नीलवरण माँ कालिका, रहती सदा प्रचंड।
दस हाथों में शस्त्र धर, देती दुष्ट को दंड॥
मधु कैटभ संहार कर, करी धर्म की जीत।
मेरी भी पीड़ा हरो, हो जो कर्म पुनीत॥
नमस्कार चामुंडा माता। तीनों लोक में विख्याता॥
हिमालय में पवित्र धाम है। महाशक्ति तुमको प्रणाम है॥
मार्कंडेय ऋषि ने ध्याया। कैसे प्रगटीं भेद बताया॥
शुंभ निशुंभ दो दैत्य बलशाली। तीनों लोक जो कर दिए खाली॥
वायु अग्नि यम कुबेर संग। सूर्य चंद्र वरुण हुए तंग॥
अपमानित चरणों में आए। गिरिराज हिमालय को लाए॥
भद्र रौद्र नित ध्याया। चेतन शक्ति करके बुलाया॥
क्रोधित होकर काली आई। जिसने अपनी लीला दिखाई॥
चंड मुंड और शुंभ पताए। कामुक वैरी लड़ने आए॥
पहले सुग्रीव दूत को मारा। भगा चंड भी मारा मारा॥
अरबों सैनिक लेकर आया। दसों दिशाओं क्रोध दिखाया॥
जैसे ही दुष्ट ललकारा। हुंकार शब्द गुंजा के मारा॥
सेना में मचाई भगदड़। फाड़ा सिंह ने आया जो बढ़॥
हत्या करने चंड-मुंड आए। मदिरा पीकर के घुर्राए॥
चतुरंगिणी सेना संग लाए। ऊंचे ऊंचे शिविर गिराए॥
तुमने क्रोधित रूप निकाला। प्रगटीं डाल गले मुंड माला॥
चर्म की साड़ी चीते वाली। अस्थि ढांचा था बलशाली॥
विकराल मुखी आंखें दिखलाई। रणभूमि में धूम मचाई॥
खट्वांग मुक्कों से मारा। ब्रह्मास्त्र ने फेंकी जलधारा॥
माहेश्वरी ने त्रिशूल चलाया। माँ वैष्णवी चक्र घुमाया॥
कार्तिकेय की शक्ति आई। नारसिंही दैत्यों पे छाई॥
चुन-चुन सिंह सभी को खाया। हर दानव घायल घबराया॥
रक्तबीज ने माया फैलाई। शक्ति उसने नई दिखाई॥
रक्त गिरा जब धरती ऊपर। नया दैत्य प्रगटा था वहीं पर॥
चंडी माँ ने शूल घुमाया। मारा उसको लहू चुसाया॥
शुंभ निशुंभ अब दौड़े आए। सहस्र सेना भरकर लाए॥
वज्रपात संग शूल चलाया। सभी देवता देख घबराए॥
ललकारा फिर घूंसा मारा। ले त्रिशूल किया निस्तारा॥
शुंभ निशुंभ धरती पर सोए। दैत्य सभी देखकर रोए॥
चामुंडा माँ धर्म बचाया। अपना शुभ मंदिर बनवाया॥
सभी देवता आके मनाते। हनुमत भैरव चंवर डुलाते॥
आश्विन चैत्र नवरात्र आओ। ध्वजा नारियल भेंट चढ़ाओ॥
बाणगंगा पावन स्नान कराओ। चामुंडा माँ तुमको ध्याओ॥
जो नर भक्ति भाव से गावे। संकट से छुटकारा पावे॥
भूत पिशाच निकट नहिं आवे। चामुंडा जब नाम सुनावे॥
रोग शोक सब दूर नशावै। सुख संपत्ति घर माही आवै॥
पुत्र पौत्र सुख सम्पति पावै। अंत काल सुरपुर को जावै॥
जो यह पढ़े चामुंडा चालीसा। होय सिद्ध साक्षी गौरीशा॥
अखंड ज्योति जो घर में बारे। ताके सब संताप निवारे॥
जय चामुंडा जय जगदम्बा। रक्षा करहु मात अविलम्बा॥
शरणागत को शक्ति दो, हे जग की आधार।
भक्ति की नैया डोलती, कर दो भव से पार॥