श्री राधापद कमल रज, सिर धरि यमुना कूल।
वरणो चालीसा सरस, सकल सुमंगल मूल॥
जय जय पूरण ब्रह्म बिहारी। दुष्ट दलन लीला विस्तारी॥
मातु यशोदा के मन भाये। नन्द भवन महं प्रगटाये॥
गोकुल के कुल भूषण गोपाला। मोर मुकुट कटि पीत दुशाला॥
कर महं मुरली अधर सुहाई। नूपुर पैजनिया छनकाई॥
माखन चोरी करि सुख दीन्हा। बाल चरित आनंद अति कीन्हा॥
ऊखल बंधन सों बंधि जाना। यमलार्जुन उद्धार बखाना॥
पूतना बकासुर तृणावत मारे। गोपी ग्वालन संकट टारे॥
कालिय नाग नथ्यो दह माहीं। ब्रजवासी सब सुख पाहीं॥
गोवर्धन नख पर धर लीन्हा। इन्द्र गर्व चकनाचूर कीन्हा॥
चीर हरण लीला विस्तारी। कामदेव के मद संहारी॥
शरद पूर्णिमा रास रचाई। गोपी जन मन मोद बढ़ाई॥
मथुरा जाइ कंस पछारेहु। उग्रसेन कहं राज सम्भारेहु॥
माता पिता छुड़ाये कारा। जनम जनम के दुख संहारा॥
सुदामा सों अति नेह निभाया। तीन लोक की सम्पति पाया॥
द्रौपदी चीर बढ़ायो स्वामी। रक्षा कीन्हि प्रभु अंतर्यामी॥
अर्जुन रथ हांक्यो कुरुक्षेत्रा। गीता ज्ञान दियो जग मित्रा॥
विराट रूप दिखायो भारी। अर्जुन संशय दियो निवारी॥
अधर्म नाशि धर्म ठहरायो। पांडव दल महं विजय करायो॥
द्वारिका नगरी दिव्य बसाई। रुक्मिणी सत्यभामा संग ब्याही॥
शिशुपाल के सौ अपराध क्षमाये। चक्र सुदर्शन सों शीश कटाये॥
गज और ग्राह लड़त जल माहीं। टेर सुनत भागे पग नाहीं॥
गज को ग्राह ग्रसित सों तारेहु। चक्र छोड़ि पापी पछारेहु॥
जो जन गोपाल नाम उचारे। ताके सब भव बंधन टारे॥
पुत्रहीन जो नित प्रति गावै। अति सुंदर सुत संपति पावै॥
घर आंगन में सुख बरसावे। गोपाल कृपा सब क्लेश नशावे॥
माखन मिश्री भोग लगावे। बाल गोपाल सदा मुसकावे॥
सेवा भाव हिये महं राखे। अमृत रस वाणी सों चाखे॥
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता। भक्त वत्सल त्रिभुवन विख्याता॥
दीन अनाथ जानि मोही तारो। भव सागर सों पार उतारो॥
काम क्रोध मद लोभ मिटावो। निर्मल भक्ति का मार्ग दिखावो॥
नित उठि जो चालीस दिन ध्यावै। मनवांछित फल सो नर पावै॥
सांझ सवेरे दीपक बारे। जय गोपाल कहि शीश उतारे॥
रोग दोष दरिद्रता भागे। मन मंदिर में ज्ञान जागे॥
सदा सहाई रहहु कन्हाई। तुम बिन और न कोई सहाई॥
जय कन्हैया लाल की जय। हाथी घोड़ा पालकी जय॥
गोपीनाथ मदन मोहन देवा। करहुं तुम्हारी नित प्रति सेवा॥
चरण कमल महं शीश नवाऊँ। बारम्बार तुम्हरा जस गाऊँ॥
जो यह पाठ करे चित लाई। ताहि मिले कृपा यदुराई॥
दुःख दारिद सब दूर पराये। घर महं मंगल मोद सुहाये॥
गोपाल चालीसा जो गावे। अंत समय वैकुंठ सिधावे॥
गोपाल चालीसा सरस, पढ़े सुने जो कोय।
संतान संपति सुख लहे, जीवन मंगल होय॥