राजपूत सम्राट पृथ्वीराज चौहान | Rajput King Prithviraj Chauhan

पृथ्वीराज चौहान जन्म तिथि,पृथ्वीराज चौहान के मित्र,पृथ्वीराज चौहान की उम्र,पृथ्वीराज चौहान का युद्ध,पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु कैसे हुई

राजपूत सम्राट पृथ्वीराज चौहान या राय पिथौरा के नाम से जाने जाते थे, वह सबसे महान राजपूत शासकों में से एक थे।

चौहान वंश के प्रसिद्ध शासक हैं जिन्होंने सपदा बख्शा पर शासन किया था जो एक पारंपरिक चाहमान क्षेत्र है। वर्तमान भारत के भूगोल के हिसाब से उन्होंने राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, मध्य प्रदेश और पंजाब के कुछ हिस्सों में उनका राज्य था।

उन्होंने अजमेर को अपनी राजधानी के रूप में रखा था, लेकिन कई लोक कथाएं उन्हें भारत के राजनीतिक केंद्र दिल्ली के राजा के रूप में वर्णित करती हैं।

पृथ्वीराज चौहान महान शूरवीर योद्धा थे, जिनके साहस और पराक्रम की गाथाएं भारतीय इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में लिखी गयी है। भारत के हर नागरिक इनकी वीर गाथा पढ़कर या सुनकर गर्व होता है | पृथ्वी राज चौहान आर्कषक कद-काठी और सैन्य विद्याओं में निपुण योद्धा थे। अपने अद्भुत और अदम्य साहस से मुगलों को धूल चटाई थी।

उनकी वीरता लोकप्रिय गाथा यह है की मोहम्मद गोरी ने उन्हें बंधक बना लिया गया था और गरम सलाखों से उनकी आँखों में डालकर अँधा बना दिया, तब भी उन्होंने मोहम्मद गौरी को उसी के दरबार में मार गिराया था।

पृथ्वीराज चौहान के बारे मे संक्षेप मे परिचय

पूरा नामपृथ्वीराज चौहान (पृथ्वीराज तृतीय)
अन्य नामभरतेश्वर, पृथ्वीराज तृतीय, हिन्दूसम्राट, सपादलक्षेश्वर, राय पिथौरा
पृथ्वी राज्य चौहान की जन्मतिथि1 जून, 1163
जन्म स्थानपाटण, गुजरात, भारत
पृथ्वी राज्य चौहान की मृत्यु तिथि11 मार्च, 1192
पृथ्वी राज्य चौहान का मृत्यु स्थानअजमेर, राजस्थान
पृथ्वी राज्य चौहान की उम्र43 साल
राष्ट्रीयताभारतीय
धर्महिन्दू
वंशचौहानवंश
जातिक्षत्रिय
वैवाहिक स्थितिविवाहित
पृथ्वी राज्य चौहान के पिताराजा सोमेश्वर चौहान।
पृथ्वी राज्य चौहान की माता का नामकर्पुरा देवी।
पृथ्वी राज्य चौहान की पत्नीराणी संयोगिता।
पृथ्वी राज्य चौहान की संतान का नामगोविंदराजा चौहान।
पृथ्वी राज्य चौहान के भाईहरिराज (छोटा)
पृथ्वी राज्य चौहान की बहनपृथा (छोटी)

पृथ्वीराज चौहान का जन्म

भारतीय इतिहास के सबसे महान और साहसी योद्धा पृथ्वीराज चौहान, चौहान वंश के क्षत्रिय शासक सोमेश्वर और कर्पूरा देवी के घर साल 1149 में जन्में थे। ऐसा कहा जाता है कि वे उनके माता-पिता की शादी के कई सालों बाद काफी पूजा-पाठ और मन्नत मांगने के बाद पृथ्वीराज का जन्म हुआ | पृथ्वी राज चौहान माता पिता के विवाह के 12 वर्षो के पश्चात हुआ |

पृथ्वी राज चौहान का जन्म उनके राज्य के दुश्मनों के लिए आँख का कांटा बन गया और राज्य मे उनकी हत्या के षड्यंत्र रचे जाने लगे जिससे वो हर बार बच जाते | मात्र 11 वर्ष की उम्र मे पृथ्वीराज के पिता का देहांत हो गया, उसके बाद राजपाठ का दाइत्व अच्छी तरह से निभाए और लगातार अन्य राजाओ को पराजित कर अपने राज्य का विस्तार करते गए.

राज घराने में पैदा होने कारण शुरु से ही पृथ्वीराज चौहान का पालन-पोषण काफी सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण अर्थात वैभवपूर्ण शाही वातावरण में हुआ था।

पृथ्वीराज चौहान ने सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ से शिक्षा प्राप्त की थी जबकि युद्ध और शस्त्र विद्या की शिक्षा उन्होंने अपने गुरु श्री राम जी से प्राप्त की थी। पृथ्वीराज चौहान बचपन से ही बेहद साहसी, वीर, बहादुर, पराक्रमी और युद्ध कला में निपुण थे।

बचपन में ही पृथ्वीराज चौहान ने शब्द भेदी बाण चलाने की अद्भुत कला सीख ली थी, जिसमें वे बिना देखे आवाज के आधार पर निशाना लगा सकते थे।

पृथ्वीराज चौहान के मित्र

पृथ्वीराज चौहान के करीबी मित्र एवं कवि चंदबरदाई ने अपनी काव्य रचना “पृथ्वीराज चौहान रासो” में यह भी उल्लेख किया है कि पृथ्वीराज चौहान अश्व व हाथी नियंत्रण विद्या में भी निपुण थे

चंदबरदाई तोमर वंश के शासक अनंगपाल की बेटी के पुत्र थे, जिन्होंने बाद में पृथ्वीराज चौहान के सहयोग से पिथोरागढ़ का निर्माण किया था, जो दिल्ली में वर्तमान में भी पुराने किले के नाम से मशहूर है।

पृथ्वीराज चौहान जब महज 11 साल के थे तभी उनके पिता सोमेश्वर चौहान की एक युद्ध में वीरगति हो गई, अपने पीता के बाद वे अजमेर के उत्तराधिकारी बने और एक आदर्श राजा की तरह अपनी प्रजा की सभी उम्मीदों पर खरे उतरे। इसके अलावा पृथ्वी राज चौहान को दिल्ली पर उत्तराधिकार भी मिला |

पृथ्वीराज चौहान की माता कर्पूरा देवी अपने पिता अनंगपाल की इकलौती बेटी थी, इसलिए उनके पिता ने अपने दामाद और अजमेर के शासक सोमेश्वर चौहान से पृथ्वीराज चौहान की प्रतिभा को भांपते हुए अपने सम्राज्य का उत्तराधिकारी बनाने की इच्छा प्रकट की थी, जिसके तहत साल 1166 में उनके नाना अनंगपाल की मौत के बाद पृथ्वीराज चौहान दिल्ली के राजसिंहासन पर बिठाया गया और कुशलतापूर्वक उन्होंने दिल्ली की सत्ता संभाली।

पृथ्वीराज चौहान एक आदर्श शासक के तौर पर उन्होंने अपने सम्राज्य को मजबूती देने के कार्य किए और इसके विस्तार करने के लिए कई अभियान भी चलाए और बड़ी जल्दी वे एक वीर योद्धा एवं लोकप्रिय शासक के तौर पर पहचाने जाने लगे थे ।

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Prithviraj Chauhan

पृथ्वीराज चौहान और राजकुमारी संयोगिता की प्रेम कहानी

पृथ्वीराज चौहान और उनकी रानी संयोगिता का प्रेम आज भी राजस्थान के इतिहास मे स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है | दोनों ही एक दूसरे से बिना मिले केवल चित्र देखकर एक दूसरे के प्यार मे मोहित हो चुके थे |

पृथ्वीराज चौहान के अद्भुत साहस और वीरता के किस्से हर तरफ फैले हुए थे, वहीं जब राजा जयचंद की बेटी संयोगिता ने पृथ्वी राज चौहान की बहादुरी और आर्कषण के किस्से सुने तो उनके हृदय में पृथ्वीराज चौहान के लिए प्रेम भावना उत्पन्न हो गईं और वे गुप्त रुप से पृथ्वीराज चौहान को पत्र भेजने लगीं।

संयोगिता के पिता जयचंद्र पृथ्वीराज के साथ ईर्ष्या भाव रखते थे, तो अपनी पुत्री का पृथ्वीराज चौहान से विवाह का विषय तो दूर दूर तक सोच भी नहीं सकते थे | जयचंद्र केवल पृथ्वीराज को नीचा दिखाने का मौका ढूंढते रहते थे

वहीं दूसरी तरफ जब रानी संयोगिता के बारे में उनके पिता राजा जयचंद को पता चला तो उन्होंने अपनी बेटी संयोगिता के विवाह के लिए स्वयंवर करने का फैसला लिया।

जयचंद्र केवल पृथ्वीराज को नीचा दिखाने का मौका ढूंढते रहते थे, यह मौका उन्हे अपनी पुत्री के स्व्यंवर मे मिला. राजा जयचंद्र ने अपनी पुत्री संयोगिता का स्व्यंवर आयोजित किया| पृथ्वीराज चौहान नहीं चाहते थे कि क्रूर और घमंडी राजा जयचंद का भारत में प्रभुत्व हो, इसलिए उसने राजा जयचंद का इस बात का विरोध भी किया था।

राजा जयचंद के मन में पृथ्वीराज चौहान के प्रति घृणा और भी ज्यादा बढ़ गई थी, जिसके बाद उन्होंने अपनी बेटी के स्वयंवर के लिए देश के कई छोटे-बड़े महान राजाओं और योद्धाओं को न्योता दिया, लेकिन पृथ्वीराज चौहान को अपमानित करने के उद्देश्य से उन्हें न्योता नहीं भेजा, और द्वारपालों के स्थान पर स्व्यंवर मे पृथ्वीराज की मूर्ति द्वारपाल के स्थान पर रखी।

पृथ्वीराज चौहान जयचंद की नीचता भरी हरकत को समझ गए और उन्होंने अपनी प्रेमिका को पाने के लिए एक गुप्त योजना बनाई। स्वयंबर में उस समय हिन्दू धर्म में लड़कियों को अपना मनपसंद वर चुनने का अधिकार था, वहीं अपने स्वयंवर में जिस भी व्यक्ति के गले में वरमाला डालती थी वो उस राजा की पत्नी बन जाती |

स्वयंवर के दिन जब कई बड़े-बडे़ राज्यों के राजा, अपने सौंदर्य के लिए पहचानी जाने वाली राजकुमारी संयोगिता से विवाह की इच्छा लिए स्वयंबर मेइओन शामिल हुए, वहीं स्वयंवर में संयोगिता अपने हाथों मे वरमाला लेकर एक-एक कर सभी राजाओं के सामने से गुजरी और जब उसकी नजर द्धार पर स्थित पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति पर पड़ी, तब उन्होंने द्धारपाल बने पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति के गले में हार डाल दिया, जिसे देखकर स्वयंवर में आए सभी राजा खुद को अपमानित महसूस करने लगे।

पृथ्वीराज चौहान अपनी गुप्त योजना के मुताबिक द्धारपाल की प्रतिमा के पीछे छिपकर खड़े थे और फिर सामने आते हुए उन्होंने राजा जयचंद के सामने रानी संयोगिता को उठाया और सभी राजाओं को युद्ध के लिए ललकार कर वे अपने घोड़े पर सवार होकर वहां से भाग गए |

राजा जयचंद गुस्से से आग बबूला हो गए और इसका बदला लेने के लिए उनकी सेना ने पृथ्वीराज चौहान का पीछा किया, लेकिन उनकी सेना पृथ्वीराज चौहान को पकड़ने में असमर्थ रही और दिल्ली आकार दोनों का पूरी विधि से विवाह संपन्न हुआ | इसके बाद राजा जयचंद और पृथ्वीराज के बीच दुश्मनी और भी बढ़ गयी.

इसके बाद राजा जयचंद और पृथ्वीराज चौहान के बीच साल 1189 और 1190 में युद्ध हुआ था , जिसमें कई लोगों की जान चली गई और दोनो सेनाओं को भारी नुकसान हुआ था।

पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी का पहला युद्ध

चौहान वंश के सबसे बुद्धिमान और दूरदर्शी शासक पृथ्वीराज चौहान ने अपने शासनकाल में अपने राज्य को एक सुखद मुकाम पर पहुंचा दिया था, पृथ्वीराज चौहान अपने राज्य में अपनी कुशल नीतियो के चलते अपने राज्य का विस्तार करने हर संभव प्रयास किया और सफलता भी मिली थी।

पृथ्वीराज चौहान पंजाब में भी अपना शासन चाहते थे, लेकिन उस वक़्त पंजाब में मुहम्मद शाबुद्धीन ग़ोरी का शासन था | पृथ्वीराज चौहान की पंजाब पर राज करने की इच्छा मुहम्मद ग़ोरी के साथ युद्ध करके ही पूरी हो सकती थी जिसके बाद पृथ्वीराज चौहान ने अपनी विशाल सेना के साथ मुहम्मद गौरी पर आक्रमण कर दिया।

इस हमले के बाद पृथ्वीराज चौहान ने सरहिंद, सरस्वती, हांसी को जीतकर अपना राज्य स्थापित कर लिया, लेकिन इसी बीच अनहिलवाड़ा में जब मुहम्मद ग़ोरी की सेना ने हमला किया तो पृथ्वीराज चौहान की सेना कई मोर्चों पर एक साथ लड़ने पर कमज़ोर पड़ गयी और इसके चलते पृथ्वराज चौहान को सरहिंद के किले से अपना अधिकार खोना पड़ा।

इसके बाद पृथ्वीराज चौहान ने अकेले ही मुहम्मद ग़ोरी का मकुाबला किया, मुहम्मद ग़ोरी इस युद्ध में बुरी तरह घायल हो गया, मुहम्मद ग़ोरी को इस युद्ध को छोड़कर भागना पड़ा, हांलाकि इस युद्ध का कोई निस्कर्ष नहीं निकला। यह युद्ध सरहिंद किले के पास तराइन नाम जगह पर हुआ, इसलिए इसे तराइन का युद्ध भी कहते हैं। इस युध्द मे पृथ्वीराज ने लगभग 7 करोड़ रूपय की संपदा अर्जित की, जिसे उसने अपने सैनिको मे बाट दिया.

पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के अन्य युद्ध

वीर योद्धा पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद ग़ोरी को 16 बार पराजित किया था, लेकिन हर बार उन्होंने उसे जीवित ही छोड़ दिया था

राजा जयचंद्र अपनी पुत्री संयोगिता के अपहरण के बाद पृथ्वीराज के लिए दुश्मनी बढ़ती चली गयी और वो हर कीमत पर पृथ्वी राज चौहान को हराना चाहते थे | पृथ्वीराज के खिलाफ अन्य राजपूत राजाओ को भी भड़काने लगे और किसी तरह का साथ न देने के लिए भी कहा गया |

राजा जयचंद को मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज के युध्द के बारे मे पता चला, तो वह पृथ्वीराज के खिलाफ मुहम्मद गौरी के साथ देने के लिए त्यार हो गया| दोनों ने मिलकर 2 साल बाद सन 1192 मे पुनः पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण किया था और यह विषन युद्ध तराई के मैदान मे हुआ |

इस युध्द के समय जब पृथ्वीराज के मित्र चंदबरदाई ने अन्य राजपूत राजाओ से पृथ्वी राज चौहान की मदद के लिए आग्रह किया, तो संयोगिता के स्व्यंबर मे हुई घटना के कारण उन्होने ने भी इस मदद को देने से इंकार कर दिया था | पृथ्वीराज चौहान इस युद्ध में अकेले पढ़ गए और उन्होने अपने 3 लाख सैनिको के द्वारा गौरी की सेना का सामना किया |

इस मौके का फायदा उठाते हुए राजा जयचंद ने पृथ्वीराज चौहान का भरोसा जीतने के लिए अपना सैन्य बल पृथ्वीराज चौहान की मदद के लिए भेज दिया |

उदार स्वभाव के पृथ्वीराज चौहान राजा जयचंद की इस षड़यंत्र को नहीं समाज पाए और जयचंद्र की धोखेबाज सैनिकों ने पृथ्वीराज चौहान की सैनिकों को मारना शुरू कर दिया और इस युद्ध के बाद पृथ्वीराज चौहान और उनके मित्र चंदरबदाई को अपने जाल में फंसाकर उन्हें बंधक बना लिया | राजा जयचंद्र को भी उसकी गद्दारी का परिणाम मिला और उसे भी मार डाला गया. अब पूरे पंजाब, दिल्ली, अजमेर और कन्नोज मे मुहम्मद गौरी का शासन था |

पृथ्वी राज चौहान ने मुहम्मद गौरी को बीच सभा में मारा था

पृथ्वीराज चौहान से कई बार युद्ध में हारने के बाद मुहम्मद ग़ोरी अंदर ही अंदर प्रतिशोध से भर गया था, इसलिए बंधक बनाने के बाद पृथ्वीराज चौहान को उसने कई शारीरिक यातनाएं दीं |

यातनाएं सहने के बाद भी वीर योद्धा की तरह पृथ्वीराज चौहान एक वीर पुरुष की तरह अडिग रहे और दुश्मन के दरबार में भी उनको ज़िंदगी का मोह नहीं और न कोई मलाल था | पृथ्वीराज चौहान अमानवीय कृत्यों को अंजाम देने वाले मुहम्मद ग़ोरी की आंखों में आंखे डालकर पूरे आत्मविश्वास के साथ देखते थे और बात करते थे |

यह सब देखकर मुहम्मद गौरी ने उन्हें अपनी आंखे नीचे करने का आदेश दिया लेकिन इस राजपूत योद्धा पर थोड़ा भी इसका प्रभाव नहीं पड़ा, जिसको देखकर मुहम्मद गौरी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और उसने पृथ्वीराज चौहान की आंखे गर्म सलाखों से जला देने का आदेश दिया। इसके बाद भी क्रूर मुहम्मद गौरी ने उन पर कई जुल्म और सितम दाए और अंत में पृथ्वीराज चौहान को जान से मारने का फैसला किया।

इससे पहले मुहम्मद ग़ोरी की पृथ्वीराज चौहान को मार देने की सजा पूरी होती, पृथ्वीराज चौहान के बेहद करीबी मित्र चंद्रवरदाई ने मुहम्मद ग़ोरी को पृथ्वीराज चौहान की शब्दभेदी वाण चलाने की खूबी के बारे में बताया |

मुहम्मद ग़ोरी इस पर हंसने लगा कि एक अंधा वाण कैसे चला सकता है, लेकिन उसको इस कला को देखने की उत्सुक्तता भी जाग गयी | राजा पृथ्वी राज चौहान की इस कला को देखने के लिए मुहम्मद गौरी ने अपने दरबार में तीरंदाजी प्रतियोगिता का आयोजन करने के लिए राजी हो गया।

इस प्रतियोगिता में शब्दभेदी बाण से निशाना साधने के उस्ताद पृथ्वीराज चौहान ने अपने मित्र चंदबरदाई के दोहों के माध्यम से अपनी यह अद्भुत कला प्रदर्शित की और भरी सभा में पृथ्वीराज चौहान ने चंदबरदाई के दोहे “चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान।” की सहायता से मुहम्मद ग़ोरी की दूरी और दिशा को पृथ्वीराज चौहान उनके संस्कृत में बोले गए शब्दों के अर्थ को समझ गए और उसने सीधा एक बाण चलाया जो मोहम्मद गोरी के मस्तिष्क माथे में जाकर के लगा और वहीं पर उसकी मृत्यु हो गई |

पृथ्वीराज चौहान और उनके मित्र ने अपने दुश्मनों से हाथों मरने के बजाय एक-दूसरे पर वाण चलाकर अपनी ज़िंदगी खत्म कर दी,जब राजकुमारी संयोगिता को इस बात की खबर लगी तो वे उन्होंने भी अपने प्राणों का त्याग कर दिया |

अमर पात्र इतिहास के, राय पिथोरा शान ।
गर्व करे भू भारती, जय जय जय चौहान ॥


FAQs

  1. पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई ने किस किले का निर्माण करवाया था

    पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई ने मिलकर पिथोरगढ का निर्माण किया था, जिसे आज दिल्ली मे पुराने किले के नाम से जाना जाता है।

  2. पृथ्वीराज चौहान के मित्र ने किस पुस्तक में उनके जीवन का वर्णन किया है ?

    चंदबरदाई द्वारा पृथ्वीराज चौहान के जीवन के उपर एक कविता लिखी गई है, जिसका नाम ‘पृथ्वीराज रासो’ है, इसमे चंदबरदाई ने पृथ्वीराज चौहान के जीवन के अहम बातो को कविता के माध्यम से व्यक्त किया है।

  3. पृथ्वी राज चौहान ने कितनी बार मुहम्मद गौरी को जीवन दान दिया ?

    कुल 16 बार पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को जीवन दान दिया था, इससे पृथ्वीराज ने अपनी उदारता और महानता का परिचय दिया था।

  4. पृथ्वी राज् चौहान का साशन कहा तक था ?

    पृथ्वीराज चौहान ने एक साथ दो राजधानीयो द्वारा शासन किया था जिसमे अजमेर और दिल्ली का शासन शामिल था।

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