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रात्रि देवी / दुर्गा / भुवनेश्वरी
ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 127)
ऋषि: कुशिक सौभर
छंद: गायत्री
रात्रि सूक्तम्
Ratri Suktam
निशा काल में शांति, भय-मुक्ति, सुखद निद्रा तथा तामसिक प्रवृत्तियों के नाश हेतु उच्चारित ऋग्वैदिक सूक्त।
फॉन्ट आकार:
॥ वेदोक्त मूल ऋचाएं ॥
रात्रि सूक्तम् मूल पाठ व भावार्थ
ऋचा 1
वेदमंत्र
रात्री॒ व्य॑ख्यदा॑य॒ती पु॑रु॒त्रा दे॒व्य॑क्षभिः॑ ।
विश्वा॒ अधि॒ श्रियो॑ऽधित ॥ १ ॥
Rātrī vyakhyadāyatī purutrā devyakṣabhiḥ |
Viśvā adhi śriyo'dhita || 1 ||
सरल भावार्थ:
रात्रि देवी अपने अनेक नक्षत्र रूपी नेत्रों से सब ओर देखती हुई आती हैं और संपूर्ण शोभा को प्रकाशित करती हैं।
English Translation:
Goddess Night, approaching, looks forth in many a place with Her myriad starry eyes; She has assumed all divine splendor.
॥ विधि एवं नियम ॥
पाठ विधि, शुभ समय एवं नियम
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सर्वोत्तम शुभ समय:
प्रतिदिन रात्रि शयन से पूर्व, नवरात्रि
🪔 क्रमबद्ध पाठ विधि:
- शयन से पूर्व हाथ-मुंह धोकर एकाग्र मन से पाठ करें।
✨ दिव्य फलश्रुति एवं लाभ:
- ✔ दुःस्वप्न और अनिद्रा की समस्या समाप्त होती है।
- ✔ अंधकार, चोर और हिंसक पशुओं के भय से रक्षा होती है।
Frequently Asked Questions
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रात्रि सूक्तम् का पाठ करने का सबसे शुभ समय क्या है?
रात्रि सूक्तम् का पाठ सामान्यतः प्रतिदिन रात्रि शयन से पूर्व, नवरात्रि के समय सर्वाधिक फलदायी माना गया है। शुद्ध होकर शांत मन से पाठ करें।
रात्रि सूक्तम् का मूल वेद स्रोत क्या है?
रात्रि सूक्तम् का पावन स्रोत ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 127) है। इसके ऋषि कुशिक सौभर तथा छंद गायत्री है।
रात्रि सूक्तम् का पाठ करने से क्या लाभ प्राप्त होते हैं?
इसके श्रद्धापूर्वक पाठ से दुःस्वप्न और अनिद्रा की समस्या समाप्त होती है। तथा अंधकार, चोर और हिंसक पशुओं के भय से रक्षा होती है। होती है।