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BHAKTI KI SHAKTI
🔱 भगवान श्री महाविष्णु

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम

कुरुक्षेत्र के धर्मक्षेत्र में शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को उपदेशित यह स्तोत्र भगवान विष्णु के 1000 पावन नामों का अद्भुत महामंत्र है, जो समस्त पापों और कष्टों को हर लेता है।

रचयिता महर्षि वेदव्यास / भीष्म पितामह
स्रोत / ग्रन्थ महाभारत (अनुशासन पर्व)
शुभ दिन / तिथि गुरुवार, एकादशी तिथि, पूर्णिमा
जप माला तुलसी माला - 1 पाठ
प्रार्थना ॥ श्री ॥
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ १ ॥
हिंदी भावार्थ: श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चंद्रमा के समान कान्तिमान, चार भुजाओं वाले, प्रसन्न मुख श्रीविष्णु का समस्त विघ्नों की शांति के लिए ध्यान करें।
विनियोगः ॥ श्री ॥
ॐ अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य । श्री वेदव्यासो भगवान् ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्रीविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता ॥
हिंदी भावार्थ: इस श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र महामन्त्र के ऋषि भगवान वेदव्यास हैं, अनुष्टुप छन्द है, और देवता श्रीमन नारायण परमात्मा हैं।
ध्यानम् ॥ श्री ॥
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
हिंदी भावार्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के ईश, विश्व के आधार, गगन सदृश, मेघवर्ण और सुंदर अंगों वाले हैं, उन भगवान विष्णु की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक संख्या 1 ॥ श्री ॥
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः । भूतकृद् भूतभृद् भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १ ॥
हिंदी भावार्थ: १. विश्वम् (विश्वस्वरूप), २. विष्णुः (सर्वव्यापी), ३. वषट्कारः (यज्ञस्वरूप), ४. भूतभव्यभवत्प्रभुः (तीनों कालों के स्वामी), ५. भूतकृत् (सृष्टिकर्ता), ६. भूतभृत् (पोषणकर्ता), ७. भावः (शुद्ध अस्तित्व), ८. भूतात्मा (प्राणियों की आत्मा), ९. भूतभावनः (प्राणियों की उन्नति करने वाले)।
श्लोक संख्या 2 ॥ श्री ॥
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः । अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २ ॥
हिंदी भावार्थ: १०. पूतात्मा (पवित्र आत्मा), ११. परमात्मा (परम आत्मा), १२. मुक्तानां परमा गतिः (मुक्त पुरुषों की परम गति), १३. अव्ययः (अविनाशी), १४. पुरुषः (हृदय में वास करने वाले), १५. साक्षी (सबके दृष्टा), १६. क्षेत्रज्ञः (शरीर को जानने वाले), १७. अक्षरः (अक्षय स्वरूप)।
श्लोक संख्या 3 ॥ श्री ॥
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः । नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३ ॥
हिंदी भावार्थ: १८. योगः (योग स्वरूप), १९. योगविदां नेता (योगियों के मार्गदर्शक), २०. प्रधानपुरुषेश्वरः (प्रकृति और जीवात्मा के ईश्वर), २१. नारसिंहवपुः (नृसिंह रूपधारी), २२. श्रीमान् (शोभायुक्त), २३. केशवः (ब्रह्मा-विष्णु-शिव के स्वामी), २४. पुरुषोत्तमः (सर्वश्रेष्ठ पुरुष)।
श्लोक संख्या 4 ॥ श्री ॥
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः । सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४ ॥
हिंदी भावार्थ: २५. सर्वः (सबकुछ), २६. शर्वः (संहारकर्ता), २७. शिवः (कल्याणकारी), २८. स्थाणुः (अचल), २९. भूतादिः (सृष्टि के कारण), ३०. निधिरव्ययः (अक्षय निधि), ३१. सम्भवः (स्वेच्छा से प्रकट होने वाले), ३२. भावनः (हितैषी), ३३. भर्ता (भरण-पोषण करने वाले), ३४. प्रभवः (उत्पत्ति के स्रोत), ३५. प्रभुः (समर्थ), ३६. ईश्वरः (परम नियंता)।
श्लोक संख्या 5 ॥ श्री ॥
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ ५ ॥ ॥ इति श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
हिंदी भावार्थ: ३७. स्वयम्भूः (स्वयं प्रकट), ३८. शम्भुः (आनन्ददाता), ३९. आदित्यः (सूर्यस्वरूप), ४०. पुष्कराक्षः (कमलनयन), ४१. महास्वनः (वेद ध्वनि स्वरूप), ४२. अनादिनिधनः (जन्म-मरण रहित), ४३. धाता (धारणकर्ता), ४४. विधाता (कर्मफल दाता), ४५. धातुरुत्तमः (सर्वश्रेष्ठ पोषक)।
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संबंधित चालीसा, आरती, पूजन एवं पंचांग

इस स्तोत्र साधना के साथ संबंधित चालीसा, आरती, पूजन विधि व आज का शुभ मुहूर्त पंचांग भी अवश्य देखें:

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पाठ की दिव्य फलश्रुति व लाभ

  • ✓ समस्त पापों, पूर्वजन्म के बुरे कर्मों और दोषों का समूल शमन
  • ✓ आरोग्य, दीर्घायु, आत्मबल, कांति और मानसिक शांति की प्राप्ति
  • ✓ कुंडली के सभी अनिष्ट ग्रहों (विशेषकर गुरु व शनि) का शांत होना
  • ✓ जीवन के अंत में वैकुंठ धाम और मोक्ष की सुनिश्चित प्राप्ति
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स्तोत्र पाठ विधि एवं नियम

1
शुद्धि व स्नान
प्रातः काल स्नान कर स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें।
2
दिशा व दीप
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें। शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
3
तुलसी व चंदन अर्पण
भगवान विष्णु/श्रीराम/श्रीकृष्ण को गोपीचंदन का तिलक लगाएं और तुलसी दल व पीले पुष्प अर्पित करें।
4
संकल्प व पाठ
हाथ में जल व तुलसी लेकर शांति, रक्षा और अभीष्ट फल की कामना का संकल्प कर प्रेमपूर्वक पाठ करें।
5
आरती व भोग
पाठ उपरांत माखन-मिश्री अथवा पंजीरी का भोग लगाएं और कर्पूर आरती करें।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▼

प्रातः काल या संध्या काल में शुद्ध होकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके तुलसी माला - 1 पाठ पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है।

इस स्तोत्र पाठ के मुख्य लाभ क्या हैं? ▼

यह पाठ नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर आत्मबल, शांति, सुरक्षा और अभीष्ट फल प्रदान करता है।