जम्मू कश्मीर के देवी मंदिरों में माता सुकराला देवी का मंदिर भी बड़ा प्रसिद्ध है। सुकराला माता को मल्ल देवी के नाम से भी भक्तजन बुलाते है।

यह जगह जम्मू से लगभग 3 घंटे की दूरी पर है, यहाँ पर इतनी भीड़ नहीं होती है, लेकिन भक्तो को देवी में आस्था अडिग है, बहुत से लोग सुख शांति का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आते हैं और साथ ही इच्छाओं को वास्तविकता में बदलने का आशीर्वाद भी मांगते हैं।

ये मंदिर बहुत प्रसिद्ध है क्योंकि ऐसा माना जाता है यहाँ सभी मनोकामना को पूरा करता है यदि आप माँ को पवित्र और सच्चे दिल से याद करते हैं और उनसे निवेदन करते हैं तो माता का आशीर्वाद आपको जरूर मिलेगा ।

सुकराला शब्द शुक्राला से बना है। माता सुकराला नौ देवियों में सबसे बड़ी बहन हैं। इसलिए सुकराला माँ को माता वैष्णो देवी जी की बड़ी बहन माना गया हैं।

माता सुकराला भगवती शारदा का ही अवतार है | सुकराला देवी माँ को समर्पित यह प्रसिद्ध मंदिर बिलावर से 9.60 किलोमीटर और कठुआ से लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर सुकराला देवी तीर्थ है।

यह मंदिर समुन्द्र तल से एक पहाड़ी पर 3500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर का भव्य भवन सफेद रंग का है, इस मंदिर का कलश बहुत ही ऊँचा है जो भव्य रूप से खड़ा है और दूर से दिखाई देता है ।

यह मंदिर भी राज्य के अन्य मंदिरों की तरह ही है पर इसका कलश बहुत ऊंचा स्थापित किया हुआ है और पहाड़ की चोटी पर इस होने के कारण बड़ी दूर से दिखाई देता है।

मंदिर में मल्ल देवी की पिंडी है जो बहुमूल्य गहनों तथा वस्त्रों से सजी हुई है। माता का दरबार भजन कीर्तन तथा जयकारों से गूंजता रहता है।

मंदिर की बाहरी दीवार पर द्वारपाल के रूप में भैरव तथा महावीर जी की मूर्तियां है। ऊपर गणेश जी की तथा माता की मूर्ति के सामने बाहर शेरों की मूर्तियां है।

तीर्थयात्रियों को पूजनीय मंदिर तक पहुंचने के लिए 150 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। पवित्र मंदिर शारदा देवी के पुन: अवतार माता मल्ल का निवास है।

देवी ने यहां खुद को एक शिला के रूप में प्रकट किया है, जो पीतल के शेर पर विराजमान है। इसके पीछे दानव राजा महिषासुर के शरीर पर खड़े महिषासुर मुर्दिनी (महा-लक्ष्मी का पुनर्जन्म) की एक छवि भी है।

देवी चार भुजाओं वाली हैं जिनके एक हाथ में तलवार है। तीर्थ के साथ कई किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं।

ऐसा माना जाता है कि पवित्र तीर्थ का निर्माण माधो सिंह और चंबा के निर्वासित राजकुमार (हिमाचल परदेश) द्वारा किया गया था।

इस मंदिर के दर्शन के लिए तीर्थयात्रियों की संख्या हर साल बढ़ रही है। नवरात्रों के दौरान यह संख्या 50 हजार से अधिक हो जाती है।

सुकराला माता मंदिर की कहानी

पांच सौ साल पहले सुकराला गांव में एक महात्मा त्रिलोचन रहते थे। अपनी कम उम्र में महात्मा काशी में धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद कश्मीर गए।

वह माता शारदा के सच्चे भक्त थे और प्रतिदिन श्रद्धा पूर्वक माता की पूजा करते थे।

अपना धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपने गांव सुकराला वापस आने का फैसला किया।

त्रिलोचन के गुरु ने उसे यात्रा के दौरान भोजन पर खर्च करने और अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ सिक्के दिए।

जब वे बारामूला पहुंचे तो उन्होंने हवन (पूजा सामग्री) खरीदा और वहां हवन शुरू किया। उसने अपना मन पूजा में केंद्रित कर लिया और पूरी हवन (पूजा सामग्री) समाप्त हो गई और हवन के स्थान पर अपने शरीर के टुकड़े चढ़ाने लगे और अंततः उसने अपना सिर चढ़ाने के लिए खुद को तैयार किया लेकिन जब उसने अपना सिर काटने के लिए अपना तेज धार वाला हथियार उठाया तो माता सुकराला ( माता वैष्णो की छोटी बहन) प्रकट हुई और उसे खुद को खत्म करने के लिए ऐसा कदम उठाने से रोका।

माता शारदा ने महात्मा जी की भक्ति से प्रसन्न होकर उनकी इच्छा जाननी चाही। तो महात्मा जी ने कहा, माता यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे पूर्ण रूप से दर्शन दें, मैं केवल आप के दर्शन का अभिलाषी हूं। माता ने महात्मा जी को साक्षात दर्शन दिए और उसकी मनोकामना के विषय में पूछा।

महात्मा जी ने कहा अब मैं अपने घर वापस जाना चाहता हूं। इतनी दूर से चलकर आप की आराधना करने के लिए यहां पर आना मेरे लिए संभव नहीं होगा।

इसलिए मैं चाहता हूं कि आप हमारे क्षेत्र ( बिलावर ) में वास करें। ताकि मैं सुविधा पूर्व आप की पूजा कर सकूं और इस क्षेत्र के लोग भी आपका आशीर्वाद प्राप्त कर सकें।

माता ने अपने भगत की इच्छा को स्वीकार किया और वहां बसने का वादा किया, आपकी तीसरी (तीसरी) पीढ़ी का एक पुरुष सदस्य मेरा पुजारी बनेगा । इन शब्दों का बचन देने के बाद माता उनकी दृष्टि से ओझल हो गई।

भगत त्रिलोचन की तीसरी पीढ़ी में उनके पोते शिव नंदन माता के पुजारी (भगत) बने। वह भी अपने दादा त्रिलोचन की तरह एक महान विद्वान थे।

भगत त्रिलोचन के दो बेटे पं महादेव तथा पं मलूक राम बिलावर तथा बसोहली में रहते थे। बसोहली के राजा मेदनी पाल ने भगत के लड़के पं शिव नन्दन को सुकराला का जंगल दे दिया। वह अक्सर उस जंगल में जाया करते थे और एकांत में ईश्वर भक्ति किया करते।

एक दिन सपने में पुजारी शिव नंदन ने माता सुकराला को देखा और उन्हें अपने दादाजी के साथ किए गए वादे के बारे में बताया कि त्रिलोचन की तीसरी (तीसरी) पीढ़ी में एक पुरुष सदस्य मेरा पुजारी बनेगा, अब मैंने आपको चुन लिया है और अपने पुजारी (भगत) को स्वीकार कर लिया है।

माता ने शिव नंदन को एक जंगल (जंगल) में जाने का निर्देश दिया और आपको वहां एक सफेद फूल की लता मिलेगी और उस लता के नीचे एक असाधारण मूर्ति (मूर्ति) पड़ी है।

सपने में दी गई माता के निर्देश के अनुसार वह उस स्थान पर पहुंचा और वहां देखा कि माता सुकराला की एक मूर्ति है।

इस बात की चर्चा जब उन्होंने गांव के लोगों से की तो स्थानीय लोगों को माता शारदा का वचन याद आ गया जो भगवती ने शिवनन्दन के दादा जी को दिया था। शिव नन्दन जी ने पिंडी को माता का अवतार मान कर वहीं उसकी स्थापना कर दी | भगत शिव नंदन ने बिना किसी रुकावट के वहां पूजा शुरू कर दी।

सुकराला मंदिर का निर्माण किसने करवाया

राजा चंबा (हि.प्र.) की मृत्यु के बाद उसका बड़ा बेटा मेहद सिंह चंबा का राजा बना, लेकिन उसका छोटा भाई जो सक्रिय और राजनीतिज्ञ था, उसका ताज छीनने में कामयाब रहा और चंबा का राजा बन गया।

एक कहानी के अनुसार एक बार चंबा के राजा मेहद सिंह मुगल दरबार में हाजरी देने दिल्ली गए थे । उसकी अनुपस्थिति में उसके छोटे भाई शेर सिंह ने मंत्रियों तथा सेना के अधिकारियों से मिलकर चंबा की राजगद्दी पर अधिकार कर लिया।

उस वक्त राजा मेहद सिंह दिल्ली से वापस चंबा की ओर आ रहे थे। रास्ते में ही उसे सूचना प्राप्त हुई कि चंबा की राजगद्दी पर उसके छोटे भाई ने कब्ज़ा कर लिया है। इसलिए चंबा जाने के बजाय वह बिलावर में अपने संबंधी के पास रहने के लिए आ गए ।

एक दिन राजकुमार मेहद सिंह दल के साथ एक घने जंगल में गया और उन्होंने जंगली बकरियों को मार डाला। जब वह अपने दल के साथ जंगल से बाहर आया, तो राजकुमार मेहद सिंह के पेट में तेज दर्द हुआ।

उनके उपचार के लिए हर जगह ले जाया गया और उनके इलाज के लिए वैद / हकीमों से सलाह ली गई, लेकिन गंभीर दर्द का कोई समाधान नहीं मिला।

आखिरकार कर एक दिन पंडित शिव नन्द जी को बुलाया गया और शव नंदन जी को अपनी आद्यात्मिक विद्या का इस्तेमाल करके बीमारी का कारन पता करने का अनुरोध किया ।

शिव नंदन ने राजा मेहद सिंह को पहाड़ी की चोटी पर स्थित एक गाँव में लाने का सुझाव दिया, यह गाँव माता सुकराला के भगतो का था ।

जब राजा को उस गांव में लाया गया तो राजकुमार मेहद सिंह की स्थिति को नियंत्रण से बाहर थी । पंडित जी ने अपना मन माता सुकराला के चरणों में लगाया ओर ध्यान केंद्रित किया, फिर पुजारी शिव नंदन ने भारी हाथों से उनकी पीठ पर एक थप्पड़ मारा।

पंडित शिव नंदन के मुख से शब्द निकलते हैं कि राजकुमार मेहद सिंह माता सुकराला के मंदिर का निर्माण करा दें तो दर्द दूर हो सकता है।

राजा मेहद सिंह ने अपनी असहायता दिखाई, क्योंकि वह उस समय चंबा का राजा नहीं था। ठाकुर ने भविष्यवाणी की कि वह (मेहद) बहुत जल्द चंबा साम्राज्य का ताज प्राप्त करेंगे।

यह बातें सुनने के बाद राजकुमार मेहद सिंह ने उन्होंने सुकराला में माता के मंदिर के निर्माण का वादा किया। जब उन्होंने माता सुकराला की इच्छा को स्वीकार किया, तो उनका दर्द गायब हो गया और ठीक हो गया।

जब वह दर्द से मुक्त हो गया, तो राजा ने माता सुकराला (माता मल) की सर्वोत्तम शक्ति आजमाने का प्रयास किया।

राजा मेहद ने माता से कहा की क्या कि वह कल से लसूडा के सूखे पेड़ (एक ऐसा पेड़ जिसका फल सब्जी और अचार बनाने के लिए उपयोग किया जाता है) औरपास की चट्टान को कल से हरा भरा कर सकती है।

माता सुकराला की कृपा से अगले दिन पेड़ और चट्टान दोनों हरे हो गए। वृक्ष लुसरा आज भी माता सुकराला के सामने लगा हुआ हैं ।

तीन दिनों के बाद चंबा से बिलावर के राजा को संदेश आया कि चंबा के राजा अब इस दुनिया में नहीं हैं और चंबा राज्य का ताज पहनने का एकमात्र विकल्प राजकुमार मेहद सिंह है। इस तरह राजकुमार महद सिंह ने ताज वापस पा लिया।

राजा महद सिंह अपने व्यस्त कार्यक्रम के कारण सुकराला माता का मंदिर बनाने का वादा भूल गए।

दो साल के अंतराल के बाद, नूरपुर के राजा ने चंबा पर हमला किया और उसके राज्य पर कब्जा कर लिया और राजा मेहद सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया।

एक दिन राजा मेहद सिंह ने सपने में माता सुकराला को देखा और उन्हें अपना वादा याद दिलाया। राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसे पूरा करने का वादा किया।

नूरपुर के राजा ने भी सपने में माता सुकराला को देखा जिन्होंने उन्हें उनके राज्य के साथ चंबा के राजा को रिहा करने के लिए कहा। अगले दिन नूरपुर के राजा ने उन्हें रिहा कर दिया और उसका राज्य भी वापस कर दिया।

जब राजा मेहद सिंह चंबा पहुंचे, तो उन्होंने अपने परिवार के सदस्य के साथ पत्थर, पानी और अन्य निर्माण सामग्री लेकर पैदल ही सुकराला की ओर कूच किया।

निर्माण कार्य शुरू हुआ और तय समय में पूरा हुआ। सुकराला मंदिर के निर्माण के लिए किसी स्थानीय सामग्री या मसलन का उपयोग नहीं किया गया था।

चम्बा से सुकराला तक सम्पूर्ण भवन सामग्री ढोई गई। मंदिर के पूर्ण होने के बाद एक बड़े हवन का आयोजन किया गया जिसमें महान विद्वानों, पंडितों ने भाग लिया।

मंदिर में भगवती मल्ल देवी की पिंडी के अतिरिक्त महालक्ष्मी, महाकाली, मां सरस्वती की मूर्तियां भी स्थापित की गई। मंदिर बनने से सुकराला का जंगल आबाद होने लगा।

हवन पूरा होने पर, माता से राजा मेहद सिंह और उनके परिवार के सदस्यों ने आशीर्वाद लिया और उन्हें चंबा और उनके राज्य के लोगो पर कृपा बनाये रखने की अनुरोध किया ।

सुकराला मंदिर कहाँ पर हैं

माता सुकराला जम्मू, कठुआ, उधमपुर, पठानकोट और देश के अन्य हिस्सों से जुड़ी हुई है। सभी बसें बिलावर बस स्टैंड पर पहुंचती हैं और हर घंटे के बाद बसें सुकराला की ओर चलती हैं जो कि बिलावर से 9 किलोमीटर दूर है।

बिल्लावर में प्राचीन शिव मंदिर को देखने का अवसर भी आपको मिलेगा है जो उत्तर भारत का सबसे पुराना मंदिर है। यह महाभारत काल का मंदिर हैं |

इस मंदिर का निर्माण पांडवो द्वारा किया गया था जब उन्हें तेरह साल और 1 साल के लिए ज्ञात्वास में जाने के लिए कहा गया था। इस मंदिर का उल्लेख वेदों और पुराणों में मिलता है। शिव, गणेश, हनुमान, पार्वती की सुंदरता, कला और मूर्तियां देखने लायक हैं।

यदि आप सुकराला माता के दर्शन के लिए आते हैं, तो भगवान शिव और माता सुकराला के आशीर्वाद से आपकी मनोकामनाएं पूरी होंगी।

बिलावर का शिव मंदिर जहाँ शिव, पार्वती, गणेश और हनुमान मंदिर ( पत्थर की एक शिला पर हनुमान जी की मूर्ति ) हैं और इनके दर्शन मात्र से तत्काल फल मिलता हैं, और आप आस पास के क्षेत्र की सुंदरता का आनंद भी ले ।


Leave a Comment

0 Shares
Share
Tweet
Share
Pin
Share