आज की ग्रह स्थिति एवं गोचर नवग्रह राशि भोगांश, वक्री व अस्त स्थिति, नक्षत्र एवं गोचर कुंडली चक्र
सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु व केतु की वर्तमान खगोलीय स्थिति। सटीक लाहिरी अयनांश गणना, राशि, अंश, नक्षत्र, चरण, वक्रत्व (Retrograde ℞), अस्त (Combust) स्थिति, उत्तर व दक्षिण भारतीय कुंडली चक्र और ग्रह दृष्टियां।
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राशि चक्र में उल्टी चाल
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सूर्य के सानिध्य में प्रकाशहीन
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सटीक ग्रह स्थिति सारणी (Ephemeris Table)
निरयण लाहिरी भोगांश, राशि, भाव, नक्षत्र, चरण, वक्रत्व एवं अवस्था
| ग्रह (Planet) | स्थिति | राशि (Sign) | राशि भोगांश | भाव | पूर्ण भोगांश | नक्षत्र व चरण | राशि स्वामी | अवस्था (Dignity) |
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| ग्रह गणना की जा रही है... | ||||||||
गोचर कुंडली चक्र (Transit Chart)
स्थानीय लग्न के आधार पर 12 भावों में ग्रहों की दृश्य स्थिति।
🏛️ केंद्र व त्रिकोण भावों में स्थित ग्रह
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विशेष: केंद्र और त्रिकोण में शुभ ग्रहों का गोचर भाग्य में वृद्धि करता है, जबकि उपचय भावों (3, 6, 10, 11) में क्रूर ग्रह शत्रुओं और बाधाओं पर विजय दिलाते हैं।
वैदिक ग्रह दृष्टि सारणी (Graha Drishti)
मंगल की 4थी/8वीं, गुरु की 5वीं/9वीं, शनि की 3री/10वीं व सभी ग्रहों की सप्तम पूर्ण दृष्टि।
| ग्रह | स्थित भाव व राशि | दृष्टिगत भाव (Aspected Houses) | दृष्टि प्राप्त राशियां व ग्रह |
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ग्रह स्थिति व गोचर को कैसे समझें?
दैनिक गोचर फलित के प्रामाणिक वैदिक ज्योतिषीय सिद्धांत।
♈ राशि भोगांश एवं नक्षत्र
प्रत्येक राशि 30° की होती है। 0° से 1° और 29° से 30° के बीच ग्रह को 'संधि' में माना जाता है। प्रत्येक नक्षत्र 13° 20' का होता है जो 4 चरणों (3° 20' प्रत्येक) में विभाजित रहता है।
℞ वक्री गति का फलित
वक्री ग्रह पृथ्वी के सर्वाधिक समीप होते हैं, जिससे उनका प्रभाव तीव्र हो जाता है। शुभ ग्रह वक्री होने पर आत्म-मंथन व विलंब से परिणाम देते हैं, जबकि क्रूर ग्रह अप्रत्याशित घटनाएं घटित कर सकते हैं।
🔥 अस्त ग्रह का प्रभाव
सूर्य के निकट आकर अस्त होने पर ग्रह के बाह्य सांसारिक प्रभाव मंद हो जाते हैं। जैसे शुक्र के अस्त होने पर वैवाहिक मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं और गुरु के अस्त होने पर ज्ञान व धन के कार्य धीमे होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
वैदिक ज्योतिष में ग्रह स्थिति (गोचर) क्या होती है? ▼
आकाश मंडल में नवग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु व केतु) का वर्तमान समय में विभिन्न राशियों और नक्षत्रों में निरंतर संचरण करना ही 'ग्रह स्थिति' अथवा 'गोचर' कहलाता है। आपकी जन्म कुंडली पर वर्तमान गोचर का प्रभाव ही दैनिक जीवन की शुभ-अशुभ घटनाओं को निर्धारित करता है।
ग्रहों के वक्री (Retrograde ℞) होने का क्या अर्थ है? ▼
खगोलीय रूप से पृथ्वी और अन्य ग्रहों की सूर्य परिक्रमा गति में अंतर के कारण जब कोई ग्रह पीछे की ओर चलता हुआ प्रतीत होता है, तो उसे 'वक्री' (Retrograde ℞) कहते हैं। वैदिक ज्योतिष में वक्री ग्रह अत्यधिक बलवान (चेष्टा बली) हो जाता है और अप्रत्याशित व तीव्र परिणाम प्रदान करता है। सूर्य और चंद्र कभी वक्री नहीं होते, जबकि राहु-केतु सदैव वक्री रहते हैं।
ग्रह का 'अस्त' (Combust) होना क्या कहलाता है? ▼
जब कोई ग्रह परिक्रमा करते हुए सूर्य के अत्यंत निकट (एक निश्चित कोणीय दूरी के भीतर, जैसे गुरु 11°, शुक्र 10°, शनि 15°) आ जाता है, तो सूर्य के प्रचंड तेज से वह आकाश में अदृश्य हो जाता है। इसे ग्रह का 'अस्त' होना कहते हैं। अस्त अवस्था में ग्रह के बाह्य भौतिक कारकत्व मंद पड़ जाते हैं।
वैदिक ग्रह दृष्टि (Planetary Aspects) क्या होती है? ▼
वैदिक ज्योतिष में प्रत्येक ग्रह अपने स्थान से अन्य भावों और ग्रहों पर अपनी ऊर्जात्मक दृष्टि (Drishti) डालता है। सभी ग्रह अपने से 7वें भाव पर पूर्ण दृष्टि रखते हैं। इसके अतिरिक्त मंगल को 4थी व 8वीं, देवगुरु बृहस्पति को 5वीं व 9वीं, तथा शनिदेव को 3री व 10वीं विशेष दृष्टि का अधिकार प्राप्त है।