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BHAKTI KI SHAKTI
🔱 परमेश्वर व वैदिक ऋषि

विविधदेवस्तोत्राणि

विविधदेवस्तोत्राणि सनातन धर्म का अत्यंत पावन और चमत्कारी वैदिक स्तोत्र है। सनातन आगम व उपनिषद में वर्णित यह स्तुति परमेश्वर व वैदिक ऋषि के परम स्वरूप, अनुग्रह और संकटमोचक सामर्थ्य का गुणगान करती है।

रचयिता वैदिक महर्षि
स्रोत / ग्रन्थ सनातन आगम व उपनिषद
शुभ दिन / तिथि नित्य प्रातः, शुभ मुहूर्त
जप माला रुद्राक्ष अथवा तुलसी माला - 1 पाठ
श्लोक संख्या 1 ॥ श्री ॥
।। श्री गणपति स्तोत्रम् ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 1): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 1 ॥ श्री ॥
जेतुं यस्त्रिपुरं हरेण हरिणा व्याजाद्वलिं बध्नता स्त्रष्टुं वारिभवोद्भवेन भुवनं शेषेण धर्तुं धराम् । पार्वत्या महिषासुरप्रमथने सिद्धाधिपै: सिद्धये ध्यात: पञ्चशरेण विश्वजितये पायात्स नागानन: ।। 1 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 1): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 2 ॥ श्री ॥
विघ्नध्वान्तनिवारणैकतरणिर्विघ्नाटवीहव्यवाड् विघ्नव्यालकुलाभिमानगरुडो विघ्नेभपञ्चानन: । विघ्नोत्तुंगगिरिप्रभेदनपविर्विघ्नाम्बुधेर्वाडवो विघ्नाघौघघनप्रचण्डपवनो विघ्नेश्वर: पातु न: ।। 2 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 2): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 3 ॥ श्री ॥
खर्वं स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगंडस्थलम् । दन्ताघातविदारितारिरुधिरै: सिन्दूरशोभाकरं वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम् ।। 3 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 3): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 4 ॥ श्री ॥
गजाननाय महसे प्रत्यूहतिमिरच्छिदे । अपारकरुणापूरतरंगितदृशे नम: ।। 4 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 4): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 5 ॥ श्री ॥
अगजाननपद्मार्कं गजाननमहर्निशम् । अनेकदन्तं भक्तानामेकदंतमुपास्महे ।। 5 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 5): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 6 ॥ श्री ॥
श्वेतांग श्वेतवस्त्रं सितकुसुमगणै: पूजितं श्वेतगन्धै: क्षीराब्धौ रत्नदीपै: सुरनरतिलकं रत्नसिंहासनस्थम् । दोर्भि: पाशांगकुशाब्जाभयवरमनसं चन्द्रमौलिं त्रिनेत्रं ध्यायेच्छान्त्यर्थमीशं गणपतिममलं श्रीसमेतं प्रसन्नम् ।। 6 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 6): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 7 ॥ श्री ॥
आवाहये तं गणराजदेवं रक्तोत्पलाभासमशेषवन्द्यम् । विघ्नान्तकं विघ्नहरं गणेशं भजामि रौद्रं सहितं च सिद्धया ।। 7 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 7): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 8 ॥ श्री ॥
यं ब्रह्म वेदान्तविदो वदन्ति परं प्रधानं पुरुषं तथान्ये । विश्वोद्गते: कारणमीश्वरं वा तस्मै नमो विघ्नविनाशनाय ।। 8 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 8): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 9 ॥ श्री ॥
विघ्नेश वीर्याणि विचित्रकाणि वंदीजनैर्मागधकै: स्मृतानि । श्रुत्वा समुत्तिष्ठ गजानन त्वं ब्राह्मो जगन्मंगलकं कुरुष्व ।। 9 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 9): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 10 ॥ श्री ॥
गणेश हेरम्ब गजाननेति महोदर स्वानुभवप्रकाशिन् । वरिष्ठ सिद्धिप्रिय बुद्धिनाथ वदन्त एवं त्यजत प्रभीती: ।। 10 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 10): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 11 ॥ श्री ॥
अनेकविघ्नान्तक वक्रतुंड स्वसंज्ञवासिंश्च चतुर्भुजेति । कवीश देवान्तकनाशकारिन् वदन्त एवं त्यजत प्रभीती: ।। 11 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 11): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 12 ॥ श्री ॥
अनन्तचिद्रूपमयं गणेशं ह्राभेदभेदादिविहीनमाद्यम् । ह्रदि प्रकाशस्य धरं स्वधीस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम: ।। 12 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 12): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 13 ॥ श्री ॥
विश्वादिभूतं ह्रदि योगिनां वै प्रत्यक्षरूपेण विभान्तमेकम् । सदा निरलाम्बसमाधिगम्यं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम: ।। 13 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 13): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 14 ॥ श्री ॥
यदीयवीर्येण समर्थभूता माया तया संरचितं च विश्वम् । नागात्मकं ह्रात्मतया प्रतीतं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम: ।। 14 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 14): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 15 ॥ श्री ॥
सर्वान्तरे संस्थितमेकगूढं यदाज्ञया सर्वमिदं विभाति । अनन्तरूपं ह्रदि बोधकं वै तमेकदन्तं शरणं व्रजाम: ।। 15 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 15): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 16 ॥ श्री ॥
यं योगिनी योगबलेन साध्यं कुर्वन्ति तं क: स्तवनेन नौति । अत: प्रणामेन सुसिद्धिदोऽस्तु तमेकदन्तं शरणं व्रजाम: ।। 16 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 16): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 17 ॥ श्री ॥
देवेन्द्रमौलिमन्दारमकरन्दकणारूणा: । विघ्नान् हरन्तु हेरम्बचरणाम्बुजरेणव: ।। 17 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 17): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 18 ॥ श्री ॥
एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम् । विघ्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम् ।। 18 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 18): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
श्लोक संख्या 19 ॥ श्री ॥
यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् । तत्सर्वं क्षम्यतां देव प्रसीद परमेश्वर ।। 19 ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक 19): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
समाप्ति ॥ श्री ॥
।। इति श्री विविध देव स्तोत्राणि सम्पूर्णम् ।।
हिंदी भावार्थ: विविधदेवस्तोत्राणि (श्लोक समाप्ति): पावन स्तुति व मंगलकारी श्लोक पाठ।
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संबंधित चालीसा, आरती, पूजन एवं पंचांग

इस स्तोत्र साधना के साथ संबंधित चालीसा, आरती, पूजन विधि व आज का शुभ मुहूर्त पंचांग भी अवश्य देखें:

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पाठ की दिव्य फलश्रुति व लाभ

  • ✓ परमेश्वर व वैदिक ऋषि की अविरल कृपा, सुरक्षा और आत्मबल की प्राप्ति
  • ✓ अज्ञात भय, मानसिक तनाव, कलह और गृह दोषों का निवारण
  • ✓ कार्यक्षेत्र, व्यापार और विद्या में आने वाले विघ्नों पर विजय
  • ✓ नित्य पाठ से सकारात्मक ऊर्जा, सुख, शांति और सौभाग्य में वृद्धि
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स्तोत्र पाठ विधि एवं नियम

1
शुद्धि व स्नान
प्रातः काल स्नानोपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2
आसन व दीप
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं।
3
ध्यान व अर्पण
परमेश्वर व वैदिक ऋषि का ध्यान कर पुष्प, चंदन, अक्षत और नैवेद्य अर्पित करें।
4
संकल्प व पाठ
हाथ में जल और अक्षत लेकर अपने मनोरथ का संकल्प करें और शांत मन से स्तोत्र का पाठ करें।
5
क्षमा प्रार्थना व समर्पण
पाठ उपरांत अज्ञानतावश हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगें और आरती करें।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विविधदेवस्तोत्राणि का पाठ कब करना चाहिए? ▼

प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त अथवा संध्या काल में शुद्ध होकर नित्य प्रातः, शुभ मुहूर्त पर पाठ करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।

इस स्तोत्र के मुख्य लाभ क्या हैं? ▼

यह पाठ नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर आत्मबल, शांति, सुरक्षा और अभीष्ट फल प्रदान करता है।