कुंभ मेला 2033 | Kumbh Mela 2033

कुंभ मेला 2033 :  कुंभ भारत में धार्मिक तीर्थयात्रियों की दुनिया की सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन के रूप में माना जाता है जहां सभी तीर्थयात्री एकत्रित होकर पवित्र नदी गंगा में स्नान करते है।
 
कुंभ मेला का अर्थ, कुंभ का अर्थ ‘घड़ा’ और मेला का अर्थ संस्कृत में निष्पक्ष है। कुंभ मेले में भाग लेने व स्नान करने के लिए देश विदेश के कोने कोने से श्रदालु आते है।
 
कुंभ मेले में लगभग 10 करोड़ लोग एकत्रित होकर पवित्र नदी में स्नान करते है।
 
कुंभ मेले का आयोजन प्राचीन काल से हो रहा है, लेकिन मेले का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्ध तीर्थयात्री ह्वेनसांग के लेख से मिलता है जिसमें छठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासन में होने वाले कुंभ का प्रसंगवश वर्णन किया गया है।
 
कुंभ मेले का आयोजन चार जगहों पर होता है:- हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन।
 
समुद्र मंथन की कथा में कहा गया है कि कुंभ पर्व का सीधा सम्बन्ध तारों से है। अमृत कलश को स्वर्गलोक तक ले जाने में जयंत को 12 दिन लगे।
 
देवों का एक दिन मनुष्यों के 1 वर्ष के बराबर है। इसीलिए तारों के क्रम के अनुसार हर 12वें वर्ष कुंभ पर्व विभिन्न तीर्थ स्थानों पर आयोजित किया जाता है।
 
 
युद्ध के दौरान सूर्य, चंद्र और शनि आदि देवताओं ने कलश की रक्षा की थी, अतः उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, तब कुंभ का योग होता है और चारों पवित्र स्थलों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल पर क्रमानुसार कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है।
 
अर्थात अमृत की बूंदे छलकने के समय जिन राशियों में सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति की स्थिति के विशिष्ट योग के अवसर रहते हैं, वहां कुंभ पर्व का इन राशियों में गृहों के संयोग पर आयोजन होता है।
 
इस अमृत कलश की रक्षा में सूर्य, गुरु और चन्द्रमा के विशेष प्रयत्न रहे थे। इसी कारण इन्हीं गृहों की उन विशिष्ट स्थितियों में कुंभ पर्व मनाने की परम्परा है।
 
यह मेला भारत में चार स्थानों पर हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और इलाहबाद में डेढ़ महीने के लिए बारी-बारी से हर 3 साल में और प्रत्येक के लिए हर 12 साल में आयोजित किया जाता है।
 
ये मेला हरिद्वार में पवित्र गंगा, नासिक में पवित्र गोदावरी, उज्जैन में पवित्र शिप्रा तथा इलाहबाद में पवित्र गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम के स्थान पर आयोजित किया जाता है।
 
अर्द्ध (आधा) कुंभा मेला का आयोजन भी किया जाता है जोकि सिर्फ दो स्थानोें हर 6-6 सालों के अन्तराल में हरिद्वार और इलाहबाद में आयोजित किया जाता है।
 
कुंभ मेले की त्यारी 6 महीने पहले से कि जाती है ताकि मेले में आये सभी तीर्थयात्रियों की जरूरतों को पूरा किया जा सके।
 

कुंभ क्या है ?

 
कलश को कुंभ कहा जाता है। कुंभ का अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है।
 
देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रह थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं।
 
जहां जब ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर तब कुंभ का आयोजन होता है। उन तीन नदियों के नाम है:- गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा।
 
ऐसा माना जाता है कि जब देवताओं और राक्षसों द्वारा समुद्र मंथन किया गया था और समुद्र मंथन से अमृत निकला था जिसे पाने के लिए दोनों पक्षों के बीच युद्व हुआ और उस दौरान उसकी चार बुँन्दे इन चार स्थानों में गिर थी, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए इस कुंभ में स्नान करता है ऐसा हिन्दुं धर्म में माना जाता है।
 
मध्यकालीन हिन्दु धर्मशास्त्र के अनुसार इस तीर्थ मेले की उत्पत्ति के अवलोकन सबसे लोकप्रिय मध्ययुगीन पुराणों में से एक भगवत पुराण में पाया जाता है और समुद्र मंथन का भगवत पुराण, विष्णु पुराण, महाभारत और रामायण में उल्लेख किया गया है।
 
कुंभ मेले का आयोजन प्राचीन काल से हो रहा है, लेकिन मेले का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्ध तीर्थयात्री ह्वेनसांग के लेख से मिलता है जिसमें आठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासन में होने वाले कुंभ का प्रसंगवश वर्णन किया गया है।
 
इस मेले का आयोजन राशि नक्षत्रों के अनुसार किया जाता है। मेले में सबसे पहले स्नान करने का अधिकार ऋषि-मुनियों व साधु-संत को दिया जाता है जिसको पहले, दुसरे और तीसरे चरणों में बाटा जाता है और फिर मेले में आये तीर्थयात्री स्नान करते है।
 

अर्धकुंभ क्या है ?

अर्ध का अर्थ है आधा। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है।
 
पौराणिक ग्रंथों में भी कुंभ एवं अर्ध कुंभ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है। कुंभ पर्व हर 3 साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है।
 
हरिद्वार के बाद कुंभ पर्व प्रयाग नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है। प्रयाग और हरिद्वार में मनाए जानें वाले कुंभ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाए जाने वाले कुंभ पर्व के बीच में 3 सालों का अंतर होता है।
 
यहां माघ मेला संगम पर आयोजित एक वार्षिक समारोह है।
 

सिंहस्थ कुंभ क्या है ? 

सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से है। सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है।
 
इसके अलावा सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुंभ पर्व का आयोजन गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। इसे महाकुंभ भी कहते हैं, क्योंकि यह योग 12 वर्ष बाद ही आता है। इस कुंभ के कारण ही यह धारणा प्रचलित हो गई की कुंभ मेले का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष में होता है, जबकि यह सही नहीं है।
 

कुंभ का पर्व इन चार जगहों पर होता है 

हरिद्वार में कुंभ :

हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है। कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है।
 
हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का भी आयोजन होता है। 
 

प्रयाग में कुंभ :

प्रयाग राज कुंभ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह 12 वर्षो के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है।
 
ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब कुंभ मेले का आयोजन प्रयाग में किया जाता है।  
 
अन्य मान्यता अनुसार मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुंभ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है।
 
एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुंभ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है।
 

 नासिक में कुम्भ:

 
12 वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुंभ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है। सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुकुंभ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है।
 
अमावस्या के दिन बृहस्पति, सूर्य एवं चन्द्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुंभ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है।
 

उज्जैन में कुंभ:

 
सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है। इसके अलावा कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र के साथ होने पर एवं बृहस्पति के तुला राशि में प्रवेश होने पर मोक्षदायक कुंभ उज्जैन में आयोजित होता है।
 
 
ब्रह्म पुराण एवं स्कंध पुराण के 2 श्लोकों के माध्यम इसे समझा जा सकता है।
 
‘।।विन्ध्यस्य दक्षिणे गंगा गौतमी सा निगद्यते उत्त्रे सापि विन्ध्यस्य भगीरत्यभिधीयते.’
‘एव मुक्त्वाद गता गंगा कलया वन संस्थिता गंगेश्वेरं तु यः पश्येत स्नात्वा शिप्राम्भासि प्रिये।।’
 

kumbh mela 2033
Kumbh Mela 2033

  1. कुंभ मेला 2033 का पहला शाही स्नान कब है ?

    महाकुंभ का पहला शाही स्नान 28 फरवरी 2033 को महाशिवरात्रि के मौके पर होगा

  2. पहला कुंभ स्नान कौन करता है ?

    हिन्दू परंपराओं के अनुसार संन्यासी अखाड़े हरिद्वार में पहला शाही स्नान करते हैं

  3. ज्योतिष मान्यता के अनुसार कुंभ मेला 2033 की कब शुरुआत होगी ?

    ज्योतिष पंचांग और मान्यताओं के अनुसार 17-18 मार्च 2033 को कुंभ की शुरुआत होगी। कुंभ 2033 की शुरुआत 17-18 मार्च की मध्य रात्रि से होगी |

  4. कब होगा का मुख्य कुंभ मेला 2033 सनान ?

    कुंभ के इतिहास में अब तक का सबसे महत्वपूर्ण शाही सनान 14 अप्रैल 2033 को होगा।

    इस दिन मेष संक्रांति के साथ ही चैत्र पूर्णिमा का स्नान भी है। मेष संक्रांति का स्नान साधू संन्यासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, जबकि चैत्र पूर्णिमा का स्नान बैरागियों का महत्वपूर्ण स्नान है। बैशाखी के साथ ही यह दोनों पर्व एक ही दिन पड़ रहे है।

    इसलिए 14 अप्रैल 2033 का हरिद्वार में मुख्य स्नान होगा।

  5. प्रत्येक 12 वर्ष में कुंभ मेला किस स्थान पर आयोजित किया जाता है ?

    कुंभ मेले का आयोजन चार जगहों पर होता है:- हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन।


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