🕉️
भाववृत्त / सृष्टि उत्पत्ति
ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 129)
ऋषि: परमेष्ठी प्रजापति
छंद: त्रिष्टुप्
नास्दीय सूक्तं
Nasadiya Suktam
विश्व-साहित्य का सबसे गहन दार्शनिक सूक्त, जो सृष्टि से पूर्व 'न सत् था न असत्' के गूढ़ रहस्य का उद्घाटन करता है।
फॉन्ट आकार:
॥ वेदोक्त मूल ऋचाएं ॥
नास्दीय सूक्तं मूल पाठ व भावार्थ
ऋचा 1
वेदमंत्र
Nasadiya
Suktam
१. नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम् ॥ १॥
सरल भावार्थ:
इस जगत् की उत्पत्ति से पहले ना ही किसी का आस्तित्व था और ना ही अनस्तित्व, मतलब इस जगत् की शुरुआत शून्य से हुई। तब न हवा थी, ना आसमान था और ना उसके परे कुछ था, चारों ओर समुन्द्र की भांति गंभीर और गहन बस अंधकार के आलावा कुछ नहीं था।
English Translation:
नास्दीय सूक्तं (ऋचा 1): Sacred Vedic verse recitation and invocation.
ऋचा 2
वेदमंत्र
२. न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः ।
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ॥२॥
सरल भावार्थ:
उस समय न ही मृत्यु थी और न ही अमरता, मतलब न ही पृथ्वी पर कोई जीवन था और न ही स्वर्ग में रहने वाले अमर लोग थे, उस समय दिन और रात भी नहीं थे। उस समय बस एक अनादि पदार्थ था(जिसे प्रकृति कहा गया है), मतलब जिसका आदि या आरंभ न हो और जो सदा से बना चला आ रहा हो।
English Translation:
नास्दीय सूक्तं (ऋचा 2): Sacred Vedic verse recitation and invocation.
ऋचा 3
वेदमंत्र
३. तम आसीत्तमसा गूहळमग्रे प्रकेतं सलिलं सर्वाऽइदम् ।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम् ॥३॥
सरल भावार्थ:
शुरू में सिर्फ अंधकार में लिपटा अंधकार और वो जल की भांति अनादि पदार्थ था जिसका कोई रूप नहीं था, अर्थात जो अपना आयतन न बदलते हुए अपना रूप बदल सकता है। फिर उस अनादि पदार्थ में एक महान निरंतर तप् से वो ‘रचयिता'(परमात्मा/भगवान) प्रकट हुआ।
English Translation:
नास्दीय सूक्तं (ऋचा 3): Sacred Vedic verse recitation and invocation.
ऋचा 4
वेदमंत्र
४. कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥
सरल भावार्थ:
सबसे पहले रचयिता को कामना/विचार/भाव/इरादा आया सृष्टि की रचना का, जो की सृष्टि उत्पत्ति का पहला बीज था, इस तरह रचयिता ने विचार कर आस्तित्व और अनस्तित्व की खाई पाटने का काम किया।
English Translation:
नास्दीय सूक्तं (ऋचा 4): Sacred Vedic verse recitation and invocation.
ऋचा 5
वेदमंत्र
५. तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत् ।
रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात् ॥५॥
सरल भावार्थ:
फिर उस कामना रुपी बीज से चारों ओर सूर्य किरणों के समान ऊर्जा की तरंगें निकलीं, जिन्होंने उस अनादि पदार्थ(प्रकृति) से मिलकर सृष्टि रचना का आरंभ किया।
English Translation:
नास्दीय सूक्तं (ऋचा 5): Sacred Vedic verse recitation and invocation.
ऋचा 6
वेदमंत्र
६. को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥६॥
सरल भावार्थ:
अभी वर्तमान में कौन पूरी तरह से ठीक-ठीक बता सकता है की कब और कैसे इस विविध प्रकार की सृष्टि की उत्पत्ति और रचना हुई, क्यूंकि विद्वान लोग तो खुद सृष्टि रचना के बाद आये। अतः वर्तमान समय में कोई ये दावा करके ठीक-ठीक वर्णण नहीं कर सकता कि सृष्टि बनने से पूर्व क्या था और इसके बनने का कारण क्या था।
English Translation:
नास्दीय सूक्तं (ऋचा 6): Sacred Vedic verse recitation and invocation.
ऋचा 7
वेदमंत्र
७. इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न ।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥७॥
सरल भावार्थ:
सृष्टि रचना का स्रोत क्या है? कौन है इसका कर्ता-धर्ता? सृष्टि का संचालक, अवलोकन करता, ऊपर कहीं स्वर्ग में है बैठा। हे विद्वानों, उसको जानों.. तुम नहीं जान सकते तो कौन जान सकता है?
English Translation:
नास्दीय सूक्तं (ऋचा 7): Sacred Vedic verse recitation and invocation.
॥ विधि एवं नियम ॥
पाठ विधि, शुभ समय एवं नियम
⏱️
सर्वोत्तम शुभ समय:
अमावस्या, ध्यान-साधना काल
🪔 क्रमबद्ध पाठ विधि:
- निःशब्द एकांत स्थान में ध्यानावस्था में बैठें।
- सृष्टि के अनादि मूल तत्व पर चिंतन करते हुए पाठ करें।
✨ दिव्य फलश्रुति एवं लाभ:
- ✔ बुद्धि की संकीर्णता मिटकर ब्रह्मांडीय चेतना का विकास होता है।
- ✔ अहंकार का विसर्जन और परम शांति की अनुभूति होती है।
Frequently Asked Questions
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नास्दीय सूक्तं का पाठ करने का सबसे शुभ समय क्या है?
नास्दीय सूक्तं का पाठ सामान्यतः अमावस्या, ध्यान-साधना काल के समय सर्वाधिक फलदायी माना गया है। शुद्ध होकर शांत मन से पाठ करें।
नास्दीय सूक्तं का मूल वेद स्रोत क्या है?
नास्दीय सूक्तं का पावन स्रोत ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 129) है। इसके ऋषि परमेष्ठी प्रजापति तथा छंद त्रिष्टुप् है।
नास्दीय सूक्तं का पाठ करने से क्या लाभ प्राप्त होते हैं?
इसके श्रद्धापूर्वक पाठ से बुद्धि की संकीर्णता मिटकर ब्रह्मांडीय चेतना का विकास होता है। तथा अहंकार का विसर्जन और परम शांति की अनुभूति होती है। होती है।