हनुमान चालीसा आरती सहित

 

भगवान राम के सबसे बड़े भक्त हनुमान जी हमेशा श्री राम की भक्ति में लीन रहते हैं सारा दिन प्रभु की सेवा में लगे रहते हैं.


महाबली हनुमान को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का अनन्य भक्त माना जाता है। उनको धरती पर अमरत्व का वरदान प्राप्त है। 



रामायण के प्रमुख पात्रों में से एक, इंसानी जीवन को कठिनाई से उद्धार देने वाले पवनपुत्र को दुष्टों को दंड देने वाला और संहारक माना जाता है। 




भगवान राम की भक्ति के प्रसंग में उन्होंने कई बार श्रीराम के सानिध्य में शत्रुओं का संहार किया और युद्ध में विजय का वरण किया। इसलिए सनातन संस्कृति में कई पर्व हनुमानजी को समर्पित है।

श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित
श्री हनुमान – Shree Hanuman Chalisa

 

दोहा
 
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥
 
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार
 
चौपाई
 
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥
 
राम दूत अतुलित बल धामा
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥२॥
 
महाबीर बिक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥
 
कंचन बरन बिराज सुबेसा
कानन कुंडल कुँचित केसा॥४॥
 
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे
काँधे मूँज जनेऊ साजे॥५॥
 
शंकर सुवन केसरी नंदन
तेज प्रताप महा जगवंदन॥६॥
 
विद्यावान गुनी अति चातुर
राम काज करिबे को आतुर॥७॥
 
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया
राम लखन सीता मनबसिया॥८॥
 
सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा
विकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥
 
भीम रूप धरि असुर सँहारे
रामचंद्र के काज सवाँरे॥१०॥
 
लाय सजीवन लखन जियाए
श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥११॥
 
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई
तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई॥१२॥
 
सहस बदन तुम्हरो जस गावै
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥१३॥
 
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा
नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥
 
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥१५॥
 
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥
 
तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना
लंकेश्वर भये सब जग जाना॥१७॥
 
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू
लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥१८॥
 
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही
जलधि लाँघि गए अचरज नाही॥१९॥
 
दुर्गम काज जगत के जेते
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥
 
राम दुआरे तुम रखवारे
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥
 
सब सुख लहैं तुम्हारी सरना
तुम रक्षक काहु को डरना॥२२॥
 
आपन तेज सम्हारो आपै
तीनों लोक हाँक तै कापै॥२३॥
 
भूत पिशाच निकट नहि आवै
महावीर जब नाम सुनावै॥२४॥
 
नासै रोग हरे सब पीरा
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥
 
संकट तै हनुमान छुडावै
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥२६॥
 
सब पर राम तपस्वी राजा
तिनके काज सकल तुम साजा॥२७॥
 
और मनोरथ जो कोई लावै
सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥
 
चारों जुग परताप तुम्हारा
है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥
 
साधु संत के तुम रखवारे
असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥
 
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता
अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
 
राम रसायन तुम्हरे पासा
सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥
 
तुम्हरे भजन राम को पावै
जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥
 
अंतकाल रघुवरपुर जाई
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥
 
और देवता चित्त ना धरई
हनुमत सेई सर्व सुख करई॥३५॥
 
संकट कटै मिटै सब पीरा
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥
 
जै जै जै हनुमान गुसाईँ
कृपा करहु गुरु देव की नाई॥३७॥
 
जो सत बार पाठ कर कोई
छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥
 
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा
होय सिद्ध साखी गौरीसा॥३९॥
 
तुलसीदास सदा हरि चेरा
कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥४०॥
 
दोहा
 
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

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श्री हनुमान भगवान राम का निजधाम प्रस्थान

 
अश्विन पूर्णिमा के दिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने अयोध्या से सटे फैजाबाद शहर के सरयू किनारे जल समाधि लेकर महाप्रयाण किया। श्रीराम ने सभी की उपस्थिति में ब्रह्म मुहूर्त में सरयू नदी की ओर प्रयाण किया। जब श्रीराम जल समाधि ले रहे थे तब उनके परिवार के सदस्य भरत, शत्रुघ्न, उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति सहित हनुमान, सुग्रीव आदि कई महान आत्माएं मौजूद थीं।
 
 गरुढ़ पुराण अनुसार  :-

 

‘अतो रोचननामासौ मरुदंशः प्रकीर्तितः रामावतारे हनुमान्रामकार्यार्थसाधकः।’ अर्थात ‘जब देवाधिदेव रामचंद्र अवतरित हुए तब उनके प्रतिनिधि मरुत् अर्थात वायुदेव उनकी सेवा और शुश्रुषा के हेतु उनके साथ अवतरित हुए जिन्हें सभी हनुमान इस नाम से जानते हैं।’
 
 
रामायण के बालकांड अनुसार:-
 
‘विष्णोः सहायान् बलिनः सृजध्वम्’ अर्थात ‘भगवान विष्णु के सहायता हेतु सभी देवों ने अनेकों वानर, भालू और विविध प्राणियों के रूपमें जन्म लिया।’





अतः जब प्रभु राम स्वयं ही अपने धाम वापस चले गए तब सभी वानरों का इस मृत्युलोक में कार्य समाप्त हो चुका था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि तब हनुमान जी कहां चले गए या उनका क्या हुआ?
 
 
कहते हैं कि श्रीराम के अपने निजधाम प्रस्थान करने के बाद हनुमानजी और अन्य वानर किंपुरुष नामक देश को प्रस्थान कर गए। वे मयासुर द्वारा निर्मित द्विविध नामक विमान में बैठकर किंपुरुष नामक लोक में प्रस्थान कर गए। 


किंपुरुष लोक स्वर्ग लोग के समकक्ष है। यह किन्नर, वानर, यक्ष, यज्ञभुज् आदि जीवों का निवास स्थान है। वहां भूमी के उपर और भूमी के नीचे महाकाय शहरों का निर्माण किया गया है। 



योधेय, ईश्वास, अर्ष्टिषेण, प्रहर्तू आदि वानरों के साथ हनुमानजी इस लोग में प्रभु रामकी भक्ति, कीर्तन और पूजा में लीन रहते हैं।
 
श्रीशुक उवाच। किम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं लक्ष्मणाग्रजं सीताभिरामं रामं तच्चरण सन्निकर्षाभिरतः परमभागवतो हनुमान्सह किम्पुरुषैरविरतभक्तिरुपास्ते॥ श्रीमद्भागवतम्
 
 
श्रील शुकदेव गोस्वामी जी ने कहाँ, “हे राजन्, किंपुरुष लोक में भक्तों में श्रेष्ठ हनुमान उस लोक के अन्य निवासियों के साथ प्रभु राम जो लक्ष्मण के बड़े भ्राता और सीता के पति है, उनकी सेवा में हमेशा मग्न रहते हैं।”
 
आर्ष्टिषेणेन सह गन्धर्वैरनुगीयमानां परमकल्याणीं भर्तृभगवत्कथां समुपशृणोति स्वयं चेदं गायति ॥- श्रीमद्भागवतम्
 
वहां गंधर्वों के समूह हमेशा रामचंद्र के गुणों का गान करते रहते हैं। वह गान अत्यंत शुभ और मनमोहक होता है। 


हनुमानजी और आर्ष्ट्रीषेण जो किंपुरुष लोक के प्रमुख है वे उन स्तुतिगानों को हमेशा सुनते रहते हैं।
 
किम्पौरुषाणाम् वायुपुत्रोऽहं ध्रुवे ध्रुवः मुनिः॥- ब्रह्म वैवर्त पुराण किंपुरुष लोक के निवासियों में तुम मुझे वायुपुत्र हनुमान जानलो तथा ध्रुवलोक में मुझे ध्रुव ऋषि के रूप में देखो।
 
 

कहां हैं किंपुरुष नामक क्षेत्र?

 
किंपुरुष नेपाल के हिमालययी क्षेत्र में आता है। प्राचीनकाल में जम्बूद्वीप के नौ खंडों में से एक किंपुरुष भी था। नेपाल और तिब्बत के बीच कहीं पर किंपुरुष की स्थिति बताई गई है। 


हालांकि पुराणों अनुसार किंपुरुष हिमालय पर्वत के उत्तर भाग का नाम है। यहां किन्नर नामक मानव जाति निवास करती थी। 



ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि इस स्थान पर मानव की आदिम जातियां निवास करती थीं।
 
यहीं पर एक पर्वत है जिसका नाम गंधमादन कहा गया है।
 
 

गंधमादन पर्वत कहां हैं?

 
हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद भागवत में वर्णन आता है। उल्लेखनीय है कि अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे थे। 


एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंच गए थे, जहां उन्होंने हनुमान को लेटे देखा और फिर हनुमान ने भीम का घमंड चूर कर दिया था।
 
 
गंधमादन में ऋषि, सिद्ध, चारण, विद्याधर, देवता, गंधर्व, अप्सराएं और किन्नर निवास करते हैं। वे सब यहां निर्भीक विचरण करते हैं। 


हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत की। यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था। 





सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था। आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है। 



पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था।
 

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संकटमोचन हनुमान अष्टक

 
बाल समय रवि भक्षि लियो तब
 
तीनहुं लोक भयो अंधियारों
ताहि सो त्रास भयो जग को
 
यह संकट काहु सों जात न टारो
 
(देवन आनि करी विनती तब)
(छाड़ि दियो रवि कष्ट निवारो)
 
को नहीं जानत है जग में कपि
 
(संकटमोचन नाम तिहारो)
(संकटमोचन नाम तिहारो)
 
 
 
वालि की त्रास कपीस बसै गिरि
जात महाप्रभु पंथ निहारो
 
चौंकि महामुनि शाप दियो तब
चाहिए कौन बिचार बिचारो
 
(कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु)
(सो तुम दास के शोक निवारो)
 
को नहीं जानत है जग में कपि
 
(संकटमोचन नाम तिहारो)
(संकटमोचन नाम तिहारो)
 
 
 
 
अंगद के संग लेन गए सिय
खोज कपीस यह बैन उचारो
 
जीवत न बचिहौ हम सो जु
बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो
 
(हेरी थके तट सिन्धु सबै तब)
 
(लाए सिया-सुधि प्राण उबारो)
को नहीं जानत है जग में कपि
 
(संकटमोचन नाम तिहारो)
(संकटमोचन नाम तिहारो)
 
 
 
रावण त्रास दई सिय को सब
राक्षसि सो कही सोक निवारो
 
ताहि समय हनुमान महाप्रभु
जाए महा रजनीचर मारो
 
(चाहत सीय असोक सों आगिसु)
(दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो)
 
को नहीं जानत है जग में कपि
(संकटमोचन नाम तिहारो)
(संकटमोचन नाम तिहारो)
 
 
 
बान लग्यो उर लछिमन के तब
प्राण तजे सुत रावण मारो
लै गृह बैद्य सुषेन समेत
 
तबै गिरि द्रोण सुबीर उपारो
 
(आनि सजीवन हाथ दई तब)
(लछिमन के तुम प्रान उबारो)
 
को नहीं जानत है जग में कपि
 
(संकटमोचन नाम तिहारो)
(संकटमोचन नाम तिहारो)
 
 







रावन युद्ध अजान कियो तब
नाग कि फांस सबै सिर डारो
 
श्री रघुनाथ समेत सबै दल
मोह भयो यह संकट भारो
 
(आनि खगेस तबै हनुमान जु)
(बंधन काटि सुत्रास निवारो)
 
को नहीं जानत है जग में कपि
 
(संकटमोचन नाम तिहारो)
 
(संकटमोचन नाम तिहारो)
 
 
 
 
 
बंधु समेत जबै अहिरावन
लै रघुनाथ पताल सिधारो
 
देबिन्ही पूजि भली विधि सों बलि
देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो
 
(जाये सहाए भयो तब ही)
(अहिरावन सैन्य समेत संहारो)



को नहीं जानत है जग में कपि
(संकटमोचन नाम तिहारो)
(संकटमोचन नाम तिहारो)
 
 
 
 
 
काज किये बड़ देवन के तुम
बीर महाप्रभु देखि बिचारो
 
कौन सो संकट मोर गरीब को
जो तुमसो नहिं जात है टारो
 
(बेगि हरो हनुमान महाप्रभु)
(जो कछु संकट होए हमारो)
 
को नहीं जानत है जग में कपि
 
(संकटमोचन नाम तिहारो)
(संकटमोचन नाम तिहारो)
(संकटमोचन नाम तिहारो)
(संकटमोचन नाम तिहारो)

 



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श्री हनुमान आरती – Hanuman ji ki Aarti

 
आरती कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
 
जाके बल से गिरिवर कांपे।
रोग दोष जाके निकट न झांके॥
 
अंजनि पुत्र महा बलदाई।
सन्तन के प्रभु सदा सहाई॥
 
॥ आरती कीजै हनुमान.. ॥
 
दे बीड़ा रघुनाथ पठाए।
लंका जारि सिया सुधि लाए॥
 
लंका सो कोट समुद्र-सी खाई।
जात पवनसुत बार न लाई॥
 
॥ आरती कीजै हनुमान.. ॥
 
लंका जारि असुर संहारे।
सियारामजी के काज सवारे॥
 
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।
आनि संजीवन प्राण उबारे॥
 
॥ आरती कीजै हनुमान.. ॥
 
पैठि पाताल तोरि जम-कारे।
अहिरावण की भुजा उखारे॥
 
बाएं भुजा असुरदल मारे।
दाहिने भुजा संतजन तारे॥
 
॥ आरती कीजै हनुमान.. ॥
 
सुर नर मुनि आरती उतारें।
जय जय जय हनुमान उचारें॥
 
कंचन थार कपूर लौ छाई।
आरती करत अंजना माई॥
 
॥ आरती कीजै हनुमान.. ॥
 
जो हनुमानजी की आरती गावे।
बसि बैकुण्ठ परम पद पावे॥
 
॥ आरती कीजै हनुमान.. ॥
 

 

॥ इति श्री हनुमान आरती ॥



 
 

 





श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित

क्या हमे चालीसा पढते समय पता भी होता है कि हम हनुमानजी से क्या कह रहे हैं या क्या मांग रहे हैं?

बस रटा रटाया बोलते जाते हैं। आनंद और फल शायद तभी मिलेगा जब हमें इसका मतलब भी पता हो।

तो लीजिए पेश है श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित!!


श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।


《अर्थ》→ गुरु महाराज के चरण.कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।


《अर्थ》→ हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन.करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥


《अर्थ 》→ श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥


《अर्थ》→ हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥
《अर्थ》→ हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक है।
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥
《अर्थ》→ आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥
《अर्थ》→ आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥
《अर्थ 》→ हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर मे वन्दना होती है।
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥
《अर्थ 》→ आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥
《अर्थ 》→ आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।
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सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥
《अर्थ》→ आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके.लंका को जलाया।
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भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥
《अर्थ 》→ आपने विकराल रुप धारण करके.राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।
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लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥
《अर्थ 》→ आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।
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रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥
《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।
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सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥
《अर्थ 》→ श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से.लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।
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सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥
《अर्थ》→श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।
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जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥
《अर्थ 》→ यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।
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तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥
《अर्थ 》→ आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।
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तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥
《अर्थ 》→ आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।
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जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥
《अर्थ 》→ जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।
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प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥
《अर्थ 》→ आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।
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दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥
《अर्थ 》→ संसार मे जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।
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राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥
《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप.रखवाले है, जिसमे आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।
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सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू.को डरना॥22॥
《अर्थ 》→ जो भी आपकी शरण मे आते है, उस सभी को आन्नद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक. है, तो फिर किसी का डर नही रहता।
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आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥
《अर्थ. 》→ आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते है।
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भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥
《अर्थ 》→ जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नही फटक सकते।
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नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥
《अर्थ 》→ वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।
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संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥
《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते है।
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सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥
《अर्थ 》→ तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यो को आपने सहज मे कर दिया।
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और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥
《अर्थ 》→ जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन मे कोई सीमा नही होती।
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चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥
《अर्थ 》→ चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत मे आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।
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साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥
《अर्थ 》→ हे श्री राम के दुलारे ! आप.सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।
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अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
《अर्थ 》→ आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।
1.) अणिमा → जिससे साधक किसी को दिखाई नही पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ मे प्रवेश कर.जाता है।
2.) महिमा → जिसमे योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।
3.) गरिमा → जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।
4.) लघिमा → जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।
5.) प्राप्ति → जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।
6.) प्राकाम्य → जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी मे समा सकता है, आकाश मे उड़ सकता है।
7.) ईशित्व → जिससे सब पर शासन का सामर्थय हो जाता है।
8.)वशित्व → जिससे दूसरो को वश मे किया जाता है।
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राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥
《अर्थ 》→ आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।
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तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥
《अर्थ 》→ आपका भजन करने से श्री राम.जी प्राप्त होते है, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते है।★
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अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥
《अर्थ 》→ अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलायेंगे।
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और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35
《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नही रहती।
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संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥
《अर्थ 》→ हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।
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जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥
《अर्थ 》→ हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।
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जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥
《अर्थ 》→ जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छुट जायेगा और उसे परमानन्द मिलेगा।
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जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥
《अर्थ 》→ भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।
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तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥
《अर्थ 》→ हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।
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पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥


《अर्थ 》→ हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलो के स्वरुप है। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय मे निवास कीजिए।


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