श्री गणेश गुरुवर वंदना, जो सत चित्त सुखदाय।
विघ्न हरन मंगल करन, शुभ वरदायक माय॥
करहुं कृपा दीनदयालु, जय गुरुदेव सहाय।
नमो नमो जय गुरुवर, कृपा करहुं हरहुं भय॥
जयति जयति जय गुरु गोपाला। दया सिंधु प्रभु दीनदयाला॥
गुरु पद पंकज शीश नवाऊं। भक्ति भाव सों चरण धियाऊं॥
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु महेशा। गुरु साक्षात परब्रह्म गणेशा॥
अज्ञान तिमिर हर ज्ञान विधाता। मुक्ति भुक्ति सब वैभव दाता॥
गुरु की महिमा वेद बखानी। अगम अगोचर अमृत बानी॥
राम लखन गुरु वशिष्ठ मनाये। विश्वामित्र सों ज्ञान सिखाये॥
कृष्ण दियो सान्दीपनि सेवा। गुरु सेवा सम और न देवा॥
गुरु बिनु भव निधि तरै न कोई। जो विरंचि शंकर सम होई॥
गुरु के चरण कमल अनुरागी। सो नर त्रिभुवन में बड़भागी॥
काम क्रोध मद लोभ नशावे। गुरु कृपा सों हरि पद पावे॥
गुरु वचनों पर जो दृढ़ रहहीं। ते भव सागर सहजहिं तरहीं॥
गुरु आज्ञा अमृत सम जानी। पावे पद अविचल कल्यानी॥
जब जब विपदा भक्तन आई। गुरुदेव ही कीन्ह सहाई॥
भटके मन को राह दिखावे। सत्य धर्म का दीप जलावे॥
गुरु शरणे जो शीश झुकावे। जनम जनम के पाप नशावे॥
विद्या बुद्धि विवेक शुभ दाता। गुरुदेव सम और न त्राता॥
गुरु बिनु अंधकार जग माहीं। गुरु बिनु कोई सहाई नाहीं॥
गुरु नाम जो जपै निरंतर। पावे परम शांति उर अन्तर॥
चरणामृत जो गुरु का पीवे। रोग शोक से मुक्त सो जीवे॥
गुरु सेवा जीवन का सारा। गुरु कृपा सों हो निस्तारा॥
हे गुरुदेव दया अब कीजै। निज चरणन की भक्ति दीजै॥
हम मूरख खल कामी क्रोधी। तुम करुणामय परम सुबोधी॥
अवगुण मेरे चित न धरहु प्रभु। पार लगाओ भव सागर विभु॥
गुरु पूर्णिमा जो व्रत साजे। गुरु चरणन में प्रीति विराजे॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावै। श्रद्धा सों जो शीश नवावै॥
सद्गुरु कृपा अलौकिक पाई। जीवन धन्य भयो सुखदाई॥
पाप ताप संताप विनाशन। गुरुदेव प्रभु हृदय विलासन॥
आधि व्याधि सब संकट टारे। गुरुदेव ही काज संवारे॥
जो जन गुरु चालीसा गावे। ज्ञान भक्ति वैराग्य सुपावे॥
घर आंगन में शांति समावे। कुल परिवार सब सुख पावे॥
नित उठि चालीस दिन जो ध्यावै। मनवांछित फल सो नर पावै॥
गुरु की कृपा सदा उर धारे। गुरु बिन कोई पार न उतारे॥
गुरु का ध्यान परम कल्याण। गुरु चरणों में चारों धाम॥
जय गुरुदेव नमो नमः स्वामी। तुम घट-घट के अंतर्यामी॥
दया दृष्टि निज जन पर फेरो। हरो अविद्या संशय मेरो॥
सदा सहाय रहहु गुरु दाता। भव भय भंजन त्रिभुवन त्राता॥
गुरु चालीसा प्रेम सों गावे। अंत समय प्रभु दर्शन पावे॥
कोटि कल्प के बंधन छूटे। गुरु कृपा सों माया टूटे॥
सच्चिदानंद रूप गुरु राया। जय जय जय सद्गुरु की माया॥
गुरु चालीसा पूर्ण भयो, सकल क्लेश मिट जाय॥
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥
तेहिं करि विमल विवेक विलोचन। बरनऊं राम चरित भव मोचन॥