ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड। शान्ति क्रान्ति मन्दाकिनी, गायत्री सुख कन्द॥
जगत जननि मंगल करनि, गायत्री सुखधाम। प्रणवों सावित्री सुता, कोटि-कोटि प्रणाम॥
जय गायत्री जय सुखदाता। जग जननी जग की सुख माता॥
आदिशक्ति तुम हो महारानी। वेद माता जग में पहिचानी॥
ब्रह्म तेज तव मुख पर छाजै। हंस वाहिनी छवि अति राजै॥
श्वेत वसन तन पर छवि पावै। सुर मुनि सब मिलि शीश नवावै॥
कर में वेद कमंडल सोहै। देखि देव जन मन अति मोहै॥
चार वेद तुम से उपजाए। ब्रह्मा जी ने मुख से गाए॥
ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेदा। अथर्ववेद प्रभु कियो निवेदा॥
सकल ज्ञान विज्ञान विधाता। तुम ही हो सब जग की माता॥
गायत्री जो जन नित ध्यावै। सो मनवांछित फल बहु पावै॥
सूर्य तेज तव अंग बिराजै। तम अज्ञान सकल नशि भाजै॥
महामंत्र जो जप करि लीन्हा। ताको भव सागर पार कीन्हा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः ध्वनि प्यारी। गुंजत सकल सृष्टि उजियारी॥
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो। देवस्य धीमहि धियो यो नः॥
प्रचोदयात् पावन वरदानी। वेद ऋचा तव महिमा बखानी॥
जो यह मंत्र जपै त्रिकाल। ताके कष्ट हरैं तत्काल॥
बुद्धि विवेक ज्ञान रस दीजै। अज्ञान अंधकार हरीजै॥
विद्यावान गुणी नर होई। गायत्री जप करै जो कोई॥
कुबुद्धि निवार सुमति उपजावहु। सन्मार्ग पर पग बढ़वावहु॥
काम क्रोध मद लोभ नशावहु। सात्विक भाव हृदय चमकावहु॥
रोग शोक सब संकट टारो। विपुल शांति जीवन में डालो॥
संतान हीन को गोदी भरई। गायत्री कृपा ते सब दुख टरई॥
विद्यार्थी जो पाठ सुनावै। विद्या बुद्धि परम यश पावै॥
प्रातः काल उठि जो नर गावै। सो जीवन में सब सुख पावै॥
संध्या काल जपै जो कोई। तापर कृपा मातु की होई॥
अन्न धन्य सो सदन भराई। गायत्री मातु की जय जय गाई॥
यज्ञोपवीत संस्कार जो पावै। गायत्री मंत्र हृदय बसावै॥
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य सुजाना। सबहिं गायत्री प्राण समाना॥
देव दनुज सब शीश नवावैं। नारद शारद गुण तव गावैं॥
ब्रह्मा विष्णु महेश मनावैं। जगदम्बा तव शरण म आवैं॥
सकल मनोरथ सिद्ध करावहु। प्रेम भक्ति रस अन्तर बहावहु॥
दीन दयाल कृपा अब कीजै। जनम जनम के पाप हरीजै॥
शरणागत की रक्षा कीजै। सुख शांति आनंद रस दीजै॥
गायत्री चालीसा जो गावै। सो भव सागर पार लगावै॥
संतत संपति सुयश बढावै। ज्ञान गंगा हिय में बहलावै॥
नमो नमो हे वेद भवानी। जय जय जय गायत्री वरदानी॥
माता कृपा दृष्टि नित राखो। अमृत वचन सदा मुख भाखो॥
अद्भुत महिमा मात तुम्हारी। वंदन करत सकल संसारी॥
निश्चय मन जो ध्यान लगावै। गायत्री ताहि सदा सुख पावै॥
सदा रहो मम कंठ निवासा। पुरवहु मात हमारी आसा॥
गायत्री चालीसा पाठ समाप्ता। जय जय जय माता सुखदाता॥
यह चालीसा प्रेम युत, पाठ करै जो कोय। वेद ज्ञान सद्बुद्धि बल, सुख संपत्ति सब होय॥