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BHAKTI KI SHAKTI
🔱 भगवान शिव (पारब्रह्म)

शिव महिम्न स्तोत्र

गंधर्वराज पुष्पदंत द्वारा रचित शिव महिम्न स्तोत्र संस्कृत साहित्य का मुकुटमणि है। यह भगवान शिव के अनंत ऐश्वर्य, निर्विकल्प स्वरूप और तीनों लोकों में उनकी असीम महिमा का गुणगान करता है।

रचयिता गंधर्वराज पुष्पदंत
स्रोत / ग्रन्थ शिव पुराण / पुष्पदंत स्तुति
शुभ दिन / तिथि सोमवार, महाशिवरात्रि
जप माला रुद्राक्ष माला - 1 पाठ
श्लोक संख्या 1 ॥ श्री ॥
पुष्पदंत उवाच – महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी । स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 1): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 1 ॥ श्री ॥
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिमाणावधि गृणन् । ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥ 1 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 1): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 2 ॥ श्री ॥
श्री शिव महिम्न स्तोत्र/Shri Shiv Mahimna Stotra अर्थ: श्री पुष्पदंत जी ने कहा है! बड़े बड़े विद्वान और योगीजन आपके महिमा को नहीं जान पाए तो मैं तो एक साधारण बालक हूं, मेरी क्या गिनती ? लेकिन क्या आपके महिमा को पूर्णतया जाने बिना आपकी स्तुति नहीं हो सकती? मैं ये नहीं मानता क्योंकि अगर ये सच है तो फिर ब्रह्मा की स्तुति भी व्यर्थ कहलाएगी। मैं तो ये मानता हूँ कि सबको अपनी मति अनुसार स्तुति करने का अधिकार है। इसलिए हे भोलेनाथ ! आप कृपया मेरे हृदय के भाव को देखें और मेरी स्तुति को स्वीकार करें अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो: । रतदव्यावृत्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 2): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 2 ॥ श्री ॥
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधिगुणः कस्य विषयः । पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥ 2 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 2): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 3 ॥ श्री ॥
श्री शिव महिम्न स्तोत्र/Shri Shiv Mahimna Stotra अर्थ: हे शिव !!! आपकी व्याख्या न तो मन और न ही वचन द्वारा संभव है। आपके संदर्भ में वेद भी अचंभित हैं तथा ‘नेति नेति’ का प्रयोग करते हैं अर्थात ये भी नहीं और वो भी नहीं। आपकी महिमा और आपके स्वरूप को पूर्णतया जान पाना असंभव है, लेकिन जब आप साकार रूप में प्रकट होते हो तो आपके भक्त आपके स्वरूप का वर्णन करते नहीं थकते। ये आपके प्रति उनके प्यार और पूज्य भाव का परिणाम है। मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत: । स्तवब्रह्मन्किवागपि सुरगुरोविस्मय पदम् ।।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 3): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 3 ॥ श्री ॥
मम त्वेतां वाणों गुणकथनपुण्येन भवतः । पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥ 3 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 3): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 4 ॥ श्री ॥
श्री शिव महिम्न स्तोत्र/Shri Shiv Mahimna Stotra अर्थ: हे वेद और भाषा के सृजन ! आपने अमृतमय वेदों की रचना की है। इसलिए जब देवों के गुरु, बृहस्पति आपकी स्तुति करते हैं तो आपको कोई आश्चर्य नहीं होता। मैं भी अपनी मति अर्थात ज्ञान के अनुसार आपका गुणानुवाद करने का प्रयास कर रहा हूं। मैं मानता हूं कि इससे आपको कोई आश्चर्य नहीं होगा, मगर मेरी वाणी इससे अधिक पवित्र और लाभान्वित अवश्य होगी। तवैश्वर्यं तत्तज्जगदुदयरक्षा प्रलयकृत् । त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासुतनुषु ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 4): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 4 ॥ श्री ॥
अभव्यानामस्मिन्वरद रमणीयामरमणीम् । विहन्तु व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥ 4 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 4): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
समाप्ति ॥ श्री ॥
अर्थ: हे देव ! आप इस सृष्टि के सृजनहार है, पालनहार है और विसर्जनकार अर्थात संहार करने वाले हैं। इस प्रकार आपके ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीन स्वरूप हैं। तथा आप में सत्व, रज और तम तीन गुण भी हैं । वेदों में इनके बारे में वर्णन किया गया है फिर भी अज्ञानी लोग आपके बारे में ऊटपटांग बातें करते रहते हैं। ऐसा करने से भले ही उन्हें संतुष्टि मिलती हो, किन्तु यथार्थ से वो मुंह नहीं मोड़ सकते। किमीहः किङ्कायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनम् । किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक समाप्ति): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 5 ॥ श्री ॥
अतक्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः । कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ॥ 5 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 5): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 6 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे महादेव ! मूर्ख लोग अक्सर तर्क करते रहते है कि ये सृष्टि की रचना कैसे हुई, किसकी इच्छा से हुई, किन वस्तुओं से उसे बनाया गया इत्यादि। उनका उद्देश्य लोगों में भ्रांति पैदा करने के अलावा कुछ नहीं है। सच पूछो तो ये सभी प्रश्नों के उत्तर आपकी दिव्य शक्ति से जुड़े हैं और मेरी सीमित शक्ति से उसे व्यक्त करना असंभव है। अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां । मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 6): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 6 ॥ श्री ॥
अनीशो वा कुर्याद्भुवनजनने कः परिकरो । यतोमन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥ 6 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 6): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 7 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे परमपिता! यह सात लोक आपके द्वारा ही बनाया गया है, इसके कर्ता आपके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं हो सकता, क्योंकि इस विचित्र संसार की विचित्र रचना की सामग्री दूसरे के पास होना असंभव है। इसलिए अज्ञानी लोग ही आपके विषय में संदेह करते हैं॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 7): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 8 ॥ श्री ॥
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति । प्रभिन्न प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 8): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 7 ॥ श्री ॥
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां । नृमाणेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ 7 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 7): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 8 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे शिव ! आपको पाने के लिए अनगिनत मार्ग है – सांख्य मार्ग, वैष्णव मार्ग, शैव मार्ग, वेद मार्ग आदि। लोग अपनी रुचि के अनुसार कोई एक मार्ग को पसंद करते है। मगर आखिरकार ये सभी मार्ग, जैसे अलग अलग नदियों का पानी बहकर समुद्र में जाकर मिलता है, वैसे ही, यह सभी मार्ग आप तक पहुंचाते हैं। सचमुच, किसी भी मार्ग का अनुसरण करने से आपकी प्राप्ति हो सकती है। महोक्षः खट्वांग म्परशुरजिनं भस्म फणिनः । कपालंचेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 8): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 8 ॥ श्री ॥
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भ्द्ध प्रणिहिताम् । न हि स्वात्मारामं विषय मृगतृष्णा भ्रमयति ।। 8 ।।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 8): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 9 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे शिव ! आपके भृकुटी के इशारे मात्र से सभी देवगण ऐश्वर्य एवं संपदाओं का भोग करते हैं। पर आपके स्वयं के लिए सिर्फ कुल्हाड़ी, बैल, व्याघ्रचर्म, शरीर पर भस्म तथा हाथ में खप्पर (खोपड़ी)! इससे ये फलित होता है कि जो आत्मानंद में लीन रहता है वो संसार के भोग पदार्थों में नहीं फंसता। ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध वमिदम् । परोधौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 9): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 9 ॥ श्री ॥
समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैविस्मित इव । स्तुवज्ञ्जिद्देमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ।। 9 ।।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 9): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 10 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे त्रिपुरहंता ! इस संसार के बारे में विभिन्न विचारकों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कोई इसे नित्य जानता है तो कोई इसे अनित्य समझता है। लोग जो भी कहें, आपके भक्त तो आपको हमेशा सत्य मानते है और आपकी भक्ति में आनंद पाते है। मैं भी उनका समर्थन करता हूँ, चाहे किसी को मेरा ये कहना धृष्टता लगे, मुझे उसकी परवाह नहीं। तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरिविरंचिर्हरिरधः । परिच्छेत्तु यातावनलमनलस्कन्धवपुषः ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 10): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 10 ॥ श्री ॥
ततोभक्ति श्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत् । स्तयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ।। 10 ।।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 10): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 11 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे प्रभु ! जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद हुआ की दोनों में से कौन महान है, तब आपने उनकी परीक्षा करने के लिए अग्नि स्तंभ का रूप लिया। ब्रह्मा और विष्णु – दोनों ने स्तंभ को अलग अलग छोर से नापने की कोशिश की मगर वो सफल न हो सके। आखिरकार अपनी हार मानकर उन्होंने आपकी स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर आपने अपना मूल रूप प्रकट किया। सचमुच, अगर कोई सच्चे दिल से आपकी स्तुति करे और आप प्रकट न हों क्या ऐसा कभी हो सकता है भला। अयत्नादापाद्यत्रिभुवनमवैरव्यतिकरम् । दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान् ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 11): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 11 ॥ श्री ॥
शिरः पद्मश्रेणोरचितचरणाम्भोरु हबलेः । स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर वियस्फूर्जितमिदम् ॥ 11 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 11): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 12 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे त्रिपुरान्तक ! आपके परम भक्त रावण ने पद्म की जगह अपने नौ-नौ मस्तक आपकी पूजा में समर्पित कर दिये। जब वो अपना दसवां मस्तक काटकर अर्पण करने जा रहा था, तब आपने प्रकट होकर उसको वरदान दिया। इस वरदान की वजह से ही उसकी भुजाओं में अटूट बल प्रकट हुआ और वो तीनो लोक में शत्रुओं पर विजय पाने में समर्थ रहा। ये सब आपकी दृढ़ भक्ति का नतीजा है। अमुष्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनम् । बलाकैलासेऽपि त्वदधिवसतौविक्रमयतः ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 12): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 12 ॥ श्री ॥
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलितांगु ष्ठशिरसि । प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः ।। 12 ।।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 12): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 13 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे शिव ! आपकी परम भक्ति से रावण अतुलित बल का स्वामी बन बैठा मगर इससे उसने क्या करना चाहा ? आपकी पूजा के लिए हर रोज कैलाश जाने का श्रम बचाने के लिए कैलाश को उठाकर लंका में गाड़ देना चाहा। जब कैलाश उठाने के लिए रावण ने अपनी भुजाओं को फैलाया तब पार्वती भयभीत हो उठीं। उन्हें भयमुक्त करने के लिए आपने सिर्फ अपने पैर का अंगूठा लगाया तो रावण जाकर पाताल में गिरा और वहां भी उसे स्थान नहीं मिला। सचमुच, जब कोई आदमी अनधिकृत बल या संपत्ति का स्वामी बन जाता है तो उसका उपयोग करने में विवेक खो देता है। यदृद्धि सुत्राम्णो वरद! परमोच्चैरपि सती । मधश्चक्र बाणः परिजनविधैयस्त्रिभुवनः ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 13): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 13 ॥ श्री ॥
नतच्चित्रं तस्मिन्वरिवसिरित्वच्चरणयोः । न कस्याप्युन्नत्यं भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥ 13 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 13): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 14 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे शम्भो ! आपकी कृपा मात्र से ही बाणासुर दानव इन्द्रादि देवों से भी अधिक ऐश्वर्यशाली बन गया तथा तीनों लोकों पर राज किया। हे ईश्वर ! जो मनुष्य आपके चरण में श्रद्धा भक्तिपूर्वक शीश रखता है उसकी उन्नति और समृद्धि निश्चित है। अकाण्ड: ब्रह्माण्ड क्षयचकितदेवासुरकृपा । विधेयस्याऽसीद्यस्त्रिनयन विषं संह तवतः ।।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 14): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 14 ॥ श्री ॥
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो । विकारोऽपिश्लाघ्यो भुवनभयभगंव्यसनिनः ॥ 14 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 14): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 15 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे प्रभु ! जब समुद्र मंथन हुआ तब अन्य मूल्यवान रत्नों के साथ महाभयानक विष निकला, जिससे समग्र सृष्टि का विनाश हो सकता था। आपने बड़ी कृपा करके उस विष का पान किया। विषपान करने से आपके कंठ में नीला चिन्ह हो गया और आप नीलकंठ कहलाये। परंतु हे प्रभु, क्या ये आपको कुरूप बनाता है? कदापि नहीं, ये तो आपकी शोभा को और बढ़ाता है। जो व्यक्ति औरों के दुःख दूर करता है उसमें अगर कोई विकार भी हो तो वो पूजा पात्र बन जाता है। असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे । निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 15): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 15 ॥ श्री ॥
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत् । स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः ।। 15 ।।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 15): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 16 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे प्रभु ! कामदेव के वार से कभी कोई भी नहीं बच सका चाहे वो मनुष्य हों, देव या दानव हो। पर जब कामदेव ने आपकी शक्ति समझे बिना आप की ओर अपने पुष्प बाण को साधा तो आपने उसे तत्क्षण ही भस्म कर दिया। यह जगत प्रसिद्ध है कि श्रेष्ठ जनों के अपमान का परिणाम हितकर नहीं होता। मही पादाघाताद्व्रजति सहसा संशयपदम् । पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम् ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 16): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 16 ॥ श्री ॥
मुहुर्योदौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा । जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥ 16 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 16): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 17 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे नटराज !!! जब संसार के कल्याण हेतु आप तांडव करने लगते हैं तब समग्र सृष्टि भय के मारे कांप उठती है, आपके पद प्रहार से पृथ्वी अपना अंत समीप देखती है ग्रह नक्षत्र भयभीत हो उठते हैं। आपकी जटा के स्पर्श मात्र से स्वर्ग लोग व्याकुल हो उठता है और आपकी भुजाओं के बल से वैकुंठ में खलबली मच जाती है। हे महादेव ! आश्चर्य ही है कि आपका बल अतिशय कष्टप्रद है। वियद्व्यापीतारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः । प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 17): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 17 ॥ श्री ॥
जगद्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति । त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिमदिव्यं तव वपुः ।। 17 ।।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 17): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
समाप्ति ॥ श्री ॥
अर्थ: हे शिव! गंगा नदी जब मंदाकिनी के नाम से स्वर्ग से उतरती है तब नभोमंडल में चमकते हुए सितारों की वजह से उसका प्रवाह अत्यंत आकर्षक दिखाई देता है, मगर आपके सिर पर सिमट जाने के बाद तो वह एक बिंदु समान दिखाई पड़ता है। बाद में जब गंगा जी आपकी जटा से निकलती है और भूमि पर बहने लगती है तब बड़े-बड़े द्वीपों का निर्माण करती है। ये आपके दिव्य और महिमावान स्वरूप का ही परिचायक है। रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिनगेन्द्रो धनुरथा । रथांगेचन्द्राकौं रथचरणपाणिः शर इति ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक समाप्ति): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 18 ॥ श्री ॥
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर विधिः । विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ।। 18 ।।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 18): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 19 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे शिव! आपने (तारकासुर के पुत्रों द्वारा रचित) तीन नगरों का विध्वंस करने हेतु पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी, सूर्य चन्द्र को दो पहिये मेरु पर्वत का धनुष बनाया और विष्णु जी का बाण लिया। हे शम्भू ! इस वृहद प्रयोजन की क्या आवश्यकता थी? आपके लिए तो संसार मात्र का विलय करना अत्यंत ही छोटी बात है। आपको किसी सहायता की क्या आवश्यकता? आपने तो केवल (अपने नियंत्रण में रही) शक्तियों के साथ खेल किया था, लीला की थी। हरिस्ते साहस्त्र कमलबलिमाधाय पदयो । र्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहर कमलम् । गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा ।।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 19): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 19 ॥ श्री ॥
त्रयाणां रक्षायं त्रिपुरहर जागति जगताम् ॥ 19 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 19): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 20 ॥ श्री ॥
अर्थ: हे शिव! जब भगवान विष्णु ने आपकी सहस्र कमलों (एवं सहस्त्र नामों) द्वारा पूजा प्रारम्भ की तो उन्होंने एक कमल कम पाया। तब भक्ति भाव से विष्णु जी ने अपनी एक आँख को कमल के स्थान पर अर्पित कर दिया। उनकी ऐसी अदम्य भक्ति ने सुदर्शन चक्र का स्वरूप धारण कर लिया जिसे भगवान विष्णु संसार रक्षार्थ उपयोग करते हैं। हे प्रभु, आप तीनो लोक (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) की रक्षा के लिए सदैव जागृत रहते हो। क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमताम् । क्व कर्म प्रध्वस्तं फलतिपुरुषाराधनमृते ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 20): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 20 ॥ श्री ॥
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवम् । श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥ 20 ॥
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक 20): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
समाप्ति ॥ श्री ॥
अर्थ: हे शिव! यज्ञ की समाप्ति होने पर आप यज्ञकर्ता को उसका फल देते हो। आपकी उपासना और श्रद्धा बिना किया गया कोई कर्म फलदायी नहीं होता। यही वजह है कि वेदों में श्रद्धा रखके और आपको फल दाता मानकर हर कोई अपने कार्यों का शुभारंभ करते है।
हिंदी भावार्थ: शिव महिम्न स्तोत्र (श्लोक समाप्ति): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
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संबंधित चालीसा, आरती, पूजन एवं पंचांग

इस स्तोत्र साधना के साथ संबंधित चालीसा, आरती, पूजन विधि व आज का शुभ मुहूर्त पंचांग भी अवश्य देखें:

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पाठ की दिव्य फलश्रुति व लाभ

  • ✓ अहंकार और मानसिक द्वंद्वों का समूल नाश
  • ✓ मोक्ष, दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और अपार कीर्ति
  • ✓ समस्त प्रकार के राजभय और अनिष्ट ग्रहों की शांति
  • ✓ ईश्वर में अटल निष्काम प्रेम व शिवलोक की प्राप्ति
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स्तोत्र पाठ विधि एवं नियम

1
शुद्धि व स्नान
प्रातः काल स्नानोपरांत स्वच्छ श्वेत अथवा हल्के रंग के वस्त्र धारण करें।
2
आसन व दिशा
कुश या ऊनी आसन पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
3
दीप प्रज्वलन व आचमन
घी का दीपक जलाएं, शिवलिंग या शिव परिवार के चित्र पर जल, चंदन, अक्षत, बेलपत्र अर्पित करें।
4
संकल्प व ध्यान
हाथ में जल और अक्षत लेकर अपने अभीष्ट मनोरथ का संकल्प करें तथा देवाधिदेव महादेव का ध्यान करें।
5
स्तोत्र पाठ
स्पष्ट उच्चारण और शांत चित्त से स्तोत्र का पाठ करें।
6
क्षमा प्रार्थना व आरती
पाठ उपरांत अज्ञानतावश हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगें तथा कर्पूर आरती करें।
❓

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▼

प्रातः काल या संध्या काल में शुद्ध होकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके रुद्राक्ष माला - 1 पाठ पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है।

इस स्तोत्र पाठ के मुख्य लाभ क्या हैं? ▼

यह पाठ नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर आत्मबल, शांति, सुरक्षा और अभीष्ट फल प्रदान करता है।