Bhakti Ki Shakti Vedic Lotus Logo
BHAKTI KI SHAKTI
📜 भगवान विट्ठल पाण्डुरङ्ग (पंढरपुर) • 9 श्लोक

श्री पाण्डुरङ्ग अष्टकम्

भीमा नदी के तट पर ईंट पर खड़े भक्तवत्सल भगवान विट्ठल का यह अष्टक भवसागर से पार उतारने वाला और भगवद्-प्रेम प्रदान करने वाला है।

रचयिता आदि शंकराचार्य
स्रोत / ग्रन्थ स्तोत्र रत्नावली (आदिशंकराचार्य कृत)
छन्द भुजङ्गप्रयात छन्द
शुभ दिन / मुहूर्त आषाढ़ी व कार्तिकी एकादशी, बुधवार, पूर्णिमा
श्लोक 1 ॥ श्री ॥
महायोगपीठे तटे भीमरथ्या वरं पुण्डरीकाय दातुं मुनीन्द्रैः । समागत्य तिष्ठन्तमानन्दकन्दं परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ १ ॥
हिंदी भावार्थ: भीमा नदी के पावन तट पर महायोगपीठ पंढरपुर में, भक्त पुण्डरीक को वरदान देने के लिए श्रेष्ठ मुनियों के साथ आकर खड़े हुए, परमानंद के मूल कंद, साक्षात् परब्रह्म स्वरूप भगवान पाण्डुरङ्ग का मैं भजन करता हूँ।
English Translation: Standing at the exalted seat of Mahayogapitha on the banks of River Bhima to grant boons to devotee Pundalika, accompanied by great sages, root of supreme bliss, manifest supreme Brahman, I adore Panduranga.
श्लोक 2 ॥ श्री ॥
तडिद्वाससं नीलमेघावभासं रमामन्दिरं सुन्दरं चित्प्रकाशम् । परं धाम रूपं जगत्पालकञ्च परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ २ ॥
हिंदी भावार्थ: बिजली के समान पीताम्बर धारण किए हुए, नील मेघ के समान श्यामवर्ण, माता लक्ष्मी के निवास स्थान, अत्यंत मनोहारी, चैतन्य प्रकाश स्वरूप, परम धाम और संपूर्ण जगत का पालन करने वाले साक्षात् परब्रह्म भगवान पाण्डुरङ्ग का मैं भजन करता हूँ।
English Translation: Clad in garments flashing like lightning, dark and splendid like rain clouds, abode of Rama (Lakshmi), exquisitely charming, radiant consciousness, protector of the universe, I worship Lord Panduranga.
श्लोक 3 ॥ श्री ॥
प्रमाणं भवाम्भोधिपोतं विमुक्तेः कटाक्षैः कृपालोः पुनीतं जनानाम् । कराभ्यां न्यस्तं कटौ चारुरूपं परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ३ ॥
हिंदी भावार्थ: जो संसार रूपी समुद्र को पार कराने के लिए नौका के समान हैं, जिनकी करुणामयी दृष्टि मनुष्यों को पावन कर देती है, और जिन्होंने अपनी दोनों भुजाएं कमर पर रखी हुई हैं, उस अत्यंत मनोहर रूप वाले साक्षात् परब्रह्म भगवान पाण्डुरङ्ग का मैं भजन करता हूँ।
English Translation: A sure vessel across the ocean of transmigration, purifying humanity through merciful glances, standing gracefully with both hands placed upon His hips, I worship Supreme Lord Panduranga.
श्लोक 4 ॥ श्री ॥
स्फुरत्कुण्डलाक्रान्तगण्डस्थलाङ्गं प्रसन्नाननं कोटिसूर्यप्रकाशम् । लसत्कौस्तुभोद्भासितं कण्ठदेशे परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ४ ॥
हिंदी भावार्थ: जिनके कपोलों पर झिलमिलाते कुण्डलों की आभा पड़ रही है, जिनका मुखकमल सदा प्रसन्न रहता है, जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं और जिनके कंठ में कौस्तुभ मणि देदीप्यमान हो रही है, उन साक्षात् परब्रह्म पाण्डुरङ्ग को मैं भजता हूँ।
English Translation: Cheeks gleaming with oscillating celestial earrings, serene radiant countenance shining like millions of suns, neck graced by the Kaustubha gem, I revere the supreme Lord Panduranga.
श्लोक 5 ॥ श्री ॥
शतानन्दमूर्तिं सुभक्तानुरक्तं जगत्त्राणहेतुं मुदा सन्ततं तम् । सुराधीशपूज्यं परं पूर्णरूपं परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ५ ॥
हिंदी भावार्थ: जो अनन्त आनंद की मूर्ति हैं, अपने सच्चे भक्तों से अगाध प्रेम करने वाले हैं, जगत की रक्षा के लिए आनंदपूर्वक अवतार धारण करते हैं, देवराज इन्द्रादि द्वारा पूजित और परिपूर्ण रूप हैं, उन साक्षात् परब्रह्म भगवान पाण्डुरङ्ग का मैं भजन करता हूँ।
English Translation: Embodiment of endless bliss, affectionate to true devotees, eternally sustaining the worlds, adored by Indra and celestial lords, completely absolute, I adore Lord Panduranga.
श्लोक 6 ॥ श्री ॥
नताङ्घ्रिद्वयं भक्तवृन्दैः समन्तात् मुहुर्गीयमानं महावैभवौघम् । सदानन्दसान्द्रं परात्मानमीड्यं परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ६ ॥
हिंदी भावार्थ: जिनके दोनों चरण-कमल भक्तजनों द्वारा वंदित हैं, जिनकी महिमा और वैभव का सभी दिशाओं में कीर्तन होता है, जो घनीभूत सच्चिदानंद स्वरूप, परम आत्मा और स्तुति करने योग्य हैं, उन साक्षात् परब्रह्म पाण्डुरङ्ग को मैं भजता हूँ।
English Translation: Whose dual lotus feet are saluted by devoted throngs, whose boundless glory is chanted everywhere, dense with eternal beatitude, the supreme adorable Self, I worship Panduranga.
श्लोक 7 ॥ श्री ॥
जगद्व्यापिनं निर्गुणं वा सगुणं चिदानन्दमानन्ददातारमीशम् । अनाथैकबन्धुं दयासिन्धुमूर्तिं परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ७ ॥
हिंदी भावार्थ: जो संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं, निर्गुण और सगुण दोनों स्वरूपों में विराजमान हैं, चिदानंदमय और आनंद के प्रदाता हैं, अनाथों के एकमात्र सच्चे बंधु और दया के सागर हैं, उन साक्षात् परब्रह्म पाण्डुरङ्ग का मैं भजन करता हूँ।
English Translation: Pervading the entire cosmos, both transcendent (Nirguna) and manifest (Saguna), radiant bliss bestowing joy, sole friend of the forlorn, ocean of mercy, I revere Lord Panduranga.
श्लोक 8 ॥ श्री ॥
परं धाम शान्तं श्रिया शोभमानं सुरारिप्रणाशं परं ज्ञानगम्यम् । भवाम्भोधितारं शरण्यं शरण्यं परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम् ॥ ८ ॥
हिंदी भावार्थ: जो परम धाम, शांत, महालक्ष्मी से सुशोभित, असुरों का संहार करने वाले, विशुद्ध ज्ञान द्वारा प्राप्त होने योग्य, भवसागर से पार उतारने वाले और सभी के एकमात्र आश्रय हैं, उन साक्षात् परब्रह्म भगवान पाण्डुरङ्ग का मैं भजन करता हूँ।
English Translation: Supreme abode, tranquil, accompanied by Sri Lakshmi, destroyer of demonic forces, attainable through pure realization, ferry across the worldly sea, supreme sanctuary, I worship Panduranga.
फलश्रुति 9 ॥ श्री ॥
पाण्डुरङ्गाष्टकं पुण्यं ये पठन्ति समाहिताः । ते मुक्ताः सर्वपापेभ्यो यान्ति विष्णोः परं पदम् ॥ ९ ॥
हिंदी भावार्थ: जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस परम पवित्र पाण्डुरङ्गाष्टकम का पाठ करते हैं, वे इस संसार के समस्त पापों और भवों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करते हैं।
English Translation: Those who recite this sacred Panduranga Ashtakam with tranquil focus are cleansed of all sins and attain the supreme eternal realm of Lord Vishnu.
✨ समाप्ति
।। इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्री पाण्डुरङ्ग अष्टकम् सम्पूर्णम् ।।

🪔 प्रामाणिक पाठ विधि एवं नियम

  • 1 प्रातः स्नान कर पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें और तुलसीदल अपने पास रखें।
  • 2 भगवान पाण्डुरङ्ग विट्ठल के चित्र या विग्रह के समक्ष घी का दीपक जलाएं।
  • 3 तुलसी की माला से अथवा हाथ जोड़कर 'परब्रह्मलिङ्गं भजे पाण्डुरङ्गम्' भाव से पाठ करें।

✨ फलश्रुति एवं अलौकिक लाभ

  • ✔ माता-पिता की सेवा और गुरु-भक्ति का अलौकिक फल तथा पुण्डरीक जैसा भगवद्-अनुग्रह प्राप्त होता है।
  • ✔ संसार के जन्म-मरण के चक्र और घोर पापों से सहज ही मुक्ति मिलती है।
  • ✔ भक्त के घर में सुख, शांति, अन्न-धन और ईश्वर के प्रति निश्चल प्रेम की वृद्धि होती है।
🗓️ शुभ वार व मुहूर्त: आषाढ़ी व कार्तिकी एकादशी, बुधवार, पूर्णिमा