आस्था का केंद्र महालक्ष्मी (अम्बाबाई) मंदिर कोल्हापुर

 

भारत में बहुत सारे मंदिर हैं, जहां आस्था और विश्वास का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। महालक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर अपने आप में काफी अद्भुत एवं आस्था का प्रतीक है।   
 
भारत में महाराष्ट्र के कोल्हापुर के श्री महालक्ष्मी (अम्बाबाई) मंदिर – Mahalakshmi Temple हिंदू धर्म के 108 शक्ति पीठों में से एक है। यह मंदिर विशेष धार्मिक स्थान माना जाता है।


महालक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर 

महालक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर 

 
 
कोल्हापुर यह शहर पुणे के दक्षिण में लगभग 225 किमी पंचगंगा नदी के किनारे पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि भगवान् विष्णु और लक्ष्मी इस जगह में रहते हैं।
 
इस मंदिर को पहली बार 7 वीं शताब्दी में बनाया गया था। कई पुराणों में कहा जाता है यह दर्शाते हुए सबूत हैं कि देवगिरि राजवंशों के कोंकण राजा कामदेव, चालुक्य, शिलाहार, यादवों ने इस शहर का दौरा किया था। आदि शंकराचार्य ने भी दौरा किया। छत्रपति शिवाजी महाराज और संभाजी ने राज्य किया।
 
109 एडी में, कर्नाडु ने जंगल काट दिया और मंदिर को प्रकाश में लाया। 109 एडी में, कर्नाडु ने जंगल काट दिया और मंदिर को प्रकाश में लाया। 8 वीं शताब्दी में, भूकंप के कारण मंदिर नीचे गिर गया।
 
9वीं शताब्दी में, गांधीवाडिक्स (राजा) ने महाकाली मंदिर के निर्माण से मंदिर का विस्तार किया। 1178-1209 के दौरान, राजा जयसिंग और सिंधवा के शासनकाल में, दक्षिण द्वार और आतिबलेश्वर मंदिर का निर्माण किया गया।
 
1218 में, यादव राजा टोलम ने महाद्वार बनाया, और देवी को गहने की पेशकश की। इसके अलावा, शिलाहार ने महा सरस्वती मंदिर का निर्माण किया। वह एक जैन होने के कारण, 64 मूर्तियां बनाई गईं।
 
उस समय पद्मावती नामक नई मूर्ति स्थापित की गई थी। इसके अलावा, चालुक्य के समय में मंदिर से पहले गणपति स्थापित किया गया था। मूल मंदिर की कई दीवारों में जैन मूर्तियां हैं और इन्हें देखा जा सकता है। 13 वीं शताब्दी में, शंकराचार्य ने नगर खाना और कार्यालय, दीपामलस को बनाया।
 
Mahalakshmi temple kolhapur
Mahalakshmi Temple, Kolhapur
बाद में मराठा साम्राज्य के समय, मंदिर की मरम्मत की गई। हालांकि भारत के इस हिस्से पर कई आक्रमणों ने सुंदर मूर्तियों के कुछ नुकसान किए हैं।
 
1712-1792 (संभाजी शासन) के दौरान नरहर भाट शास्त्री के पास एक सपना था जिसमें उन्होंने संभाजी महाराज को बताया।
 
मुग़ल शासनकाल में, भक्तों ने सुरक्षा के लिए मूर्ति को छिपा दिया था। सांगवाकर के सपने पर विश्वास करते हुए, संभाजी महाराज ने एक खोज शुरू की । यह मूर्ति कपिल तेरथ मार्केट में एक घर में मिली थी।
 
8 नवंबर 1723 को संभाजी महाराज के पत्र के अनुसार, पन्हाला की सिंधुजी हिंदुराव घोरपड़े ने 26 सितंबर 1712 (सोमवार, अश्विन विजिया दशमी) पर फिर से मूर्ति स्थापित की। भक्तों की संख्या बढ़ी, और समय के कारण, देवी महाराष्ट्र के देवता बन गयी।
 

महालक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर का आकर्षण

 
महालक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर की विशेषता यह है कि जनवरी और फरवरी के महीने में रथ सप्तमी के दौरान यहां सूर्य भगवान अपनी किरणों से स्वयं देवी महा लक्ष्मी का चरण छुकर अभिषेक करते हैं।
 
पहले सूरज की किरणें देवीजी की पैरों पर गिरती है, देवी के मध्य भाग को छूते हैं और महालक्ष्मी के मुख मंडल को रोशनी करती हैं, जो की एक अतभुत दृश्य हैं।
 

महालक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर का भव्‍य स्‍थापत्‍य 

 
महालक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर का स्‍थापत्‍य अत्‍यंत भव्‍य और प्रभावशाली है। यहां एक काले पत्थर के मंच पर देवी महालक्ष्मीजी की चार हस्थों वाली प्रतिमा, सिर पर मुकुट पहने हुए स्‍थापित है। माता की प्रतिमा को बहुमूल्‍य गहनों से सजाया गया है।
 
उनका मुकुट भी लगभग चालीस किलोग्राम वजन का है जो बेशकीमती रत्‍नों से मड़ा हुआ है। काले पत्थर से निर्मित महालक्ष्मी की प्रतिमा की ऊंचाई करीब 3 फीट है। मंदिर की एक दीवार पर श्री यंत्र पत्थर पर उकेरा गया है।
 
देवी की मूर्ति के पीछे पत्‍थर से बनी उनके वाहन शेर की प्रतिमा भी मौजूद है। वहीं देवी के मुकुट में भगवान विष्णु के प्रिय सर्प शेषनाग का चित्र बना हुआ है।
 
देवी महालक्ष्मी ने अपने चारों हाथों में अमूल्य प्रतीक चिन्‍ह थामे हुए हैं, जैसे उनके निचले दाहिने हाथ में निम्बू फल, ऊपरी दायें हाथ में गदा कौमोदकी है जिसका सिरा नीचे जमीन पर टिका हुआ है।
 
ऊपरी बायें हाथ में एक ढाल और निचले बायें हाथ में एक पानपात्र है। अन्य हिंदू मंदिरों से अलग पूरब या उत्तर दिशा की बजाये यहां महालक्ष्मी पश्चिम दिशा की ओर मुख करे हुए स्‍थापित हैं।
 
देवी के सामने की पश्चिमी दीवार पर एक छोटी सी खुली खिड़की है, जिससे होकर सूरज की किरणें देवी लक्ष्मी का पद अभिषेक करते मध्य भाग पर आती हैं और अंत में उनका मुखमंडल को रोशन करती हैं। 

 


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