शरद पूर्णिमा के व्रत का महत्व | Sharad Purnima ka Vrat

मान्यता है कि माता श्री लक्ष्मी जी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसलिए देश के कई शहरों में शरद पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना की जाती है   ! 

इस दिन मनुष्य सुबह जल्दी उठकर विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और जितेन्द्रिय भाव से रहे। मां लक्ष्मी की प्रतिमा को चूंकि के ऊपर लाल कपडे के ऊपर स्थापित कर भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें,लाल पुष्प माता को चढ़ाएं और सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर घी के दीपक जलाए। 

इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूंगी।  

इस प्रकार यह शरद पूर्णिमा, कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं मां लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं। 

मंत्र : ‘ॐ इन्द्राय नमः’, ‘ॐ कुबेराय नमः’ “ॐ धनदाय नमस्तुभ्यं, निधि-पद्माधिपाय च। भवन्तु त्वत्-प्रसादान्ने, धन-धान्यादि-सम्पदः।।”  

द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था तब माता श्री लक्ष्मी जी ने राधा रूप में अवतरित हुई थी ! 

भगवान श्री कृष्ण और राधा की अद्भुत रासलीला का आरंभ भी शरद पूर्णिमा के दिन माना जाता है ! 

शिव भक्तों के लिए शरद पूर्णिमा व्रत का बहुत ही विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कुमार कार्तिकेय जी का जन्म भी शरद पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। 

इसी कारण से इसे कुमार पूर्णिमा या कार्तिक पूर्णिमा भी कहा जाता है। पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में इस दिन कुमारी कन्याएं प्रातः स्नान करके सूर्य और चन्द्रमा की पूजा करती हैं। माना जाता है कि इससे योग्य पति प्राप्त होता है।

इस दिन कुंवारी कन्याएं प्रातः काल स्नान करके सूर्य और चन्द्रमा की पूजा करती हैं। माना जाता है कि इससे उन्हें योग्य पति की प्राप्त होती है। 

अनादिकाल से चली आ रही प्रथा का आज फिर निर्वाह किया जाएगा। स्वास्थ्य और अमृत्व की चाह में एक बार फिर खीर आदि को शरद-चंद्र की चांदनी में रख दे और प्रसाद स्वरूप इसका सुबह उठकर सेवन कर लें ।


शरद पूर्णिमा कब है 2021 ?

इस वर्ष शरद पूर्णिमा 19 अक्टूबर 2021 मंगलवार के दिन मनाई जाएगी |

Sharad Purnima Vrat
Sharad Purnima ki Vrat katha

शरद पूर्णिमा के व्रत का महत्व

आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा व्रत के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है ! 

यह तो आप सब जानते भी हो की शरद पूर्णिमा को कोजागर पूर्णिमा भी कहते है  शरद पूर्णिमा का शास्त्रों में बहुत महत्व बताया गया है रात्रि के उस पहर का जिसमें 16 कलाओं से युक्त चंद्रमा अमृत की वर्षा धरती पर करता है। 

वर्षा ऋतु की जरावस्था और शरद ऋतु के बाल रूप का यह सुंदर संजोग हर किसी का मन मोह लेता है। 

शरद पूर्णिमा से हेमंत ऋतु की शुरुआत होती है। शरद पूर्णिमा का महत्व शास्त्रों में भी वर्णित है। 

शास्त्रानुसार इस रात्रि को चंद्रमा अपनी समस्त कलाओं के साथ होता है और धरती पर अमृत वर्षा करता है। 

रात्रि 12 बजे होने वाली इस अमृत वर्षा का लाभ मानव को मिले इसी उद्देश्य से चंद्रोदय के वक्त गगन तले खीर या दूध रखा जाता है जिसका सेवन रात्रि 12 बजे बाद किया जाता है। 

मान्यता तो यह भी है कि इस तरह रोगी रोगमुक्त भी होता है। इसके अलावा खीर देवताओं का प्रिय भोजन भी है ! 

शरद पूर्णिमा की कहानी

एक साहूकार के दो पुत्रियां थी | दोनों पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत रखती थी, परन्तु बड़ी पुत्री विधिपूर्वक पूरा व्रत करती थी जबकि छोटी पुत्री अधूरा व्रत ही किया करती थी|

परिणामस्वरूप साहूकार के छोटी पुत्री की संतान पैदा होते ही मर जाती थी

उसने पंडितों से अपने संतानों के मरने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि पहले समय में तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत किया करती थी, जिस कारणवश तुम्हारी सभी संतानें पैदा होते ही मर जाती है फिर छोटी पुत्री ने पंडितों से इसका उपाय पूछा तो उन्होंने बताया कि यदि तुम विधिपूर्वक पूर्णिमा का व्रत करोगी, तब तुम्हारे संतान जीवित रह सकते हैं|

साहूकार की छोटी कन्या ने उन भद्रजनों की सलाह पर पूर्णिमा का व्रत विधिपूर्वक संपन्न किया और फलस्वरूप उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई परन्तु वह शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो गया |

तब छोटी पुत्री ने उस लड़के को पीढ़ा पर लिटाकर ऊपर से पकड़ा ढ़क दिया  फिर अपनी बड़ी बहन को बुलाकर ले आई और उसे बैठने के लिए वही पीढ़ा दे दिया| 

बड़ी बहन जब पीढ़े पर बैठने लगी तो उसका घाघरा उस मृत बच्चे को छू गया, बच्चा घाघरा छूते ही रोने लगा |

बड़ी बहन बोली- तुम तो मुझे कलंक लगाना चाहती थी| मेरे बैठने से तो तुम्हारा यह बच्चा यह मर जाता  

तब छोटी बहन बोली- बहन तुम नहीं जानती, यह तो पहले से ही मरा हुआ था, तुम्हारे भाग्य से ही फिर से जीवित हो गया है |

तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है| इस घटना के उपरान्त ही नगर में उसने पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढ़िंढ़ोरा पिटवा दिया. 


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