जय भगवद् गीते, मैया जय भगवद् गीते। हरि-हिय-कमल-विहारिणि, सुन्दर सुपुनीते॥ जय भगवद् गीते॥
जय भगवद् गीते, मैया जय भगवद् गीते। हरि-हिय-कमल-विहारिणि, सुन्दर सुपुनीते॥
कर्म-अकर्म-विकर्म-अकर्म, सब संशय हरणी। ज्ञान-भक्ति-वैराग्य, त्रिवेणी सुख करणी॥
राग-द्वेष-विनाशिनी, सब जंजाल हरंती। पार्थ-विषाद-निवारिणी, समता-रस भरंती॥
कृष्ण-मुखारविन्द-निःसृता, अमृत-मय-वाणी। वेद-उपनिषद-सार, महा-ज्ञान-कल्याणी॥
सकल-शास्त्र-शिरोमणि, भव-भय-निवारिणी। मुक्ति-मुक्ति-प्रदायिनी, जन-मन-उद्धारिणी॥
जो नर नियम से पढ़े, मन में अर्थ विचारे। कृष्ण-कृपा सो पावे, भवसागर निस्तारे॥
आरती भगवद्गीता की, जो जन प्रेम से गावे। परम शान्ति को पाकर, वैकुण्ठ पद पावे॥
जय भगवद् गीते, मैया जय भगवद् गीते। हरि-हिय-कमल-विहारिणि, सुन्दर सुपुनीते॥
जय भगवद् गीते, मैया जय भगवद् गीते। हरि-हिय-कमल-विहारिणि, सुन्दर सुपुनीते॥ जय भगवद् गीते॥