राधे कृष्णा की प्रेम कहानी

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“राधा” के सच्चे प्रेम का यह ईनाम हैं, कान्हा से पहले लोग लेते “राधा” का नाम हैं.

देवी राधा को पुराणों में श्री कृष्ण की शश्वत जीवनसंगिनी बताया गया है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि राधा और कृष्ण का प्रेम इस लोक का नहीं बल्कि पारलौक है।

सृष्टि के आरंभ से और सृष्टि के अंत होने के बाद भी दोनों नित्य गोलोक में वास करते हैं।

राधा-कृष्ण की अलौकिक प्रेम कहानी से हर कोई परिचित है। उन दोनों का मिलना और फिर मिलकर बिछड़ जाना, शायद यही उन दोनों की नियति थी।

पौराणिक कथाओं में कृष्ण को रासलीला करते दर्शाया गया है, उन्हें एक प्रेमी और कुशल कूटनीतिज्ञ के रूप में प्रदर्शित किया गया है |

वहीं राधा को हर समय कृष्ण के प्रेम में डूबी हुई प्रेमिका के तौर पर वर्णित किया गया है।

लेकिन लौकिक जगत में श्रीकृष्ण और राधा का प्रेम मानवी रुप में था और इस रुप में इनके मिलन और प्रेम की शुरुआत की बड़ी ही रोचक कथा है।

एक कथा के अनुसार देवी राधा और श्री कृष्ण की पहली मुलाकात उस समय हुई थी जब देवी राधा ग्यारह माह की थी और भगवान श्री कृष्ण सिर्फ एक दिन के थे।

मौका था श्री कृष्ण का जन्मोत्सव। मान्यता है कि देवी राधा भगवान श्री कृष्ण से ग्यारह माह बड़े थी और कृष्ण के जन्मोत्सव पर अपनी माता कीर्ति के साथ नंदगांव आई थी |

यहां श्री कृष्ण पालने में झूल रहे थे और राधा माता की गोद में थी।

राधा की हृदय में श्री कृष्ण,
राधा की साँसों में श्री कृष्ण,

राधा में ही हैं श्री कृष्ण,
इसीलिए दुनिया कहती हैं

राधे-कृष्ण राधे-कृष्ण

भगवान श्री कृष्ण और देवी राधा की दूसरी मुलाकात लौकिक न होकर अलौकिक थी।

इस संदर्भ में गर्ग संहिता में एक कथा मिलती है। यह उस समय की बात है जब भगवान श्री कृष्ण नन्हे बालक थे।

उन दिनों एक बार एक बार नंदराय जी बालक श्री कृष्ण को लेकर भांडीर वन से गुजर रहे थे।

उसे समय आचानक एक ज्योति प्रकट हुई जो देवी राधा के रुप में दृश्य हो गई।

देवी राधा के दर्शन पाकर नंदराय जी आनंदित हो गए। राधा ने कहा कि श्री कृष्ण को उन्हें सौंप दें, नंदराय जी ने श्री कृष्ण को राधा जी की गोद में दे दिया।

श्री कृष्ण बाल रूप त्यागकर किशोर बन गए। तभी ब्रह्मा जी भी वहां उपस्थित हुए।

ब्रह्मा जी ने कृष्ण का विवाह राधा से करवा दिया। कुछ समय तक कृष्ण राधा के संग इसी वन में रहे।

फिर देवी राधा ने कृष्ण को उनके बाल रूप में नंदराय जी को सौंप दिया।

तीसरी मुलाकत में हुआ लौकिक प्रेम – राधा कृष्ण की लौकिक मुलाकात और प्रेम की शुरुआत संकेत नामक स्थान से माना जाता है।

नंद गांव से चार मील की दूरी पर बसा है बरसाना गांव। बरसाना को राधा जी की जन्मस्थली माना जाता है।

नंदगांव और बरसाना के बीच में एक गांव है जो ‘संकेत’ कहलाता है।

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संकेत तीर्थ : कहते हैं कि राधा की कृष्ण से पहली मुलाकात नंदगांव और बरसाने के बीच हुई।

एक-दूसरे को देखने के बाद दोनों में सहज ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ गया। माना जाता है कि यहीं से राधा-कृष्ण के प्रेम की शुरुआत हुई।

इस स्थान पर आज एक मंदिर है। इसे संकेत स्थान कहा जाता है। मान्यता है कि पिछले जन्म में ही दोनों ने यह तय कर लिया था कि हमें इस स्थान पर मिलना है।

उस वक्त कृष्ण की उम्र क्या रही होगी?

यहां हर साल राधा के जन्मदिन यानी राधाष्टमी से लेकर अनंत चतुर्दशी के दिन तक मेला लगता है।

इन दिनों लाड़ली मंदिर में दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्घालु आते हैं और राधा-कृष्ण के प्रथम स्थल पर आकर इनके शाश्वत प्रेम को याद करते हैं।

इस स्थान के विषय में मान्यता है कि यहीं पर पहली पर भगवान श्री कृष्ण और राधा जी का लौकिक मिलन हुआ था।

हर साल राधाष्टमी यानी भाद्र शुक्ल अष्टमी से चतुर्दशी तिथि तक यहां मेला लगता है और राधा कृष्ण के प्रेम को याद कर भक्तगण आनंदित होते हैं।

इस स्थान का नाम संकेत क्यों हुआ इस विषय में कथा है |

जब श्री कृष्ण और राधा के पृथ्वी पर प्रकट होने का समय आया तब एक स्थान निश्चित हुआ जहां दोनों का मिलना तय हुआ।

मिलन का स्थान संकेतिक था इसलिए यह संकेत कहलाया।

ये बात तो हम अकसर सुनते आए हैं कि राधा और कृष्ण केवल प्रेमी-प्रेमिका थे, उन दोनों का वैवाहिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक रिश्ता था।

लेकिन क्या वाकई ये बात सच है कि कृष्ण का उनकी प्रेयसी राधा के साथ विवाह नहीं हुआ था?

कृष्ण की प्रेम बाँसुरिया सुन भई वो प्रेम दिवानी,

जब-जब कान्हा मुरली बजाएँ दौड़ी आये राधा रानी.

कर्तव्य पथ पर जाते-जाते केशव गये थे रूक,

देख दशा राधा रानी, ब्रम्हा भी गये थे झुक.

सुध-बुध खो रही राधा रानी,

इंतजार अब सहा न जाएँ,

कोई कह दो सावरे से,

वो जल्दी राधा के पास आएँ.

मधुवन में भले ही कान्हा किसी गोपी से मिले,

मन में तो राधा के ही प्रेम के है फूल खिले.

क्या राधा भगवान कृष्ण की प्रेमिका थीं ?

यदि थीं तो फिर कृष्ण ने उनसे विवाह क्यों नहीं किया ?

कृष्ण ने अपने जीवनकाल में 8 स्त्रियों से विवाह किया, तो क्या उन्हें राधा से विवाह करने में कोई दिक्कत थी?

कृष्ण की 8 पत्नियों के नाम- रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा।

कहते हैं कि राधा और कृष्ण के प्रेम की शुरुआत बचपन में ही हो गई थी। कृष्ण नंदगांव में रहते थे और राधा बरसाने में।

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नंदगांव और बरसाने से मथुरा लगभग 42-45 किलोमीटर दूर है। अब सवाल यह उठता है कि जब 11 वर्ष की अवस्था में श्रीकृष्ण मथुरा चले गए थे, तो इतनी लघु अवस्था में गोपियों के साथ प्रेम या रास की कल्पना कैसे की जा सकती है?

मथुरा में उन्होंने कंस से लोहा लिया और कंस का अंत करने के बाद तो जरासंध उनकी जान का दुश्मन बन गया था जो शक्तिशाली मगथ का सम्राट था और जिसे कई जनपदों का सहयोग था।

उससे दुश्मनी के चलते श्रीकृष्ण को कई वर्षों तक तो भागते रहना पड़ा था।

जब परशुराम ने उनको सुदर्शन चक्र दिया तब जाकर कहीं आराम मिला।

बरसाना और नंदगांव

बरसाना और नंदगांव : राधा का जिक्र पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।

पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं। वृषभानु वैश्य थे।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण की मित्र थीं और उसका विवाह रापाण, रायाण अथवा अयनघोष नामक व्यक्ति के साथ हुआ था।

उस जमाने में स्त्री का विवाह किशोर अवस्था में ही कर दिया जाता था। बरसाना और नंदगाव के बीच 4 मील का फासला है।

बरसाना राधा के पिता वृषभानु का निवास स्थान था।

बरसाने से मात्र 4 मील पर नंदगांव है, जहां श्रीकृष्ण के सौतेले पिता नंदजी का घर था।

होली के दिन यहां इतनी धूम होती है कि दोनों गांव एक हो जाते हैं। बरसाने से नंदगाव टोली आती है और नंदगांव से भी टोली जाती है।

कुछ विद्वान मानते हैं कि राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था और बाद में उनके पिता बरसाना में बस गए।

लेकिन अधिकतर मानते हैं कि उनका जन्म बरसाना में हुआ था।

राधारानी का विश्वप्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। बरसाना में राधा को ‘लाड़ली’ कहा जाता है।

बरसाना गांव के पास दो पहाड़ियां मिलती हैं। उनकी घाटी बहुत ही कम चौड़ी है।

मान्यता है कि गोपियां इसी मार्ग से दही-मक्खन बेचने जाया करती थीं।

यहीं पर कभी-कभी कृष्ण उनकी मक्खन वाली मटकी छीन लिया करते थे।

गौरतलब है कि मथुरा में कृष्ण के जन्म के बाद कंस के सभी सैनिकों को नींद आ गई थी और वासुदेव की बेड़ियां किसी चमत्कार से खुल गई थीं, तब वासुदेवजी भगवान कृष्ण को नंदगांव में नंदराय के यहां आधी रात को छोड़ आए थे।

कुछ मानते हैं कि वे मथुरा के पास गोकुल में यशोदा के मायके छोड़ आए थे, जहां से यशोदा उन्हें नंदगांव ले गईं।

नंद के घर लाला का जन्म हुआ है, ऐसी खबर धीरे-धीरे गांव में फैल गई। यह सुनकर सभी नंदगांववासी खुशियां मनाने लगे।

कृष्ण ने नंदगांव में रहते हुए पूतना, शकटासुर, तृणावर्त आदि असुरों का वध किया। यहां के घाट और उसके पास अन्य मनोरम स्थल हैं, जैसे- गोविंद घाट, गोकुलनाथजी का बाग, बाजनटीला, सिंहपौड़ी, यशोदा घाट, रमणरेती आदि।

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गोकुल क्या है ?

गोकुल यमुना के तट पर बसा एक गांव है, जहां सभी नंदों की गायों का निवास स्थान था।

यहीं पर रोहिणी ने बलराम को जन्म दिया था।

बलराम देवकी के 7वें गर्भ में थे जिन्हें योगमाया ने आकर्षित करके रोहिणी के गर्भ में डाल दिया था।

यह स्थान गोप लोगों का था। मथुरा से गोकुल की दूरी महज 12 किलोमीटर है।

श्रीमद्भागवत और विष्णु पुराण के अनुसार कंस के अत्याचार से बचने के लिए नंदजी कुटुंबियों और सजातियों के साथ नंदगांव से वृंदावन में आकर बस गए थे।

विष्णु पुराण में वृंदावन में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन भी है।

यहां श्रीकृष्‍ण ने कालिया का दमन किया था।

रासलीला : मान्यता है कि यहीं पर श्रीकृष्‍ण और राधा एक घाट पर युगल स्नान करते थे।

यहीं पर श्रीकृष्ण और गोपियां आंख-मिचौनी का खेल खेलते थे।

यहीं पर श्रीकृष्ण और उनके सभी सखा और सखियां मिलकर रासलीला अर्थात तीज-त्योहारों पर नृत्य-उत्सव का आयोजन करते थे।

कृष्ण की शरारतों के कारण उन्हें बांकेबिहारी कहा जाता है।

यहां पर यमुना घाट के प्रत्येक घाट से भगवान कृष्ण की कथा जुड़ी हुई है।

कृष्ण ने जो नंदगांव और वृंदावन में छोटा-सा समय गुजारा था, उसको लेकर भक्तिकाल के कवियों ने ही कविताएं लिखी हैं।

उनमें कितनी सच्चाई है? इतिहासकार मानते हैं कि एक सच को इतना महिमामंडित किया गया कि अब वह कल्पनापूर्ण लगता है।

कृष्ण जब मथुरा में कंस को मारने गए, तब उनका जीवन पूरी तरह से बदल गया।

कंस को मारने के बाद उनके जीवन में उथल-पुथल शुरू हो गई।

श्रीचैतन्य महाप्रभु के ब्रज आगमन के पश्चात श्रीवल्लभाचार्य ने यमुना के इस मनोहर तट पर श्रीमद्भागवत का पारायाण किया था।

इनके पुत्र श्रीविट्ठलाचार्य और उनके पुत्र श्रीगोकुलनाथजी की बैठकें भी यहां पर हैं।

असल में श्रीविट्ठलनाथजी ने औरंगजेब को चमत्कार दिखलाकर इस स्थान का अपने नाम पर पट्टा लिया था।

उन्होंने ही इस गोकुल को बसाया था।

यह नंद का रहने का स्थान नहीं था। गोकुल के पास काम्यवन से कृष्ण का नाता जरूर है।

कृष्ण की अनुपस्थिति में उसके प्रेमभाव में और भी वृद्धि हुई।

जब कृष्ण वृंदावन छोड़कर मथुरा चले गए, तब राधा के लिए उन्हें देखना और उनसे मिलता और दुर्लभ हो गया।

राधा और कृष्ण दोनों का पुनर्मिलन कुरुक्षेत्र में बताया जाता है, जहां सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारिका से कृष्ण और वृंदावन से नंद के साथ राधा आई थीं।

राधा सिर्फ कृष्ण को देखने और उनसे मिलने ही नंद के साथ गई थी। इसका जिक्र पुराणों में मिलता है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में आया है कि एक बार राधा गोलोक से कहीं बाहर गई थीं।

उस समय श्रीकृष्ण अपनी विरजा नाम की सखी के साथ विहार कर रहे थे। संयोगवश राधा वहां आ गईं।

विरजा के साथ कृष्ण को देखकर राधा क्रोधित हो गईं और कृष्ण एवं विरजा को भला-बुरा कहने लगी।

लज्जावश विरजा नदी बनकर बहने लगी।

कृष्ण के प्रति राधा के क्रोधपूर्ण शब्दों को सुनकर कृष्ण का मित्र सुदामा आवेश में आ गया।

सुदामा कृष्ण का पक्ष लेते हुए राधा से आवेशपूर्ण शब्दों में बात करने लगा।

सुदामा के इस व्यवहार को देखकर राधा नाराज हो गईं।

राधा ने सुदामा को दानव रूप में जन्म लेने का शाप दे दिया।

क्रोध में भरे हुए सुदामा ने भी हित-अहित का विचार किए बिना राधा को मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया।

राधा के शाप से सुदामा शंखचूर नाम का दानव बना जिसका वध भगवान शिव ने किया।

सुदामा के शाप के कारण राधा को मनुष्य रूप में जन्म लेकर धरती पर आना पड़ा।

पुराणों के अनुसार राधा के रूप में देवी लक्ष्मी ने धरती पर अवतार लिया था।

साथ ही ये बात भी जग जाहिर है कि भगवान कृष्ण स्वयं विष्णु जी के अवतार थे।

ये बात स्वयं देवी लक्ष्मी ने कही थी कि भगवान विष्णु के अलावा अन्य किसी के साथ उनका विवाह नहीं होगा, स्पष्ट है कि राधा ने अवश्य ही कृष्ण से विवाह किया होगा।

एक पौराणिक कहानी के अनुसार जतिला नाम की एक गोपी जावत गांव में रहती थी।

योगमाया के कहने पर जतिला के पुत्र अभिमन्यु का विवाह राधा के साथ संपन्न हुआ था।

लेकिन योगमाया के ही प्रभाव की वजह से अभिमन्यु कभी अपनी पत्नी राधा को छू तक नहीं पाया था।

दरअसल अभिमन्यु अपने दैनिक कार्यों में अत्याधिक व्यस्त रहता था और शर्म के कारण कभी अपनी पत्नी से बात नहीं कर पाता था।

राधा और श्रीकृष्ण ने प्रेम नहीं किया था उनके बीच आध्यात्मिक रिश्ता था, उनका प्रेम अमर था।

श्रीला प्रभुपाद ने राधा और कृष्ण के प्रेम संबंध को परकीया, यानि दुनियावी प्रेम से ऊपर सर्वोच्च प्रेम संबंध का नाम दिया था।

हम इस जगत के प्राणी हैं जहां सब कुछ समाप्त हो जाना है, हमने हर विषय का एक आखिरी छोर देखा है , तो हम प्रेम का भी आखिरी छोर ढूंढते हैं|

जो हमें नहीं मिलता, मगर यदि उद्भव खोजने निकलें तो तलाश बस राधा और कृष्ण पर समाप्त होती है |

राधा और कृष्ण , कृष्ण और राधा इन दोनों पर कितना कुछ लिखा जा चुका है, कहा जा चुका है , गाया जा चुका है, पर न तो इनके प्रेम का वर्णन संतृप्त हो पाया और ना ही अभिव्यक्ति ही छोर तक पहुंची |

कृष्ण और राधा जब भौतिक रूप से साथ थे , वह अवधि आठ वर्ष की बताई जाती है, किन्तु वे आठ वर्ष अब इतने व्यापक हो चुके हैं, कि अनन्तानन्त शताब्दियाँ भी उन्हें समेट पाने में अक्षम हैं |

कृष्ण और राधा विस्तार पाते ही गए हैं |

कभी हरिदास जी ने गाया तो अभी सूरदास जी ने रचा , कभी रसखान ने गढ़ा तो कभी चैतन्य महाप्रभु ने सुनाया, मगर कृष्ण और राधा का प्रेम विस्तार पाता ही गया |

राधा मात्र एक नाम नहीं जो कृष्ण के पूर्व हैं|

राधा मात्र एक प्रेम स्तम्भ नहीं, जो कदम्ब के नीचे कृष्ण के संग सोची जाती हैं|

राधा एक आध्यात्मिक पृष्ठ है, जहां द्वैत से अद्वैत का मिलन है|

राधा एक सम्पूर्ण काल का उद्गम हैं, जो कृष्ण रुपी समुद्र से मिलती हैं|

श्रीकृष्ण के जीवन में राधा प्रेम की मूर्ति बनकर आईं और विश्व में प्रेम का प्रतिमान बनकर बस गईं|

जिस प्रेम को कोई नाप नहीं सका, उसकी आधारशिला राधा ने ही रखी थी|

यही वजह है कि आज भी हर जगह श्रीकृष्ण राधारानी के संग ही नज़र आते हैं|

श्री राधा रानी कृष्ण से उम्र में बड़ी थी, लेकिन उनका प्रेम तो बचपन से ही चरम सीमा पर था. कहते है ना प्रेम उम्र के दायरे में बंधकर कभी भी नहीं रह सकता है. लक्ष्मी जी ही राधा अवतार में धरती पर आई थीं.

भक्तों की नज़र से राधे कृष्ण :

संसार के लोग राधा और कृष्ण को दो अलग अलग नाम से जानते होंगे, मगर वे बिरले ही भक्त हैं जो एक संयुक्त तत्व को समझ पाते हैं , ये बिरले लोग आपको बृज में ही मिलेंगे, वहां जाइए तो जानेंगे कि कृष्ण शब्द तो है ही नहीं वहां , वहां तो बस राधेय -राधेय है |

राधेय अर्थात जो राधा का हो , मतलब कृष्ण | इतना ही नहीं उज्जवल वर्ण वाली राधा रानी को वहां श्यामा जु पुकारा जाता है, श्यामा अर्थात जो श्याम की हो |

प्रेमी ही समझ सकते हैं इस गूढ़ता को कि एक के नाम से दुसरे को पुकार जाए |

राधेय का प्रेम

दुनिया भर में कृष्ण और राधा के प्रेम को अपने अपने दृष्टिकोण से देखा जाता है, कोई उन्हें प्रेमी युगल बताता है तो कोई बचपन का प्रेम |

लेकिन वास्तविकता इसके ठीक उलट है लोगों ने अपनी बुद्धि और सीमित विवेक के कारण राधा कृष्ण के प्रेम को कुछ और ही समझा है और समझा दिया है |

यूं तो जहां प्रेम होता है वहां तर्क नहीं होता, इसी कारण कृष्ण प्रेमी इन विवादों में कभी नहीं उलझते, किन्तु सत्य का अनावरण भी आवश्यक है |

राधा कृष्ण का प्रेम वह भौतिक और काम पूर्ण प्रेम नहीं था जिसपर आकर सांसारिक प्राणियों की सोच ठहर जाती है |

राधेय का प्रेम को संसार के लिए वह ज्ञान रुपी अमृत था जो किसी विचारधारा में जकड़ ही नहीं सकता , जहां कृष्ण होता है वहां काम नहीं होता , वहां भौतिकता नही होती वहां अलौकितकता होती है |

जब कृष्ण राधा से मिले थे तब वे मात्र छह वर्ष के थे , और जब वे मथुरा गए तब पंद्रह वर्ष के |

राधा रानी , कृष्ण के उस बाल्यकाल की सबसे प्रिय साथी भी थीं और प्रियतम भी , वे कृष्ण से आयु में बड़ी थीं और कृष्ण की गुरु थीं |

वास्तव में कृष्ण की तरह राधा भी दिव्य थीं , उन्होंने जगदगुरु को प्रेम और अनुराग की वह दीक्षा दी जो संसार के लिए स्मरणीय है |

आधुनिक काल के महान कवि श्री देवल आशीष जी राधा जी के विषय में कहते हैं कित्यागियों में, अनुरागियों में, बड़भागी थी; नाम लिखा गई राधा

रंग में कान्हा के ऐसी रंगी, रंग कान्हा के रंग नहा गई राधा

विश्व को नाच नाचता है जो, उस श्याम को नाच नचा गई राधा

संत-महंत तो ध्याया किए और माखन चोर को पा गई राधा

हार के श्याम को जीत गई, अनुराग का अर्थ बता गई राधा

पीर पे पीर सही पर प्रेम को शाश्वत कीर्ति दिला गई राधा

कान्हा को पा सकती थी प्रिया पर प्रीत की रीत निभा गई राधा

कृष्ण ने लाख कहा पर संग में ना गई, तो फिर ना गई राधा

वहीं कृष्ण के प्रेम पर महाकवि रसखान जी कहते हैं कि

संकर से सुर जाहिं जपैं चतुरानन ध्यानन धर्म बढ़ावैं।

नेक हिये में जो आवत ही जड़ मूढ़ महा रसखान कहावै।।

जा पर देव अदेव भुअंगन वारत प्रानन प्रानन पावैं।

ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।

अर्थात जो कृष्ण संसार का स्वामी है , वह अहीर (गोपियों) के प्रेम में इतना बंध गया है कि थोड़ी सी छाछ और माखन के बदले में नाचने को भी तैयार हो जाता है |

इस राधाकृष्ण के प्रेम में तो समर्पण और अधिकार दोनों का वह सागर है जिसे कोई ज्ञात ही नहीं कर सकता |

सचमुच जिसने काम खोजा उसे तो कृष्ण मिल ही नहीं सकता, और जिसने कृष्ण में भी काम खोजा उससे बड़ा मूर्ख कोई हो नहीं सकता |

श्रीकृष्ण के जीवन में राधा प्रेम की मूर्ति बनकर आईं और विश्व में प्रेम का प्रतिमान बनकर बस गईं. जिस प्रेम को कोई नाप नहीं सका, उसकी आधारशिला राधा ने ही रखी थी.यही वजह है कि आज भी हर जगह श्रीकृष्ण राधारानी के संग ही नज़र आते हैं.

कृष्ण की बांसुरी और राधा

कृष्ण एक ग्वाल परिवार में पले थे , और ग्वाल बाल गायें चराते हुए बांसुरी बजा कर गायों को नियंत्रित किया करते थे |

किन्तु कृष्ण की बांसुरी कला असाधारण थीं, उनकी बांसुरी के स्वर मोहित कर लेने वाले थे, यहां तक कि स्वयं अपनी बांसुरी में इतने खो जाते कि उन्हें अपनी भी सुधि ना रहती , इस पर राधा जी को बड़ी नाराज़गी होती |

क्यों कि इस समय वे राधा जी की बातें अनसुनी करते रहते थे |

राधा रानी ने कई बार बांसुरी को बुरा भला कहा मगर ना तो कृष्ण की बांसुरी को तोडा और ना ही फेंका |

क्यों कि उनका प्रेम कृष्ण को पाने या खोने की बाध्यताओं से कहीं ऊपर था |

राधा का अर्थ है सफ़लता | यजुर्वेद के प्रथम अध्याय का पांचवा मंत्र, ईश्वर से सत्य को स्वीकारने तथा असत्य को त्यागने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ रहने में सफ़लता की कामना करता है |

जब मथुरा गए कृष्ण

कृष्ण अपने बाल्यकाल के समाप्त होते ही मथुरा चले गए थे, जिसके बाद वे गुरुकुल गए और फिर द्वारिका |

मगर शायद ये बात बहुत काम लोगों ने समझी होगी कि राधा के बाद कृष्ण का मोह किसी के लिए नहीं हुआ , कृष्ण की प्रेम प्रणेता वाली छवि फिर कभी सामने नहीं आई, वे शिष्य बने ,योद्धा बने, गुरु बने , मित्र बने , योगी बने, किन्तु प्रेमी फिर कभी नहीं बने |

राधा का अदभुत कृष्ण ज्ञान

एक बार कृष्ण के सखा उद्धव जी जो ज्ञान और योग सीख कर उसकी महत्ता बताने में लगे थे तब ,कृष्ण ने उन्हें एक चिट्ठी लिख कर दी जिस पर कृष्ण ने लिखा था कि :-

” मैं अब वापस नहीं आऊंगा तुम सभी मुझे भूल जाओ और योग में ध्यान लगाओ ” और कहा कि इसे ले जाकर ब्रज के लोगों को दिखाना और योग के महत्व से उन्हें परिचित करवाना |

उद्धव जी के लिए परमब्रह्म का लिखा लेख वेद समान था वे उसे संभाले संभाले ब्रज में गए और कृष्ण विरह में व्याकुल राधा जी को वह पाती दिखाई , राधा रानी ने उसे पढ़े बिना गोपियों को दे दी और गोपियों ने उसे पढ़े बिना उसके कई टुकड़े कर आपस में बाँट लिया |

उद्धव जी बबौखला गए , चिल्लाने लगे अरे मूर्खो इस पर जगदगुरु ने योग का ज्ञान लिखा है , क्या तुम कृष्ण विरह में नहीं हो जो उनका लिखा पढ़ा तक नहीं |

तब राधा जी ने उद्धव को समझाया

” उधौ तुम हुए बौरे, पाती लेके आये दौड़े..हम योग कहाँ राखें ? यहां रोम रोम श्याम है “

अर्थात हे उधौ कृष्ण तो यहां से गए ही नहीं ?

कृष्ण होंगे दुनिया के लिए योगेश्वर यहां पर तो अब भी वो धूल में सने हर घाट वृक्ष पर बंसी बजा रहे हैं |

बताओ कहाँ है विरह ?

यह ज्ञान आज के युग के लिए एक मार्ग दर्शन है , जब कि हम कृष्ण को आडम्बरों में खोजते हैं |

क्यों नहीं हो पाया राधा कृष्ण का भौतिक मिलन ?

मथुरा जाते समय राधा रानी ने कृष्ण का रास्ता रोका था , मगर कृष्ण ने उन्हें समझाया था कि यदि मैं तुमसे बंध गया तो मेरे जन्म का प्रायोजन व्यर्थ चला जाएगा, जगत में पाप और अधर्म का साम्राज्य फैलता ही जाएगा |

मैं प्रेमी बनकर संहार नहीं साध सकता , मैं ब्रज में रहकर युद्ध नहीं रचा सकता , मैं बांसुरी बजाते हुए चक्र धारण नहीं कर सकता |

और यह सत्य भी है कि राधा से विरह के बाद कृष्ण ने कभी बांसुरी को हाथ नहीं लगाया |

कृष्ण ने मथुरा जाते समय राधा से साथ चलने को कहा था , किन्तु राधा भी कृष्ण की गुरु थीं , वे समझ सकती थीं कि जिसे संसार को मोह से मुक्ति का पथ सिखाना है , उसे मोह में बाँध कर मैं समय चक्र को नहीं रोकूंगी |

और उन्होंने कृष्ण से वचन लिया कि वे जब अपने जन्म -अवतार के सभी उद्देश्यों को पूर्ण कर लें तब लौट आएं , और ऐसा हुआ भी कृष्ण अपने जन्म के सभी प्रायोजनों को पूर्ण कर , और अपने अवतार के कर्तव्य से मुक्त हो सदैव राधा के हो गए |

वे अब ना द्वारिका में मिलते हैं, और ना ही कुरुक्षेत्र में , वे तो आज भी ब्रज की भूमि पर राधा रानी के साथ धूल उड़ाते दौड़ते जाते हैं दूर तक |

राधा के कृष्णा से कुछ कड़वे संबाद जिनका उतर भगवान कृष्ण के पास भी नहीं था |
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भगवान क्रष्ण से द्वारकाधिश कृष्णा और राधा स्वर्ग में विचरण कर रहें थे, तभी अचानाक दोंनो एक-दूसरे के सामने आ गए कृष्ण तो विचलित हो गए और राधा प्रसन्नचित हो उठी, कृष्ण सकपकाए और राधा मुस्कुराई|

इससे पहले कि कृष्ण कुछ कहते इतने राधा बोल उठी|

कैसे हो द्वारकाधीश ? जो राधा उंन्है, कान्हा कान्हा कह के बुलाया कर ती थी उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया।

फिर भी कृष्ण ने अपने आपको संभालते हुए बोले राधा से, “ मै तो तुम्हारे लिए आज भी वही कान्हा हूँ जो”

राधा बोली मेरे साथ ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ न तुम्हारी याद आई न आंसू बहा क्यूंकि हम तुम्हैं कभी भुले ही कहाँ थे जो तुम याद आते”

राधा बोली मेरे साथ ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ न तुम्हारी याद आई न आंसू बहा क्यूंकि हम तुम्हैं कभी भुले ही कहाँ थे जो तुम याद आते”

राधा बोली मेरे साथ ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ न तुम्हारी याद आई न आंसू बहा क्यूंकि हम तुम्हैं कभी भुले ही कहाँ थे जो तुम याद आते

राधा का नाम कृष्ण के साथ में लिया जाता हैं.
राधा का अर्थ है सफ़लता | यजुर्वेद के प्रथम अध्याय का पांचवा मंत्र, ईश्वर से सत्य को स्वीकारने तथा असत्य को त्यागने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ रहने में सफ़लता की कामना करता है | 

कुछ कडवे सच और प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ आपको ?

क्या तुमने कभी सोचा की इस तरक्की में तुम कितना पिछड गए ?

यमुना के मिठे पानी से जिंदगी शुरु की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुँच गए ?

एक ऊंगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्र पर भरोसा कर लिया और दसों ऊंगलिओ पर चलने वाली बांसुरी को भूल गए ?

कान्हा जब तुम प्रेम से जुडे थे तो जो ऊंगलि गोवर्धन पर्वत अठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी ? प्रेम से अलग होने पर उसी ऊंगली ने क्या क्या रंग दिखाया ?

सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी, कान्हा और द्वारकाधीश में क्या फर्क होता है बताऊ ?

अगर तुम कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते, सुदामा तुम्हारे घर नही आते ।

युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है ? युद्ध में आप मिटाकर जीतते है और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं । कान्हा प्रेम में डुबा हुआ आदमी, दुखी तो रह सकता है पर किसी को दूख: नहीं देता।

आप तो बहुत सी कलाओं के स्वामी हो, स्वप्न दूर द्रष्टा हो , गीता जैसे ग्रंथ के दाता हो, पर आपने ये कैसे-कैसे निर्णय किया अपनी पूरी सेना कौरवों को सोंप दी, और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया।

सेना तो आपकी प्रजा थी राजा तो पालक होता है, उनका रक्षक होता है। आप जैसे महान ज्ञानी उस रथ को चला रहा था, जिस रथ पर अर्जुन बेठा था ।

आपकी प्रजा को ही मार रहा था, अपनी प्रजा को मरते देख आपमें करुणा नहीं जगी।

क्यों, क्युंकि आप प्रेम से शुन्य हो चुके थे आज धरती पर जाकर देखो अपनी द्वारकाधिश वाली छवि को ढुंढ्ते रह जाओगे |

हर घर, हर मंदिर, में मेरे साथ ही खडे नजर आओगे।

आज भी मै मानती हूँ कि लोग आपकी लिखी हुई गीता के ज्ञान की बातें करते है |

उनके महत्व की बात करते है, मगर धरती के लोग युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते है, और गीता मे कहीं मेरा नाम भी नही लेकिन गीता के समापन पर राधे-राधे करते है”

राधा कृष्णा का प्रेम

श्रीकृष्ण के प्रति राधा की भक्ति और समर्पण निष्कपट था।

यहां राधा-कृष्ण के कुछ किवदंतियां या कथाओं ने एक-दूसरे के लिए उनके प्रेम को चित्रित किया हैं।

यह एक दिलचस्प कहानी है जो राधा और कृष्ण के अंनत प्रेम के संबंध को दर्शाती हैं।

राधा ने भगवान कृष्ण से विवाह नहीं किया था, बल्कि राधा के लिए कृष्ण के अतृप्त प्रेम को देखकर दासियों को ईर्ष्या होती थी|

एकबार राधा को परेशान करने के लिए उन्होंने एक शरारती योजना बनाई और उन्होंने गर्म दूध का गरमागरम तपता हुआ कटोरा लिया है|

और उन्होंने राधा को वह कटोरा दिया और कहा कि कृष्ण ने यह दूध का कटोरा उनके लिए भेजा है, और राधा ने गर्म दूध पी लिया।

जब दासियाँ कृष्ण के पास लौटी, तो उन्होंने कृष्ण के दर्दनाक छाले देखे।

यह दर्शाता है कि कृष्ण राधा के हर छिद्र में रहते हैं, इसलिए गर्म दूध से राधा को कुछ नहीं हुआ, लेकिन गर्म दूध ने कृष्ण को प्रभावित किया।

श्री कृष्ण ने उनके सभी दर्द और दुखों को खुद पर ले लिया।

यह राधा और कृष्ण के बीच गहन प्रेम को दर्शाती एक और प्यारी कहानी है। एक बार श्रीकृष्ण बहुत बीमार हो गए थे।

कृष्ण ने कहा कि अगर उनको उनके किसी प्रेमी या सच्चे भक्त द्वारा चरणामृत मिलेगा, तो वह ठीक हो जाएगें।

सभी गोपीयों से पूछा गया, लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव से भय हो कर स्वीकार नहीं किया गया।

उन्होंने कहा कि वे अपने चरणों का जल श्रीकृष्ण को पिलाकर पाप नहीं कर सकती।

जब राधा को जब इस स्थिति के बारे में पता चला, तो राधे ने कहा: “जितने चरणामृत की ज़रूरत है आप उतना ले सकते है।

मुझे तब सुख मिलेगा, जब तक मेरे प्रभु अपने दर्द और बीमारी से मुक्त नहीं हो जाते।” राधा ने सहृदय प्रेम के साथ चरणामृत दिया।

यह इस तथ्य के कारण है; यह माना जाता है कि राधा भगवान कृष्ण से विवाह नहीं कर सकी।

राधा कृष्ण को उनके दिल से आंतरिक रूप से प्रेम करती थी लेकिन फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण को उनकी बीमारी से बचाने के लिए कृष्ण को चरणामृत दिया।

राधा और कृष्ण दिव्य प्राणियों में से एक थे और उनका प्यार अनन्त था।

चाहे वे शादी करते या नहीं, उनके प्यार ने उन्हें हमेशा के लिए एकजुट कर दिया और आज भी लोग उनकी पूजा करते हैं।

राधा कृष्णा का प्रेम

रहस्यमयी और अलौकिक निधिवन

यहाँ आज भी राधा संग रास रचाते है कृष्ण, जो भी देखता है हो जाता है पागल

भारत में कई ऐसी जगह है जो अपने दामन में कई रहस्यों को समेटे हुए है ऐसी ही एक जगह है वृंदावन स्तिथ निधि वन जिसके बारे में मान्यता है की यहाँ आज भी हर रात कृष्ण गोपियों संग रास रचाते है।

यही कारण है की सुबह खुलने वाले निधिवन को संध्या आरती के पश्चात बंद कर दिया जाता है।

उसके बाद वहां कोई नहीं रहता है यहाँ तक की निधिवन में दिन में रहने वाले पशु-पक्षी भी संध्या होते ही निधि वन को छोड़कर चले जाते है।

सब दुःख दूर होये , जब तेरा नाम लिया
नंदलाल नंदलाल.नंदलाल नंदलाल नंदलाल
मीरा पुकारी जब गिरिधर गोपाल
मिल गया विष में , अमृत का प्याला
मिटाये कौन उसे जिसे तूने अपना लिया
नैनो में श्याम बसा लिया
सुध बिसराही गयी मुरली की दूँ प्यारी
मेरे मान मंदिर में रास रचा पियारा

जो भी देखता है रासलीला हो जाता है पागल :

वैसे तो शाम होते ही निधि वन बंद हो जाता है और सब लोग यहाँ से चले जाते है।

लेकिन फिर भी यदि कोई छुपकर रासलीला देखने की कोशिश करता है तो पागल हो जाता है।

ऐसा ही एक वाक़या करीब 10 वर्ष पूर्व हुआ था जब जयपुर से आया एक कृष्ण भक्त रास लीला देखने के लिए निधिवन में छुपकर बैठ गया।

जब सुबह निधि वन के गेट खुले तो वो बेहोश अवस्था में मिला, उसका मानसिक संतुलन बिगड़ चूका था।

ऐसे अनेकों किस्से यहाँ के लोग बताते है। ऐसे ही एक अन्य वयक्ति थे पागल बाबा जिनकी समाधि भी निधि वन में बनी हुई है।

उनके बारे में भी कहा जाता है की उन्होंने भी एक बार निधि वन में छुपकर रास लीला देखने की कोशिश की थी।

जिससे की वो पागल ही गए थे।

चुकी वो कृष्ण के अनन्य भक्त थे इसलिए उनकी मृत्यु के पश्चात मंदिर कमेटी ने निधि वन में ही उनकी समाधि बनवा दी।

रंगमहल में सज़ती है सेज़ :

निधि वन के अंदर ही है ‘रंग महल’ जिसके बारे में मान्यता है की रोज़ रात यहाँ पर राधा और कन्हैया आते है।

रंग महल में राधा और कन्हैया के लिए रखे गए चंदन की पलंग को शाम सात बजे के पहले सजा दिया जाता है।

पलंग के बगल में एक लोटा पानी, राधाजी के श्रृंगार का सामान और दातुन संग पान रख दिया जाता है।

सुबह पांच बजे जब ‘रंग महल’ का पट खुलता है तो बिस्तर अस्त-व्यस्त, लोटे का पानी खाली, दातुन कुची हुई और पान खाया हुआ मिलता है।

रंगमहल में भक्त केवल श्रृंगार का सामान ही चढ़ाते है और प्रसाद स्वरुप उन्हें भी श्रृंगार का सामान मिलता है।

पेड़ बढ़ते है जमीन की और :

निधि वन के पेड़ भी बड़े अजीब है जहाँ हर पेड़ की शाखाएं ऊपर की और बढ़ती है वही निधि वन के पेड़ो की शाखाएं नीचे की और बढ़ती है।

हालात यह है की रास्ता बनाने के लिए इन पेड़ों को डंडों के सहारे रोक गया है।

कान्हा तुम मुझे बासुरी बजाना सिखा दो
जिस तरह से तुम बासुरी से राधा राधा नाम
पुकारते हो उसी तरह मुझे भी
बासुरी से कान्हा कान्हा कहना सिखा दो

तुलसी के पेड़ बनते है गोपियाँ :

निधि वन की एक अन्य खासियत यहाँ के तुलसी के पेड़ है। निधि वन में तुलसी का हर पेड़ जोड़े में है।

इसके पीछे यह मान्यता है कि जब राधा संग कृष्ण वन में रास रचाते हैं तब यही जोड़ेदार पेड़ गोपियां बन जाती हैं।

जैसे ही सुबह होती है तो सब फिर तुलसी के पेड़ में बदल जाती हैं।

साथ ही एक अन्य मान्यता यह भी है की इस वन में लगे जोड़े की वन तुलसी की कोई भी एक डंडी नहीं ले जा सकता है।

लोग बताते हैं कि‍ जो लोग भी ले गए वो किसी न किसी आपदा का शिकार हो गए। इसलिए कोई भी इन्हें नहीं छूता।

वन के आसपास बने मकानों में नहीं हैं खिड़कियां :

वन के आसपास बने मकानों में खिड़कियां नहीं हैं।

यहां के निवासी बताते हैं कि शाम सात बजे के बाद कोई इस वन की तरफ नहीं देखता।

जिन लोगों ने देखने का प्रयास किया या तो अंधे हो गए या फिर उनके ऊपर दैवी आपदा आ गई। जिन मकानों में खिड़कियां हैं भी, उनके घर के लोग शाम सात बजे मंदिर की आरती का घंटा बजते ही बंद कर लेते हैं।

कुछ लोग तो अपनी खिड़कियों को ईंटों से बंद भी करा दिया है।

Radha Krishna Love

वंशी चोर राधा रानी का भी है मंदिर :

यहां के महंत बताते हैं कि जब राधा जी को लगने लगा कि कन्हैया हर समय वंशी ही बजाते रहते हैं, उनकी तरफ ध्यान नहीं देते, तो उन्होंने उनकी वंशी चुरा ली।

निधि वन में ही वंशी चोर राधा रानी का भी मंदिर है।

इस मंदिर में कृष्ण जी की सबसे प्रिय गोपी ललिता जी की भी मूर्ति राधा जी के साथ है।

विशाखा कुंड ( Vishakha Kund )

निधिवन में स्थित विशाखा कुंड के बारे में कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण सखियों के साथ रास रचा रहे थे, तभी एक सखी विशाखा को प्यास लगी।

कोई व्यवस्था न देख कृष्ण ने अपनी वंशी से इस कुंड की खुदाई कर दी, जिसमें से निकले पानी को पीकर विशाखा सखी ने अपनी प्यास बुझायी। इस कुंड का नाम तभी से विशाखा कुंड पड़ गया।

मेरे दिल की दीवारों पर श्याम तेरी छवि हो,
मेरे नैनों के दरवाज़े पर कान्हा तेरी तस्वीर हो,
बस कुछ और न मांगू तुझसे मेरे मुरलीधर,
तूझे हर पल देखूं मेरे कन्हैया ऐसी मेरी तक़दीर हो।

बांकेबिहारी का प्राकट्य स्थल :

विशाखा कुंड के साथ ही ठा. बिहारी जी महाराज का प्राकट्य स्थल भी है।

कहा जाता है कि संगीत सम्राट एवं धु्रपद के जनक स्वामी हरिदास जी महाराज ने अपने स्वरचित पदों का वीणा के माध्यम से मधुर गायन करते थे|

जिसमें स्वामी जी इस प्रकार तन्मय हो जाते कि उन्हें तन-मन की सुध नहीं रहती थी।

बांकेबिहारी जी ने उनके भक्ति संगीत से प्रसन्न होकर उन्हें एक दिन स्वप्न दिया और बताया कि मैं तो तुम्हारी साधना स्थली में ही विशाखा कुंड के समीप जमीन में छिपा हुआ हूं।

स्वप्न के आधार पर हरिदास जी ने अपने शिष्यों की सहायता से बिहारी जी को वहा से निकलवाया और उनकी सेवा पूजा करने लगे। ठा. बिहारी जी का प्राकट्य स्थल आज भी उसी स्थान पर बना हुआ है।

जहा प्रतिवर्ष ठा. बिहारी जी का प्राकट्य समारोह बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है।

कालान्तर में ठा. श्रीबांकेबिहारी जी महाराज के नवीन मंदिर की स्थापना की गयी और प्राकट्य मूर्ति को वहा स्थापित करके आज भी पूजा-अर्चना की जाती है।

जो आज बाकेबिहारी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

संगीत सम्राट स्वामी हरिदास जी महाराज की समाधि :

स्वामी हरिदास जी श्री बिहारी जी के लिए अपने स्वरचित पदों के द्वारा वीणा यंत्र पर मधुर गायन करते थे तथा गायन करते हुए ऐसे तन्मय हो जाते की उन्हें तन मन की सुध नहीं रहती। प्रसिद्ध बैजूबावरा और तानसेन इन्ही के शिष्य थे।

अपने सभारत्न तानसेन के मुख से स्वामी हरिदास जी की प्रशंसा सुनकर सम्राट अकबर इनकी संगीत कला का रसास्वादन करना चाहते थे।

किन्तु स्वामी जी का यह दृढ़ निश्चय था की अपने ठाकुर के अतिरिक्त वो किसी का मनोरंजन नहीं करेंगे।

इसलिए एक बार सम्राट अकबर वेश बदलकर साधारण व्यक्ति की भांति तानसेन के साथ निधिवन में स्वामी हरिदास की कुटिया में उपस्थित हुए।

तानसेन ने जानभूझकर अपनी वीणा लेकर एक मधुर पद का गायन किया।

अकबर तानसेन का गायन सुनकर मुग्ध हो गए। इतने में स्वामी हरिदास जी तानसेन के हाथ से वीणा लेकर स्वयं उस पद का गायन करते हुए तानसेन की त्रुटियों की और इंगित करने लगे।

उनका गायन इतना मधुर और आकर्षक था की वन के पशु पक्षी भी वहां उपस्तिथ होकर मौन भाव से श्रवण करने लगे।

सम्राट अकबर के विस्मय का ठिकाना नहीं रहा।

64 कलाओं में महारत थे श्री कृष्ण

श्री कृष्ण अपनी शिक्षा ग्रहण करने आवंतिपुर (उज्जैन) गुरु सांदीपनि के आश्रम में गए थे जहाँ वो मात्र 64 दिन रह थे।

वहां पर उन्होंने ने मात्र 64 दिनों में ही अपने गुरु से 64 कलाओं की शिक्षा हासिल कर ली थी।

हालांकि श्री कृष्ण भगवान के अवतार थे और यह कलाएं उन को पहले से ही आती थी। पर चुकी उनका जन्म एक साधारण मनुष्य के रूप में हुआ था

इसलिए उन्होंने गुरु के पास जाकर यह पुनः सीखी।

मुरली मनोहर
ब्रज के धरोहर,

वो नंदलाल गोपाल है
बंसी की धुन पर सब दुःख हरनेवाला

निम्न 64 कलाओं में पारंगत थे श्रीकृष्ण
1- नृत्य – नाचना
2- वाद्य- तरह-तरह के बाजे बजाना
3- गायन विद्या – गायकी।
4- नाट्य – तरह-तरह के हाव-भाव व अभिनय
5- इंद्रजाल- जादूगरी
6- नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना
7- सुगंधित चीजें- इत्र, तेल आदि बनाना
8- फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना
9- बेताल आदि को वश में रखने की विद्या
10- बच्चों के खेल
11- विजय प्राप्त कराने वाली विद्या
12- मन्त्रविद्या
13- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना
14- रत्नों को अलग-अलग प्रकार के आकारों में काटना
15- कई प्रकार के मातृका यन्त्र बनाना
16- सांकेतिक भाषा बनाना
17- जल को बांधना।
18- बेल-बूटे बनाना
19- चावल और फूलों से पूजा के उपहार की रचना करना। (देव पूजन या अन्य शुभ मौकों पर कई रंगों से रंगे चावल, जौ आदि चीजों और फूलों को तरह-तरह से सजाना)
20- फूलों की सेज बनाना।
21- तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना – इस कला के जरिए तोता-मैना की तरह बोलना या उनको बोल सिखाए जाते हैं।
22- वृक्षों की चिकित्सा
23- भेड़, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति
24- उच्चाटन की विधि
25- घर आदि बनाने की कारीगरी
26- गलीचे, दरी आदि बनाना
27- बढ़ई की कारीगरी
28- पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना यानी आसन, कुर्सी, पलंग आदि को बेंत आदि चीजों से बनाना।
29- तरह-तरह खाने की चीजें बनाना यानी कई तरह सब्जी, रस, मीठे पकवान, कड़ी आदि बनाने की कला।
30- हाथ की फूर्ती के काम
31- चाहे जैसा वेष धारण कर लेना
32- तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना
33- द्यू्त क्रीड़ा
34- समस्त छन्दों का ज्ञान
35- वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या
36- दूर के मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण
37- कपड़े और गहने बनाना
38- हार-माला आदि बनाना
39- विचित्र सिद्धियां दिखलाना यानी ऐसे मंत्रों का प्रयोग या फिर जड़ी-बुटियों को मिलाकर ऐसी चीजें या औषधि बनाना जिससे शत्रु कमजोर हो या नुकसान उठाए।
40-कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना – स्त्रियों की चोटी पर सजाने के लिए गहनों का रूप देकर फूलों को गूंथना।
41- कठपुतली बनाना, नाचना
42- प्रतिमा आदि बनाना
43- पहेलियां बूझना
44- सूई का काम यानी कपड़ों की सिलाई, रफू, कसीदाकारी व मोजे, बनियान या कच्छे बुनना।
45 – बालों की सफाई का कौशल
46- मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना
47- कई देशों की भाषा का ज्ञान
48 – मलेच्छ-काव्यों का समझ लेना – ऐसे संकेतों को लिखने व समझने की कला जो उसे जानने वाला ही समझ सके।
49 – सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा
50 – सोना-चांदी आदि बना लेना
51 – मणियों के रंग को पहचानना
52- खानों की पहचान
53- चित्रकारी
54- दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना
55- शय्या-रचना
56- मणियों की फर्श बनाना यानी घर के फर्श के कुछ हिस्से में मोती, रत्नों से जड़ना।
57- कूटनीति
58- ग्रंथों को पढ़ाने की चातुराई
59- नई-नई बातें निकालना
60- समस्यापूर्ति करना
61- समस्त कोशों का ज्ञान
62- मन में कटक रचना करना यानी किसी श्लोक आदि में छूटे पद या चरण को मन से पूरा करना।
63-छल से काम निकालना
64- कानों के पत्तों की रचना करना यानी शंख, हाथीदांत सहित कई तरह के कान के गहने तैयार करना।

ये रहा सबूत, राधा करती थी कृष्‍ण से सबसे अध‌िक प्यार
हम जब कभी भी नाम लेते हैं तो कहते हैं राधा कृष्‍ण।

कभी भी राधा और श्री कृष्‍ण नहीं कहते।

कारण यह है क‌ि राधा कृष्‍ण अलग अलग नहीं बल्क‌ि एक माने जाते हैं क्योंक‌ि इनका प्यार ऐसा था क‌ि दो शरीर होते हुए भी यह एक आत्मा थे।

श्री कृष्‍ण ने कई बार इस बात को एहसास कराया है। एक बार श्री कृष्‍ण स्वयं राधा बन जाते हैं तो कभी राधा का मुंह दूध से जल जाता है तो श्री कृष्‍ण को फफोले आ जाते हैं।

ऐसी ही एक घटना ज‌िसे पढ़ने के बाद आप यह जान जाएंगे क‌ि राधा और कृष्‍ण के बीच कैसा अद्भुत प्रेम है।

तीनों लोकों में राधा नाम की स्तुति सुनकर एक बार देवऋर्षि नारद चिंतित हो गए।

वे स्वयं भी तो कृष्ण से कितना प्रेम करते थे।

अपनी इसी समस्या के समाधान के लिए वे श्रीकृष्ण के पास जा पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि कृष्ण सिरदर्द से कराह रहे हैं।

नारद ने पूछा, भगवन, क्या इस वेदना का कोई उपचार नहीं है?′कृष्ण ने उत्तर दिया,यदि मेरा कोई भक्त अपना चरणोदक पिला दे, तो यह वेदना शांत हो सकती है।

यदि रुक्मिणी अपना चरणोदक पिला दे, तो शायद लाभ हो सकता है।

नारद ने सोचा, ′भक्त का चरणोदक भगवन के श्रीमुख में′फिर रुक्मिणी के पास जाकर उन्हें सारा हाल कह सुनाया।

रुक्मिणी भी बोलीं, `नहीं-नहीं, देवऋर्षि, मैं यह पाप नहीं कर सकती।

′नारद ने लौटकर रुक्मिणी की असहमति कृष्ण के सामने व्यक्त कर दी।

तब कृष्‍ण ने उन्हें राधा के पास भेज दिया।

राधा ने जैसे ही सुना, तो तुरंत एक पात्र में जल लाकर उसमें अपने पैर डुबा दिए और नारद से बोलीं, `देवऋर्षि इसे तत्काल कृष्ण के पास ले जाइए।

मैं जानती हूं इससे मुझे घोर नर्क मिलेगा, किंतु अपने प्रियतम के सुख के लिए मैं यह यातना भोगने को तैयार हूं।′

तब देवऋर्षि नारद समझ गए कि तीनों लोकों में राधा के प्रेम की स्तुति क्यों हो रही है।

प्रस्‍तुत प्रसंग में राधा ने आपने प्रेम का परिचय दिया है। यही है सच्‍चे प्रेम की पराकाष्ठा, जो लाभ-हानि की गणना नहीं करता।

सुनो कन्या जहाँ से तेरा मन करे
मेरी ज़िन्दगी को पड़ लो पन्ना चाहे
कोईं भी खोलो हर पन्ने पर , तेरा नाम होगा मेरे कान्हा

क्यों तोड़ी थी कृष्ण ने बांसुरी?

राधा की बात हो कृष्ण का जिक्र ना हो भला कैसे संभव हो सकता है। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे जो ठहरे।
तभी तो सभी भक्त कृष्ण को राधाकृष्ण के नाम से पुकारते है।

क्योंकि ये दो नाम एक-दूसरे के लिए ही बने हैं और इन्हें अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस नाम के जपने से जीवन रूपी नैया पार लग जाती है।

किसी भीमंदिर में चले जाइए हमेशा श्रीकृष्ण के साथ राधा की मूर्ति ही लगाई जाती हैं।

अगर आप वृदांवन के भी किसी भी मंदिर में जाएंगे तो आपको कृष्ण के साथ राधा ही मिलेंंगी।

कृष्ण से राधा को और राधा से कृष्ण को कोई जुदा नहीं कर सकता, इनका रिश्ता ही इतना गहरा है, लेकिन ये रहस्य आज भी बना हुआ है कि श्रीकृष्ण अपनी प्रिय राधा को छोड़कर मथुरा क्यों चले गए?

कृष्ण ने क्यों छोड़ा राधा प्यारी को ?

राधा ने कृष्ण के बिना अपने जीवन को कैसे बिताया? ये सवाल बहुत गहरे हैं, लेकिन सवालों की गहराई में जाने के बाद शायद इसका सही उत्तर मिल जाए।

ये तो सभी को पता है कि श्रीकृष्ण का बचपन वृंदावन की गलियों में बीता।

नटखट नंदलाल अपनी लीलाओं से सभी को प्रसन्न करते थे।

कुछ को परेशान भी करते, लेकिन कृष्ण के साथ ही तो वृंदावन में खुशियां थीं।

बड़े होकर कृष्ण ने अपनी बांसुरी की मधुर ध्वनि से अनेकों गोपियों का दिल जीता।

सबसे अधिक यदि कोई उनकी बांसुरी से मोहित होता तो वो राधा थीं।

परंतु राधा से कहीं अधिक स्वयं कृष्ण,राधा के दीवाने थे।

विरह की बेला


वृंदावन में शोक का माहौल हो गया। इधर कान्हा के घर में मां यशोदा तो परेशान थी, लेकिन कृष्ण की गोपियां भी कुछ कम उदास नहीं थीं।

कृष्ण को लेने के लिए कंस ने रथ भेजा था।

जिसके आते ही सभी ने उस रथ के आसपास घेरा बना लिया। ये सोचकर कि वे कृष्ण को जाने नहीं देंगे।

उधर कृष्ण को राधा की चिंता सताने लगी।

वे सोचने लगे कि जाने से पहले एक बार राधा से मिल लें। इसलिए मौका पाते ही वे छिपकर वहां से निकल गए।
फिर मिली उन्हें राधा, जिसे देखते ही वे कुछ कह ना सके। राधा-कृष्ण के इस मिलन की कहानी अद्भुत है।

दोनों ना तो कुछ बोल रहे थे, ना कुछ महसूस कर रहे थे, बस चुप थे। राधाकृष्ण को ना केवल जानती थी, वरन् मन और मस्तिष्क से समझती भी थीं।

कृष्ण के मन में क्या चल रहा है, वे पहले से ही भांप लेती थीं।

इसलिए शायद दोनों को उस समय कुछ भी बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

अतत: कृष्ण, राधा को अलविदा कह वहां से लौट आए। उन्होंने गोपियों को भी मना लिया।

क्यों सूना हुआ वृंदावन ?


कृष्ण के बिना वृंदावन सूना हो गया। ना कोई चहल थी ना पहल थी और ना ही कृष्ण की लीलाओं की कोई झलक।

बस सभी कृष्ण के जाने के ग़म में डूबे हुए थे। परंतु दूसरी ओर राधा को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।

क्योंकि उनकी दृष्टि में कृष्ण कभी उनसे अलग हुए ही नहीं थे। शारीरिक रूप से जुदाई उनके लिए कोई महत्व नहीं रखती थी।

यदि कुछ महत्वपूर्ण था तो राधा-कृष्ण का भावनात्मक रूप से हमेशा जुड़े रहना।

कृष्ण के जाने के बाद राधा पूरा दिन उन्हीं के बारे में सोचती रहती।

वे कृष्ण प्रेम में अपनी शुद्ध खो चुकी थी उन्हें इतना भी होश नहीं था कि आने वाले समय में राधा की जिंदगी क्या मोड़ लेने वाली थी।

उन्हें इसका अंदाज़ा भी नहीं था। माता-पिता के दबाव में आकार राधा को विवाह करना पड़ा।

विवाह के बाद अपना जीवन, संतान तथा घर-गृहस्थी के नाम करना पड़ा, लेकिन दिल के किसी कोने में अब भी वे कृष्ण का ही नाम लेती थीं।

राधा ने छोड़ा घर


दिन बीते साल बीत गए और समय आ गया था जब राधा काफी वृद्ध हो गई थी।

फिर एक रात वे चुपके से घर से निकल गई, घूमते-घूमते कृष्ण की द्वारिका नगरी में जा पहुंची।
वहां पहुंचते ही उसने कृष्ण से मिलने के लिए निवेदन किया, लेकिन पहली बार में उन्हें वो मौका नहीं मिला।

परंतु फिर आखिरकार उन्होंने काफी सारे लोगों के बीच खड़े कृष्ण को खोज निकाला।

राधा को देखते ही कृष्ण के खुशी का ठिकाना नहीं रहा, लेकिन दोनों में कोई बात नहीं हुई, क्योंकि वह मानसिक संकेत अभी भी वही थे।

उन्हें उस वक्त भी शब्दों की आवश्यकता नहीं थी।

राधा को बनाया देविका


कहते है कृष्ण ने राधा के अनुरोध पर कृष्ण ने उन्हें महल में एक देविका के रूप में नियुक्त करा दिया।

वे दिन भर महल में रहती, महल से संबंधित कार्यों को देखती।

जब भी मौका मिलता दूर से ही कृष्ण के दर्शन कर लेती, लेकिन फिर भी ना जाने क्यों राधा में धीरे-धीरे एक भय पैदा हो रहा था।

जो बीतते समय के साथ बढ़ता जा रहा था। उन्हें फिर से कृष्ण से दूर हो जाने का डर सताता रहता।

उनकी यह भावनाएं उन्हें कृष्ण के पास रहने न देतीं।

साथ ही बढ़ती उम्र ने भी उन्हें कृष्ण से दूर चले जाने को मजबूर कर दिया।

अंतत: एक शाम वे महल से चुपके से निकल गई और ना जाने किस ओर चल पड़ी।

वे नहीं जानती थीं कि वे कहां जा रही हैं।

आगे मार्ग पर क्या मिलेगा, बस चलती जा रही थी। परंतु कृष्ण तो भगवान हैं, वे सब जानते थे।

वे अपने अंतर्मन से जानते थे कि राधा कहां जा रही है।

राधा ने पुकारा कृष्ण को

फिर वह समय आया जब राधा को कृष्ण की आवश्यकता पड़ी।

वो अकेली थी और बस किसी भी तरह से कृष्ण को देखना चाहती थी।

यह तमन्ना उत्पन्न होते ही कृष्ण उनके सामने आ गए। कृष्ण को अपने सामने देख राधा अति प्रसन्न हो गई।

परंतु वह समय निकट था जब राधा अपने प्राण त्याग कर दुनिया को अलविदा कहना चाहती थी।

कृष्ण ने राधा से कहा कि वे उनसे कुछ मांगे, लेकिन राधा ने मना कर दिया।

कृष्ण ने फिर से कहा कि जीवन भर राधा ने कभी उनसे कुछ नहीं मांगा। इसलिए राधा ने एक ही मांग की कि ‘वे आखिरी बार कृष्ण को बांसुरी बजाते देखना चाहती थी’।

कृष्ण ने बांसुरी ली और बेहद मधुर धुन में उसे बजाया। बांसुरी की धुन सुनते-सुनते राधा ने अपने शरीर का त्याग कर दिया।

उनके जाते ही कृष्ण ने अपनी बांसुरी तोड़ दी और कोसों दूर फेंक दी।

राधा जी के अनमोल प्‍यार की कहानी है राधा अष्‍टमी

यह तो हम सभी जानते हैं कि श्री कृष्‍ण की कई पत्नियां थीं, लेकिन उनमें से राधा जी को ही उनकी सबसे खास और दिल के पास माना गया था।

कृष्‍ण का नाम बिना राधा के बिल्‍कुल अधूरा है।

राधा अष्‍टमी वह पावन दिन है जब राधा जी का जन्‍म हुआ था।

यह दिन भाद्र मास में शुक्‍ल पक्ष की अष्‍टमी को आता है।

राधा रानी का जन्‍म स्‍थल रावल गांव है और राधा रानी की लीला स्‍थली बरसाना है।

राधा का जन्‍म या फिर ये कहें कि राधा जी को कमल के पत्‍ते पर सोता हुआ पाया गया था।

महाराज वृषभानु और उनकी पत्‍नी कीर्ति ने राधा को वहां से उठा कर अपनी बेटी बनाया।

कहते हैं कि राधा जी ने तब तक अपनी आंखें नहीं खोली जब तक कि भगवान श्री कृष्‍ण का जन्‍म नहीं हो गया।

राधा अष्‍टमी के दिन भक्‍त पूरा दिन व्रत रखते हैं।

मंदिरों, आश्रमों में धूम मचाने लाखों भक्त जुटते हैं। राधा जी की मूर्ती को दूध से साफ कर के फूलों और गहनों से सजाया जाता है।

वैसे तो हम राधा-कृष्‍ण के रासलीला के बारे में काफी कुछ जानते हैं लेकिन बहुत से लोगों को राधा अष्‍टमी के दिन की कुछ खास जानकारी नहीं है।

राधा का जन्‍म महाराज वृषभानु और उनकी पत्‍नी कीर्ति ने अपने पिछले जन्‍म में भगवान ब्रह्मा से वरदान मांगा था कि अगले जन्‍म में उन्‍हें माता लक्ष्‍मी एक बेटी के रूप में दें।

तब भगवान ब्रह्मा ने उन्‍हें यह वरदान दिया।

फिर एक दिन राजा वृषभानु पैदल ही अपने घर जा रहे थे, तभी रास्‍ते में कमल के एक बडे़ से पत्‍ते पर उन्‍हें छोटी सी बच्‍ची मिली।

उन्‍होनें उस बच्‍ची को गोद लिया और सीधा घर पहुंच गए। इस तरह से राधा जी उनके घर पर आईं।

राधा का जन्‍म महाराज वृषभानु और उनकी पत्‍नी कीर्ति ने अपने पिछले जन्‍म में भगवान ब्रह्मा से वरदान मांगा था कि अगले जन्‍म में उन्‍हें माता लक्ष्‍मी एक बेटी के रूप में दें।

तब भगवान ब्रह्मा ने उन्‍हें यह वरदान दिया।

फिर एक दिन राजा वृषभानु पैदल ही अपने घर जा रहे थे, तभी रास्‍ते में कमल के एक बडे़ से पत्‍ते पर उन्‍हें छोटी सी बच्‍ची मिली।

उन्‍होनें उस बच्‍ची को गोद लिया और सीधा घर पहुंच गए। इस तरह से राधा जी उनके घर पर आईं।

राधा ही कृष्ण और कृष्ण ही राधा क्यों है ?


राधा कृष्णा कोई दो नहीं थे।

दुनिया की नज़रो में वो दो थे, लेकिन राधा जी के नज़रो में सिर्फ कृष्ण थे और कृष्ण जी की नज़रो में सिर्फ राधा जी थी।

प्रेम सिर्फ पाने का नाम नहीं ना ही प्रेम न मिलने से खो जाता है सच्चा प्रेम अनमोल होता है।

प्रेम में शब्दों का खेल नहीं होता है यहाँ तो आँखों से सब बया कर दिया जाता है।

सच्चे प्रेम में तो उनकी यादें में छू जाये तो पता चल जाता है की वो आपको याद कर रहे है।

श्री कृष्ण जी खुद कहते थे मैं राधा सरोवर प्रेम का सिर्फ एक हंस हूँ।

श्री जी का आगमन:-

यह सब जानते है , भगवान कृष्ण ने राधा जी को पृथ्वी पर जन्म लेने का आग्रह किया।

यह भादो (सितंबर के महीने में ), शुक्ल पक्ष की अष्टमी, अनुराधा नक्षत्र का समय था और समय 12 बजे जब राधा रानी इस दुनिया में प्रकट हुई।

कृष्ण के लिए दिव्य प्रेम:-


श्री राधा जी ने अपनी आँखें नहीं खोलीं, जब तक कि वह भगवान कृष्ण के सुंदर चेहरे को नहीं देखा।

वृषभनु और उनकी पत्नी बहुत परेशान थे और इस धारणा के तहत कि लड़की अंधी थी। जन्म से ही अपार शुद्ध प्रेम ग्यारह महीनों के बाद, जब अपने परिवार के साथ वृषभनू नंदबाबा को देखने के लिए गोकुल गए तो श्री राधा जी ने अपनी आंखें पहली बार खोली वो भी जब नंदबाबा बाल गोपाल श्री कृष्ण को उनके सामने लाये।

अपने स्वामी आकर्षक चेहरे को देखने के लिए राधा रानी ने अपनी अपनी आंखें खोल दीं।

वह पहली बार अपनी आँखें खोलने पर श्री कृष्ण जी का चेहरा देखना चाहती थी और यही कारण था कि उन्होंने अब तक अपनी आंखें नहीं खोली थी।

गह्वर वन जहा राधा कृष्णा पहली बार अकेले मिले:-


बरसाने से कुछ किलोमीटर दूर गह्वर वन है यही वो जगह है जहा राधा कृष्णा पहली बार अकेले मिले।

जहा उन्होंने कुछ समय साथ में व्यतीत किया। जहा श्री कृष्ण ने राधा रानी के बालों को फूलो से सजाया था।

वृंदावन और उनके प्यार:-


उनका प्रेम वृंदावन की जमीन पर उग आया जो माना जाता है कि श्री जी का दिल और ब्रह्माण्ड में सबसे अधिक धन्य भूमि है ।

उन्होंने यमुना के तट पर महा-रास लीला किया जो को युगो युगो तक नहीं भुलाया जा सकता ये अटूट भक्ति (प्रेम ) का संगम था।

लेकिन तब वह समय भी आ गया जब शाप के कारन कृष्णा ो राधा जी से अलग होना पड़ा।

उनसे दूर जाना पड़ा। लेकिन वो कहते है ना जिनकी रूह एक दूसरे की रूह में समायी होती है वो अलग कहा होते है। कंस को मारने के लिए श्री कृष्णा को मथुरा जाना पड़ा।

जाने से पहले, श्री कृष्णा जी ने ,श्री राधा जी से अपना वचन लिया को वो उनकी याद में कभी आँसू नहीं बहायेंगी।
सच्चे प्रेम को कोई कहा कैद कर पाया

सच्चा प्रेम तो उस फूलो की खुशबू की तरह है जिसे छुआ नहीं जा सकता सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
जिसने महसूस कर लिया उसका जीवन भी प्रेम भरी खुशबु से महकने लगेगा।

” राधा ने श्री कृष्णा से पूछा प्यार का असली मतलब क्या होता है , श्री कृष्णा ने हंस कर कहा जहाँ मतलब होता है वहां प्यार ही कहाँ होता है “


” प्यार सबको आजमाता है। सोलह हज़ार एक सौ आठ रानियों से मिलने वाला श्याम एक राधा को तरस जाता हैं। “
आज भी राधारानी को ब्रज की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है. राधा नाम कृष्ण से पूर्व याद किया जाता हैं. क्योंकी श्रीकृष्ण की ऐसी इच्छा थी कि उनके नाम से पहले जो भी राधा का नाम लेगा उनका वह उद्धार करेंगे.

राधा कृष्ण का प्रेम एक ऐसा प्रेम है जो न तो कभी मिटा, और न ही मिटेगा. आज के समय में राधा कृष के प्रेम की लोग पूजा करते है. राधा कृष्ण ने सब कुछ खो कर भी एक-दूजे को पा लिया.


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