करवा चौथ व्रत (कर्क चतुर्थी)
करवा चौथ का पावन व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य, अच्छे स्वास्थ्य और दांपत्य जीवन में अटूट प्रेम व सौहार्द की कामना हेतु किया जाता है। हिंदू धर्म में इसे त्याग, निष्ठा और समर्पण का सर्वोच्च पर्व माना गया है। इस दिन महिलाएं सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक निर्जला (बिना अन्न-जल) व्रत रखती हैं और रात्रि में छलनी से चंद्रमा व पति का दर्शन कर जल ग्रहण करती हैं।
इस साल का शुभ मुहूर्त एवं समय (2026)
वैदिक सूर्य सिद्धांत व पंचांग गणना अनुसार प्रमाणित
शाम 05:44 से शाम 07:02 तक (अवधि: 1 घंटा 18 मिनट)
अति शुभ व श्रेष्ठ समयशाम 05:37 से रात 08:11 तक
गृहस्थ पूजन हेतु उत्तमरात्रि 08:15 बजे (स्थान अनुसार 8:05 से 8:30 के मध्य)
अपने शहर का चंद्रोदय समय देखें ›प्रातः 04:30 से 05:25 तक (सूर्योदय से पूर्व)
सूर्योदय से पूर्व सेवन करेंतिथि विवरण: 29 अक्टूबर 2026, प्रातः 08:14 बजे से • समाप्ति: 30 अक्टूबर 2026, प्रातः 06:45 बजे तक
शुभ चौघड़िया: शाम 05:44 - 07:18 | अमृत: शाम 07:18 - 08:52
कब-कब क्या करना है? संपूर्ण समय-सारणी व पूजा विधि
प्रातः काल स्नान से लेकर मुख्य पूजा, दीप प्रज्वलन व रात्रि अनुष्ठान तक की सटीक समय सारणी
सरगी का सेवन व स्नान
प्रातः 04:00 - 05:15 AMसूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। सास द्वारा दी गई सरगी (मिठाई, फल, मेवे, दूध/सेवई) का सेवन करें और पर्याप्त जल पीकर दिनभर के निर्जला व्रत की तैयारी करें।
संकल्प व पूजा स्थान सज्जा
प्रातः 05:30 - 06:00 AMहाथ में जल, अक्षत व पुष्प लेकर अखंड सौभाग्य के निर्जला व्रत का संकल्प लें: "मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादिसुस्थिरश्री प्राप्तये करकचतुर्थीव्रतमहं करिष्ये"। मंदिर में करवा चौथ माता की तस्वीर स्थापित करें।
सोलह श्रृंगार व मेंहदी
दोपहर 12:00 - 03:00 PMहाथों-पैरों में सुंदर मेंहदी रचाएं। लाल, सुनहरे या गुलाबी रंग की पारंपरिक साड़ी या लहंगा और सोलह श्रृंगार (सिंदूर, बिंदी, मंगलसूत्र, चूड़ियां, पायल आदि) धारण करें।
शुभ मुहूर्त में मुख्य करवा चौथ पूजन
शाम 05:44 - 07:02 PMचौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां पार्वती, शिवजी, गणेशजी व करवा माता का चित्र लगाएं। मिट्टी के करवे में जल भरें, ढक्कन में गेहूं व दक्षिणा रखें। धूप-दीप जलाकर करवा चौथ की पौराणिक कथा सुनें और थाली फेरी की रस्म करें।
सास को बाया भेंट करना
शाम 07:15 - 08:00 PMपूजा संपन्न होने के बाद पूजा में रखे वस्त्र, फल, मिठाई व करवा अपनी सास या घर की बुजुर्ग सुहागिन महिला को सादर भेंट कर उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।
चंद्रोदय दर्शन, अर्घ्य व पारण
रात 08:15 PM के बादचंद्रमा के उदय होते ही पूजा की थाली, जल भरा लोटा, धूप-दीप और छलनी लेकर छत/आंगन में जाएं। पहले छलनी से चंद्रमा को देखें, फिर दीपक की रोशनी में पति का चेहरा देखें। चंद्रमा को जल से अर्घ्य दें। पति के हाथों से पहला घूंट जल व मिठाई खाकर व्रत पूर्ण करें।
यह पर्व या व्रत क्यों मनाया जाता है?
करवा चौथ का पावन व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य, अच्छे स्वास्थ्य और दांपत्य जीवन में अटूट प्रेम व सौहार्द की कामना हेतु किया जाता है। हिंदू धर्म में इसे त्याग, निष्ठा और समर्पण का सर्वोच्च पर्व माना गया है। इस दिन महिलाएं सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक निर्जला (बिना अन्न-जल) व्रत रखती हैं और रात्रि में छलनी से चंद्रमा व पति का दर्शन कर जल ग्रहण करती हैं।
धार्मिक मान्यताएं एवं परंपराएं
पौराणिक मान्यता के अनुसार, करवा चौथ का व्रत सबसे पहले देवी पार्वती ने भगवान शिव को प्राप्त करने और उनकी अमरता के लिए किया था। महाभारत काल में द्रौपदी ने भी पांडवों के संकट निवारण और विजय के लिए भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर यह व्रत किया था। मिट्टी के नए करवे में जल भरकर पूजन किया जाता है, जो जल तत्व और जीवन की पूर्णता का प्रतीक है। छलनी से देखने का रहस्य यह है कि चंद्रमा के सौम्य प्रकाश और पति के रूप को छानकर केवल पवित्र प्रेम व सकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण किया जाए।
संपूर्ण पौराणिक व्रत कथा एवं प्रसंग
पुराणों व सनातन धर्मग्रंथों में वर्णित प्रामाणिक कथा
करवा चौथ की सबसे प्रचलित कथा रानी वीरवती की है। सात भाइयों की इकलौती लाडली बहन वीरवती का विवाह एक राजा से हुआ था। करवा चौथ के दिन उसने निर्जला व्रत रखा। भूख और प्यास से व्याकुल बहन की दशा भाइयों से देखी नहीं गई। उन्होंने एक ऊंचे वटवृक्ष की ओट में दीपक जलाकर छलनी रख दी और बहन से कहा कि देखो चंद्रमा निकल आया है। वीरवती ने भ्रमवश दीपक को अर्घ्य देकर जैसे ही पहला निवाला खाया, उसमें बाल निकला, दूसरे में छींक आई और तीसरे में पति के आकस्मिक निधन का दुखद समाचार मिला।
शोक में डूबी वीरवती ने पति के शव को सुरक्षित रखा और पूरे वर्ष नियमपूर्वक चतुर्थी का व्रत किया। अगले वर्ष करवा चौथ पर देवी इंद्राणी (शची) के कहे अनुसार उसने सच्चे हृदय से निर्जला व्रत रखकर विधिवत पूजा की। उसके तप और पश्चाताप से प्रसन्न होकर देवी पार्वती व भगवान शिव ने उसके मृत पति को जीवनदान दिया। इसके अलावा माता करवा की कथा भी प्रसिद्ध है, जिन्होंने अपने तपोबल से एक मगरमच्छ को कच्चे धागे से बांधकर यमराज को अपने पति के प्राण लौटाने पर विवश कर दिया था।
कहाँ-कहाँ देश व विदेश में कैसे मनाया जाता है?
भारत के विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय परंपराएं एवं विदेशों में भारतीय समुदाय का उत्सव
पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश व बिहार में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। पंजाब में सरगी (सास द्वारा दी जाने वाली मिठाई व फल) और बाया की परंपरा प्रमुख है। राजस्थान में महिलाएं पारंपरिक चुनरी और लहरिया पहनकर लोकगीत गाती हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), ब्रिटेन (UK), कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सिंगापुर और केन्या में भारतीय प्रवासी समुदाय सामूहिक करवा चौथ पूजा आयोजित करते हैं। मंदिरों व सामुदायिक केंद्रों में सैकड़ों महिलाएं एक साथ बैठकर थाली बंटाने (फेरी लगाने) की रस्म निभाती हैं।
पूजा सामग्री सूची (चेकलिस्ट)
पूजा की तैयारी करते समय वस्तुओं पर टिक करें
विशेष मंत्र, स्तोत्र व जप
पूजा व व्रत के नियम: क्या करें और क्या न करें
- ✓ लाल, गुलाबी, पीले या नारंगी रंग के शुभ वस्त्र पहनें
- ✓ पूरे दिन मन शांत रखें और ईश्वर का स्मरण करें
- ✓ बड़ों का आदरपूर्वक चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें
- ✗ काले, सफेद या नीले रंग के वस्त्र न पहनें
- ✗ धारदार वस्तु जैसे कैंची, सुई आदि का उपयोग न करें
- ✗ किसी के प्रति कटु वचन या विवाद से बचें
करवा चौथ व्रत (कर्क चतुर्थी) की आगामी तिथियां (2026 से 2030)
भक्तों व परिवारों की अग्रिम योजना हेतु 5-वर्षीय पंचांग सारणी
| वर्ष | दिनांक (Date) | वार (Day) | तिथि | पंचांग |
|---|---|---|---|---|
| 2026 | 29 October 2026 | गुरुवार | कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष चतुर्थी | पंचांग |
| 2027 | 18 October 2027 | सोमवार | कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष चतुर्थी | पंचांग |
| 2028 | 05 November 2028 | रविवार | कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष चतुर्थी | पंचांग |
| 2029 | 26 October 2029 | शुक्रवार | कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष चतुर्थी | पंचांग |
| 2030 | 15 October 2030 | मंगलवार | कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष चतुर्थी | पंचांग |
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