान लेते हैं। देखो तो सही! मैंने उन्हें केवल एक मुट्ठी चिउड़ा भेंट किया था, पर उदारशिरोमणि श्रीकृष्ण ने उसे कितने प्रेम से स्वीकार किया। 

 

मुझे जन्म-जन्म उन्हीं का प्रेम, उन्हीं की हितैषिता, उन्हीं की मित्रता और उन्हीं की सेवा प्राप्त हो। मुझे सम्पत्ति की आवश्यकता नहीं, सदा-सर्वदा उन्हीं गुणों के एकमात्र निवासस्थान महानुभाव भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में मेरा अनुराग बढ़ता जाय और उन्हीं के प्रेमी भक्तों का सत्संग प्राप्त हो। 




 

अजन्मा भगवान श्रीकृष्ण सम्पत्ति आदि के दोष जानते हैं। वे देखते हैं कि बड़े-बड़े धनिकों का धन और ऐश्वर्य के मद से पतन हो जाता है। इसलिये वे अपने अदूरदर्शी भक्त को उसके माँगते रहने पर भी तरह-तरह की सम्पत्ति, राज्य और ऐश्वर्य आदि नहीं देते। यह उनकी बड़ी कृपा है।

 

अपनी बुद्धि से इस प्रकार निश्चय करके वे ब्राह्मणदेवता त्यागपूर्वक अनासक्त भाव से अपनी पत्नी के साथ भगवत्प्रसाद स्वरूप विषयों को ग्रहण करने लगे और दिनों दिन उनकी प्रेम-भक्ति बढ़ने लगी। 

 

देवताओं के भी आराध्यदेव भक्त-भयहारी यज्ञपति सर्वशक्तिमान भगवान स्वयं ब्राह्मणों को अपना प्रभु, अपना इष्टदेव मानते हैं। इसलिये ब्राह्मणों से बढ़कर और कोई भी प्राणी जगत में नहीं है। 

 

इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के प्यारे सखा उस ब्राह्मण ने देखा कि ‘यद्यपि भगवान अजित हैं, किसी के अधीन नहीं हैं; फिर भी वे अपने सेवकों के अधीन हो जाते हैं, उनसे पराजित हो जाते हैं,’ अब वे उन्हीं के ध्यान में तन्मय हो गये। 

 

ध्यान के आवेग से उनकी अविद्या की गाँठ कट गयी और उन्होंने थोड़े ही समय में भगवान का धाम, जो की संतों का एकमात्र आश्रय है, प्राप्त किया। 

 

ब्राह्मणों को अपना इष्टदेव मानने वाले भगवान श्रीकृष्ण की इस ब्राह्मण भक्ति को जो सुनता है, उसे भगवान के चरणों में प्रेमभाव प्राप्त हो जाता है और वह कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है।

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